महाभारत कथा 508,भगवान श्री कृष्ण का बलराम जी को समझाना


 पोस्ट --( 508 )--  अथ श्री महाभारत कथा -- समीक्षा ( १०८ )- भगवान श्री कृष्ण का बलराम जी को समझाना - अपनी उन्नति के 6 प्रकारों की व्याख्या - पहले से दिव्यास्त्रों से दग्ध हो चुका अर्जुन का रथ श्री कृष्ण के उतरते ही भस्म हो गया ।


       जब भीमसेन ने  गदा युद्ध नियम के विरुद्ध जाकर दुर्योधन की जांघो पर गदा का प्रहार करके दुर्योधन को मरणासन्न कर दिया तब  वहां मौजूद श्री बलराम जी  इस पर अत्यंत क्रोधित हुए और अपना अस्त्र " हल " ऊपर की ओर उठाये  भीम को मारने दौड़े -- 

यह देख कर  श्री  कृष्ण ने बड़ी विनती और बड़े प्रयत्न के साथ अपनी दोनों भुजाओ से  बलराम जी को पकड़ लिया --और उन्हें शांत करते हुए कहा --

(महाभारत शल्य पर्व अ 60 श्लोक --13/25)


        🚫   "" अपनी उन्नति 6 प्रकार की होती है - 


   1- अपनी वृद्धि ----  और -

2- शत्रु की हानि ------- 

3- अपने मित्र की वृद्धि और ------ 

4- शत्रु के मित्र की हानि --


5- -अपने मित्र के मित्र की वृद्धि ------

6- शत्रु के मित्र के मित्र की हानि-- 


       🌏अपने या मित्र की जब विपरीत दिशा आ जाती है तब मन मे ग्लानि होती है -- आप जानते है कि पांडव लोग हमारे स्वाभाविक मित्र है  । ये विशुद्ध पुरुषार्थ का भरोसा रखते है । बुआ के लड़के होने तथा  बहन से रिश्ता होने  के कारण हर तरीके से अपने है ।  शत्रुओ ने कपट पूर्ण व्योहार करके इन्हें  पहले बहुत कष्ट पंहुचाया है । सभा भवन में भीम ने यह प्रतिज्ञा की थी कि  मैं अपनी  गदा से दुर्योधन की जाँघे तोड़  डालूंगा । प्रतिज्ञा पालन छत्रिय के लिए धर्म है  , और भीम ने उसी का पालन किया है -- 


      🍎  महर्षि मैत्रेय ने  भी इसे यह श्राप दिया था कि भीम अपनी गदा से तेरी जाँघे तोड़ डालेगा --इस प्रकार यही होनहार थी  । मैं इसमें भीम का कोई दोष नही देखता हूँ  । इन लोगो की उन्नति में हम लोगो की भी  उन्नति है -- इस लिए  आप क्रोध न करें -""


     श्री बलराम जी बोले - ""भीमसेन ने धर्म को हानि पंहुचाकर हम सब को विकृत कर डाला है -""


     🌏 श्री कृष्ण ने फिर  जवाब दिया -- ""समझ लीजिए कलयुग आ गया  । भीम की प्रतिज्ञा को भुला न दीजिये -- पांडवो  को  #वैर और   #प्रतिज्ञा के ऋण से मुक्त होने दीजिए ""


      श्री बलराम इसपर भी संतुष्ट नही हुए  और दुर्योधन की प्रसंशा तथा भीम की आलोचना करते हुए रथ पर बैठ कर  द्वारिका चले गए ।


     🚫  भीमसेन ने युधीष्ठिर को प्रणाम करते हुए सभी शत्रुओ  के मारे जाने उनके सारे भूमण्डल के स्वामी बन जाने पर हर्ष प्रकट किया -- पांडव वीर भीमसेन की प्रसंशा और दुर्योधन की निंदा करने लगे तब श्री कृष्ण ने उन्हें समझाया के मारे हुए को और मारना उचित नही है -- मरते हुए दुर्योधन ने अर्जुन और पांडवो  की निंदा की तब श्री कृष्ण ने उसे उसके  द्वारा किये गए अत्याचारों की याद दिलाई  -  दुर्योधन के  इस प्रकार कौशल से मारे जाने के कारणऔर घोड़ो सहित  पांडवों  को दीनचित्त  और चिंतामग्न  देखकर श्री कृष्ण  बोले  ---


     🌐 "" महान शत्रु को  #कूटनीति का प्रयोग करके  #माया कौशल द्वारा  #वध करना  #योग्य है -,पूर्व में देवताओ ने भी ऐसा ही किया था ( महाभारत शल्य पर्व  अ 61 श्लोक 61 / 69 ) --- फिर सभी पांडव व उनके सहयोगी रथों पर बैठकर छावनी की ओर चले गए ।


   ( महाभारत  शल्य पर्व  अध्याय 62 श्लोक 18 से 26 )


     🍎 तदनंतर पांडव कौरव शिविर में गए -वहां  सभी अपने अपने रथों से उतरे -- हमेशा अर्जुन से पहले रथ से उतरने वाले श्री कृष्ण ने अर्जुन से गांडीव धनुष आदि शस्त्र लेकर  रथ से  पहले उतरने की आज्ञा दी -- अर्जुन के रथ से उतरने के बाद   भगवान  श्री कृष्ण स्वयम् उतरे --

 भगवान के रथ से उतरते ही ध्वज स्वरूप वह #दिव्य  #वानर   #अदृश्य हो गया और फिर अर्जुन का वह विशाल रथ  जो द्रोणाचार्य  और भीष्म के  #दिव्यास्त्रों  से  #दघदप्राय को चुका था,  #आग से  #प्रज्वलित  हो  उठा --और फिर घोड़ो सहित भस्म हो गया  -


        उस रथ को भस्मीभूत  हुआ देखकर  समस्त पांडवो ने  आश्चर्यचकित होकर हाथ जोड़कर भगवान श्री कृष्ण के चरणों मे बारम्बार प्रणाम करके उनसे  इसका कारण   पूछा --तब श्री कृष्ण बोले  -


      🎆" नाना प्रकार  के  दिव्य अश्त्रो ,द्वारा पहले ही यह  दघ्द हो चुका था - परंतु मेरे बैठे होने के कारण समरांगण में जल कर नही गिर सका -आज जब तुम सब अपना अभीष्ट कार्य  पूर्ण कर चुके हो ,तब मैंने इसे छोड़ दिया है -इस लिए पहले से ही ब्रम्हास्त्र से जला हुआ यह रथ  बिखर कर गिर पड़ा  है ""


      🌏""पहले अर्जुन के साथ जब मैं उपल्वय  नगर में आया था तब आप युधिष्ठिर ने मुझसे कहा था - यह अर्जुन तुम्हारा भाई और सखा है ,तुम्हे इसकी सब आपत्तियों से रक्षा करनी चाहिए  -अब अर्जुन मेरे द्वारा सुरक्षित रहकर अपने सभी भाइयो सहित विजयी हुआ है और जीवित बचा है ।


          धर्मराज  युधिष्ठिर ने  भगवान श्री कृष्ण का आभार व्यक्त करते हुए कहा --" उप्लवय नगर में महर्षि कृष्ण द्वयपायन  व्यास जी ने उनसे कहा था - 


        🚫 "" जहां धर्म  है वहीं श्री कृष्ण है  और जहां श्री कृष्ण  है वही विजय है  ""🚫


         शेष  अगली पोस्ट में 

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