महाभारत कथा -402


 पोस्ट - ( 402 ) - अथ श्री महाभारत कथा -समीक्षा - ( २ ) - राजा जनमेजय का सर्पयज्ञ और " आस्तीक "द्वारा सर्पों की प्राण रक्षा -

     🎈 जैसा सर्वविदित है कि महाभारत के रचनाकार श्री वेदव्यास जी तथा लेखक भगवान श्री गणेश जी है । श्री व्यास जी के अनुरोध पर श्री गणेश जी ने इसे लिपिबद्ध करना स्वीकार किया था परन्तु शर्त रक्खी थी कि लेखन के दौरान अगर व्यास जी बोलना बन्द करेंगे तो वह वहीं से लिखना बन्द कर देंगे । श्री व्यास जी की भी शर्त थी कि हर श्लोक का अर्थ समझ कर ही वे उसको लिखें । एक बार व्यास जी ने बहुत ही कठिन श्लोकों की रचना करके उन्हें बोला । उनके अर्थ समझने के दौरान व्यास जी ने सैकड़ों श्लोकों की रचना कर दी और श्री गणेश जी की शर्त को निभाया ।

 ************ जनमेजय के सर्प यज्ञ की कथा ***

   श्री युधिष्ठिर के स्वर्गारोहण यात्रा पर जाने के बाद हस्तिनापुर के राजा ,अभिमन्यु पुत्र श्री परीक्षित की श्रंगी ऋषि के श्रापवश तक्षक नाग के डसने से हुई मृत्यु के बाद - उनके 5 वर्ष की बाल अवस्था के पुत्र श्री जनमेजय ,हस्तिनापुर के राजा बने थे । राजकाज उनके मंत्रियों की सहायता से सम्पन्न हुआ । युवा होने पर एक दिन जब वे राज दरबार मे बैठे थे तब एक ब्राह्मण " उतंक " उनके पास आया ।


     🌏 काफी समय पहले किसी कारण से उतंक का नाग जाति से वैर हो गया था । नागों से बदला लेने का उचित समय जानकर , राजा जनमेजय के दरबार मे आकर उसने जनमेजय के पिता परीक्षित के हत्यारे #तक्षक नाग के प्रति उनकी #क्षमाशीलता के लिए उनकी निंदा की और पूरी सर्प जाति से अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए जनमेजय को प्रेरित किया । जनमेजय अभी तक श्रापवश ही तक्षक के काटने की घटना को मानते और समझते थे । उतंक के कहने पर उन्होंने अपने मंत्रियों से अपने पिता की मृत्यु के बारे में विस्तृत रूप से जानना चाहा और पूछा कि सर्प के डसने के बाद उनका उचित इलाज क्यों नही हो सका ?


    🎈 मंत्रियों ने पूरी घटना के बारे में बताते हुए यह भी कहा कि सातवें दिन जब तक्षक पारीक्षित को काटने आ रहा था ,उसे रास्ते मे एक " कश्यप " नामक ब्राह्मण मिला , जिसने उसे बताया की वह तक्षक सर्प द्वारा काटने पर अपने मंत्रों से राजा पारीक्षित को जिंदा कर देगा । उसके पंहुचने के बाद सर्प राजा को जला भी नही सकेगा । अपनी शक्ति और अपने विष की तीक्षणता दिखाने के लिए तक्षक ने एक पेड़ को डसा । पेड़ पर चढ़े लकड़हारे सहित वह पेड़ तुरन्त भयँकर विष से जल गया । तब कश्यप ने अपने मंत्रों के बल से न केवल उस #पेड़ को पुनः #पूर्ववत हरा भरा कर दिया वरन उस #जले #मृत #लकड़हारे को भी #जीवित कर दिया । तब तक्षक नाग ने बहुत सा इच्छित धन देकर उस लालची ब्राह्मण कश्यप को रास्ते से ही वापस कर दिया । अगर उस ब्राह्मण को धन देकर तक्षक न लौटाता तो परीक्षित की मृत्यु नही होती ।


