महाभारत कथा
पोस्ट --( 509 )-- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा -( १०९ )-- भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन की रक्षा करने का दायित्व निभाया ।
नारायणं नमस्कृत्यम् नरँ चैव नरोक्तमम् ।
देवीँ सरस्वतीम् व्यासम् ततो जयमुदीर्येत ।।
🌰 युधीष्ठिर ने अर्जुन की रक्षा का भार श्री कृष्ण को सौंपा था और श्री कृष्ण ने न केवल अर्जुन को #मोह #मुक्त कर समय समय पर #प्रेरणा देकर #उत्साहवर्धन किया बल्कि युद्ध मे #दिव्यास्त्रों की मार को #स्वयम #सहा ,और दिव्यास्त्रों से दग्ध #रथ को युद्ध की विजय तक #जलने से #बचाकर , अर्जुन की #प्राणरक्षा की और पांडवों को विजय श्री दिलायी --
🚫 सच है जिसने अपने को प्रभु की रक्षा में सौंप दिया और उनकी शरणागत हो गया ,उसकी रक्षा का भार , प्रभु स्वयम उठाते है । बस शंकर भगवान द्वारा श्री राम की स्तुति की प्रथम लाइन ( राम चरित मानस लंका कांड दोहा 114 के बाद ) कह कर आर्त पुकार करनी पड़ती है --
🍎 मामाभिरक्षय रघुकुल नायक । धृत बर चाप रुचिर कर सायक ।।
हे रघुकुल के नायक ! जिनके कंधे पर धनुष और हाथ में तीर शोभायमान है , मेरी रक्षा करो -
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सभी पांडवो ने हारे हुए कौरवो के शिविर पर अधिकार कर लिया , और वहां कौरवो की अकूत सम्पदा पाकर उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई । विश्राम करने के बाद भविष्य की सभी बातें जानने वाले , भगवान श्री कृष्ण ने पांडवो से कहा -
🚫 "आज की रात में हम लोगो को अपने मंगल के लिए #छावनी के #बाहर ही रहना चाहिए - उनकी बात मानकर सभी पांचो पांडवों और , सात्यकि के साथ श्री कृष्ण ने छावनी से बाहर निकलकर परम् पवित्र ' ओघवती ' नदी के किनारे वह भयावनी रात व्यतीत की --
🍎 फिर राजा युधिष्ठिर के कहने पर श्री कृष्ण गांधारी का क्रोध शांत करने के लिए हस्तिनापुर गए और अपने पुत्रों ,आदि की मृत्यु से दुखी गांधारी और ध्रतराष्ट्र को ' भावी प्रबल ' बताकर व युद्ध रोकने में उनकी असफलता को याद दिलाकर , उन्हें सतवांतना दी , यह भी कहा कि अब उनके जीवन के आसरा तथा मृत्यु के बाद जलदान आदि कर्म केवल पांडवो द्वारा होना है ; इसलिए क्रोध न करे और पांडवो को श्राप न दें । फिर अश्वत्थामा की प्रतिज्ञा को यादकर श्री कृष्ण तेजी से बाहर निकल आये और पांडवो को सब हाल बताया ।
🚫 उधर दुर्योधन का समाचार पाकर तीनो महारथी अश्वत्थामा , कृपाचार्य और कृतवर्मा , मरणासन्न दुर्योधन के पास पंहुचे । दुर्योधन की दशा देखकर अत्यंत दुखित तथा अपने पिता द्रोणाचार्य की झूठ बोल कर उनकी की गयी हत्या से अत्यंत क्रोधित ; अश्वत्थामा ने दुर्योधन से उसी रात में सभी पांडवों सहित उनकी बची सारी सेना को मार डालने का वायदा किया ; जिसपर दुर्योधन ने जल मंगाकर अश्वत्थामा का #सेनापति के रूप में गुरु #कृपाचार्य से #अभिषेक कराया । दुर्योधन खून में डूबा हुआ वही रातभर पड़ा रहा -
🎈वाह रे ईश्वर का न्याय - जो सारे संसार पर राज्य कर रहा था , अपने पापो के कारण आज रक्त से सना हुआ ,बिना किसी सहायक , भूमि पर पड़ा मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था -- कर्म गति टाले न टलै--
🎄 कर्म प्रधान विश्व रचि राखा -- जो जस करै सो तस फल चाखा ।।🎄
🚫 सायंकाल होने के बाद वे तीनों महारथी जंगल मे गए व विश्राम किया । उसी समय अश्वत्थामा ने देखा कि एक विशाल पेड़ पर सैकड़ो कौए आकर सो गए थे ; तभी एक बाज वहाँ आया और सोते हुए कौओ को उसने मार डाला । इससे प्रेरित होकर अश्वत्थामा ने उस रात्रि में ही युद्ध की थकान से सोते हुए सभी पांडवों ,युद्ध मे जीवित बचे पांडव पक्ष के सेनापति द्रष्टद्युम्न सहित सभी महारथियो और सैनिको को मार डालने का निश्चय किया । पहले कृपाचार्य और कृतवर्मा ने इस घोर अन्याय कारी कार्य का विरोध किया परंतु फिर वे भी उसे सहयोग देने को राजी हो गए ।
🚫 वे तीनो रात्रि में ही जब सब थकान के कारण सो रहे थे , पांडव शिविर के बाहर पंहुचे -- आश्चर्यचकित होकर उन्होंने देखा कि वहां अत्यंत रौद्र रूप में स्वयं रुद्र भगवान शिविर के द्वार पर खड़े है - अश्वत्थामा ने उन्हें हटाने के लिए रुद्र पर अपने दिव्य अश्त्रो का प्रहार किया परंतु भगवान रुद्र सभी अश्त्रो को पी गए - हारकर अश्वत्थामा ने रुद्र जी की स्तुति की फिर आग जलाकर उसमे बैठ गया ------

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