पोस्ट ( 406 ) - अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा - ( ६ ) राजा ययाति की कथा - कच और देवयानी की एकतरफा प्रेम कहानी --
🍎 राजा जनमेजय की प्रार्थना पर , अब वैशम्पायन जी ने शरू से " स्वयम्भू मनु " से इतिहास का वर्णन करते हुए प्रसिद्ध महराजा पुरुरवा जो समुद्र के तेरह द्वीपों के शाशक थे ,उनका वर्णन किया । पुरुरवा स्वर्ग से तीन प्रकार की अग्नि और अप्सरा उर्वशी को ले आये थे परन्तु अपनी उच्चँखलता के कारण ऋषियों के श्राप के कारण नष्ट हो गए थे ।
🍎 पुरुरवा के पौत्र राजा नहुष बहुत बुद्धिमान और वीर सम्मानित राजा हुए । देवराज इंद्र की अनुपस्थित में नहुष को ही देवताओ ने इंद्र के पद पर अभिषिक्त किया था । मगर अभिमानवश काम के वशीभूत होकर , इंद्र की पत्नी शची को पाने की जबरदस्त लालसा में नहुष ने ऋषियों से अपनी पालकी उठवाई और फिर उसके कारण एक ऋषि के श्रापवश उनका नाश हुआ । राजा नहुष के पुत्र परमवीर चक्रवर्ती सम्राट ययाति हुए ।
🍘 राजा ययाति के विषय मे विस्तार से सुनने की प्रार्थना करने पर ऋषिवर श्री वैशम्पायन जी ने " कच और देवयानी " के चरित्रों से कथा सुनाना प्रारम्भ किया । पूर्वकाल में त्रिलोकी पर अधिकार करने के लिए हुए देवासुर संग्राम में , देवताओ ने असुरों को मार डाला था तब असुरों के पुरोहित गुरु शुक्राचार्य ने अपनी संजीवनी विद्या के प्रभाव से सभी मृत असुरों को पुनः जीवित कर दिया था । देवताओं के पास ऐसी कोई विद्या नही थी तब वे घबराकर अपने गुरु बृहस्पति के पुत्र " कच " के पास गए और उससे दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के पास जाकर संजीवनी विद्या सीखने का अनुरोध किया और इसके पुरस्कार में उसे यज्ञों में भाग देने का वचन भी दिया ।
🌰 तदुपरांत कच ने देव जाति के हित के लिए दैत्यराज वृषपर्वा के यहां रह रहे गुरु शुक्राचार्य के पास जाकर उन्हें अपना सच्चा परिचय देते हुए अपने को शिष्य के रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना की तथा इस अवधि में ब्रम्हचर्य व्रत को पालन करने की भी प्रतिज्ञा की । देवगुरु बृहस्पति से द्वेष रखने वाले शुक्राचार्य ,उनके पुत्र के गुरु बन कर उन्हें नीचा दिखाने की मनोभावना से प्रसन्न हो गए और- उन्होंने कच को शिष्य बना लिया ।
🚫 कच ने शिष्य धर्म का पालन करते हुए गुरु और गुरु की अत्यंत सुंदर युवा पुत्री देवयानी की काफी समय तक बहुत सेवा की । देवयानी उसकी सेवा से प्रसन्न होकर एकतरफा रूप से कच के प्रति आसक्त हो गयी । राक्षसों को जब बृहस्पति पुत्र कच के आने का उद्देश्य ---* देवताओं के लिए संजीवनी विद्या को पाना * -- पता लगा तब संजीवनी विद्या की रक्षा के लिए ,उन्होंने - जब कच जंगल मे गायों को चराने गया था , उसे मार डाला था उसके मांस को टुकड़े टुकड़े करके जंगली भेड़ियों को खिला दिया ।
🚫 सांयकाल को कच के न लौटने से परेशान देवयानी अपने पिता शुक्राचार्य से बोली - " मुझे आशंका है कि किसी ने उसे मार डाला है ,मैं सौगंध खाकर कहती हूँ कि मैं कच के बिना जीवित नही रह सकती " ।