       🍎 मंत्रियों की बात को सुनकर राजा जनमेजय को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने पिता की मृत्यु का कारण केवल श्राप को ही न मान कर , मुख्य कारण ,तक्षक नाग के #द्वेष को माना और उतंक के परामर्शानुसार बदला लेने के लिए , तक्षक और सर्प जाति के विनाश के लिए " #सर्प #यज्ञ " करने का निश्चय किया । जनमेजय ने शास्त्रोक्त विधि से विशाल यज्ञ मंडप बनवाया और स्वयम् दीक्षित होकर ऋतवजों से सर्प यज्ञ प्रारम्भ कराया । होता लोग काले काले वस्त्रों को पहनकर मंत्रोच्चार पूर्वक हवन करने लगे । बेचारे सफेद ,काले ,पीले , बच्चे बूढ़े सभी सर्प तड़पते ,पुकारते ,उछलते ,आग में गिरने लगे । 


      🍊 सर्पयज्ञ में च्यवन वंशी "चंडभार्गव " मुख्य होता थे एवं पुत्र और शिष्यों के साथ श्री व्यास जी व अन्य बहुत से ऋषिगण भी होता थे । अपने लिए हो रहे यज्ञ का समाचार पाकर तक्षक देवराज इंद्र की शरण मे जाकर उनके सिंहासन से लिपट गया । अधिकांश सर्प नष्ट हो गए थे । अभी तक तक्षक को न आया देखकर जब पुरोहितों को उसके इंद्र की शरण मे जाने का पता चला तब उन्होंने सिंहासन और इंद्र सहित तक्षक को बुलाने का मन्त्र पढा । मंत्रों के प्रभाव से , हवन कुंड के सम्मुख आकाश में इंद्र और तक्षक आ गए ।


       🍎 उधर सर्पों के महाविनाश से घबराये ,सर्पराज वासुकी ने अपनी बहन #जरत्कारु से उसके पुत्र " #आस्तीक " को राजा जनमेजय के पास भेजकर सर्पयज्ञ बन्द करवाने का अनुरोध किया । अत्यंत तेजस्वी और विद्वान ब्राह्मण वटुक बालक "आस्तीक " ने यज्ञशाला में पंहुचकर यज्ञ की स्तुति की , और राजा जनमेजय की बहुत प्रशंशा की । इससे प्रसन्न हुए राजा ने आस्तीक से वर मांगने को कहा । आस्तीक ने अपने " मातृ कुल " नाग जाति की रक्षा के लिए सर्प यज्ञ तुरंत बंद करने का वर मांगा । वचन दे चुके राजा ने यज्ञ बन्द करके आस्तीक के पांडित्य की बहुत प्रशंशा की और उसे बहुत सा धन दान में भी देकर पूजित किया ।


    🎃 नियत का खेल देखिए ,जिसको नष्ट करने के लिए सर्प यज्ञ हुआ , वह तक्षक जिंदा बच गया और करोड़ों निरपराध सर्प मारे गए । पुराणों में वर्णित इच्छाधारी अत्यंत बलशाली नागों की जाति शायद इसी यज्ञ के बाद समाप्त हो गयी ।


  🌏🎃 आस्तीक के प्रयत्न से नाग जाति की रक्षा हुई । इससे प्रसन्न होकर सर्पराज वासुकी ने आस्तीक को वर दिया कि उसके " आस्तीक " नाम के उच्चारण करने और सौगंध देने वाले को किसी भी सर्प से भय नही होगा । क्रोधित सर्प भी उसके नाम की दुहाई सुनते ही क्रोध को त्याग देगा । कहा जाता है कि सर्प आज भी इस आन को निभाते है ।

      ************ क्रमशः ************* राम नाथ गुप्त ******

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