तब शुक्राचार्य ने अपनी संजीवनी विद्या का प्रयोग करके उसे बुलाया - "आओ बेटा " -- विद्या का कमाल - भेड़ियों के एक एक अंग को छेदकर कच निकल आया और उसने सारा वृतांत सुनाया । एक बार फिर यही घटना और हुई ।
🚱 तीसरी बार नयी युक्ति करते हुए असुरों ने कच को मारकर उसके शरीर को जला दिया और राख , वारुणी ( शराब ) में मिलाकर उसे शुक्राचार्य को ही पिला दिया । इस बार शुक्राचार्य द्वारा पुकारने पर कच ने उनके पेट के भीतर से ही बोलकर अपनी स्थिति बताई । अब कच के जीवित होने के माने - स्वयम् शुक्राचार्य की मौत थी । परंतु देवयानी के व्याकुल होने और किसी भी कीमत पर कच को पाने की जिद्द पर शुक्राचार्य , अपने पेट मे स्थित कच से बोले -
🍎🌰 " बेटा ! अब तुम सिद्ध हो । देवयानी तुम्हारे बिना नही जी सकती है इसलिए लो मैं तुम्हे संजीवनी विद्या सिखाता हूँ । इस विद्या को पाकर तुम मेरा पेट फाड़कर निकल आओ । तुम मेरे पेट मे रह चुके हो ,इसलिए सुयोग्य पुत्र के समान फिर संजीवनी विद्या से मुझे जीवित कर देना " -- ऐसा ही हुआ ।
🌏 शुक्राचार्य को यह जानकर बहुत क्रोध हुआ कि धोखे में शराब पी लेने के कारण उनके विवेक का नाश हो गया था और वे ब्राह्मण कुमार कच को भी पी गए थे । उन्होंने घोषणा की --
🍎🍊🎃 " आज से जगत का कोई भी ब्राह्मण शराब पियेगा तो वह #धर्मभ्रष्ट हो जाएगा और उसे #ब्रम्हहत्या लगेगी । ब्राह्मणों ,देवताओं और मनु की संतानें सावधानी के साथ सुन लो ,आज से मैने #ब्राह्मणों के लिए #धर्म #मर्यादा सुनिश्चित कर दी है "
देवयानी ने कच से प्रेम की भिक्षा मांगी परन्तु कच ने कहा कि वह उसके पिता के पेट मे रहा है तथा हमेशा उसने गुरु शुक्राचार्य को धर्म पिता तथा उसे धर्म बहिन माना है इसलिए उनमें पति पत्नी का सम्बंध होना सम्भव
ही नही है । तक क्रोधित देवयानी ने कच से बोली ~
🎈🎈-" यदि तुम धर्म और काम की सिद्धि के लिए मुझे अस्वीकार कर दोगे ,तो तुम्हारी #संजीवनी विद्या #सिद्ध #नही होगी । इस पर कच भी भी देवयानी से बोला -
🎆" बहिन ! मैने गुरुपुत्री समझ कर ही तुम्हे अस्वीकार किया है ,कोई दोष देखकर नही । तुमने मुझे धर्म के अनुसार नही बल्कि काम के वशीभूत होकर श्राप दिया है : जाओ तुम्हारी #कामना कभी पूरी #नही होगी । कोई भी #ब्राह्मण कुमार तुमसे #विवाह #नही करेगा । मेरी विद्या सिद्ध नही होगी उससे क्या ? मैं जिसे सिखाऊंगा उसकी विद्या अवश्य सफल होगी ।"
ऐसा कहकर कच स्वर्ग चला गया । देवताओ ने बड़े हर्ष से उसका स्वागत और अभिनन्दन किया और वचन के अनुसार कच को भी यज्ञों में भागीदार बना लिया ।
अभिमान , शराब और अतिशय पुत्री प्रेम -- गुरु शुक्राचार्य और दैत्यों के पराजय के कारण बने ~
🎃🎃 दैत्य गुरु शुक्राचार्य के देवगुरु बृहस्पति से श्रेष्ठ होने के अभिमान , शराब पीने और अतिशय पुत्री प्रेम के कारण ,उनकी विकट तपस्या से महामृत्युंजय शिव जी से प्राप्त अत्यंत दुर्लभ संजीवनी विद्या , दुश्मन देवताओं तक पँहुच गयी ।
*************** क्रमशः ***************** राम नाथ गुप्त **********

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