पोस्ट -( 504 ) ="श्री महाभारत की कथाएँ ~( १०४ ) ~ कर्ण वध के लिए अर्जुन को प्रोत्साहित करने और धर्म की दुहाई देने पर कर्ण को श्री कृष्ण का उत्तर ~ कर्ण वध ~~
🍎 युधिष्ठिर से कर्ण का वध करने की प्रतिज्ञा करने के बाद जब श्री कृष्ण के साथ अर्जुन उनके शिविर से बाहर निकले ,तब अर्जुन के शरीर से बड़े जोर का पसीना छूटने लगा और मन ही मन भारी चिंता होने लगी कि कर्ण का वध कैसे होगा ? रथ में बैठकर चलते समय गांडीव धारी अर्जुन को चिंतामग्न देखकर श्री कृष्ण ने उसे अनेकों तरह से तथा उसके पराक्रम की कथाएँ कहकर उसे समझाया । श्री कृष्ण ने कर्ण के भी महान बल वीर्य का वर्णन करके उसका वध करने के लिए अर्जुन को प्रोत्साहित किया ।
♥️ तदन्तर कर्ण का वध करने के लिए कृतसंकल्प होकर जाते हुए अर्जुन से श्री कृष्ण ने ~ दुर्योधन , कर्ण आदि के अन्यायपूर्ण आचरणों की याद दिलाकर अर्जुन को उत्तेजित करते हुए फिर कहा ~
💞 " मैं महारथी कर्ण को तुम्हारे समान या तुम से भी बढ़कर मानता हूँ अतः महासमर में महान प्रयत्न करके तुम्हे उसका वध करना होगा । मेरा विचार है कि कर्ण तुम्हें छोड़कर इंद्र सहित सम्पूर्ण देवताओं के लिए भी अवध्य है , अतः तुम आज सूतपुत्र का वध करो । जैसे सिंह मतवाले हाथी को मार डालता है ,उसी प्रकार तुम भी अपने बल और पराक्रम से शूरवीर कर्ण को मार डालो । इसके लिए मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ । "
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🇦🇺 तदन्तर अर्जुन के शौर्य- वीर्य और शक्ति - बल तथा विजयी स्वभाव की प्रशंशा करके उसे पुनः उत्तेजित किया । तदनन्तर कर्ण के साथ युद्ध में जब कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया और वह रथ से उतरकर उसे निकालने लगा ,उसी समय भगवान के आदेश से अर्जुन को बाण चलाते देखकर कर्ण ने धर्म की दुहाई देते हुए कहा ~
🍅-" मैं जब तक रथ पर बैठ न जाऊं ,तब तक तुम अपना हाथ रोके रहो , यही वीरों का धर्म है । वीर लोग निहत्थे पर बाण नहीं चलाते ।"
तब भगवान श्री कृष्ण ,कर्ण को उसके कुकर्मों की याद दिलाकर उसे हतप्रभ करते हुए बोले ~
( महाभारत कर्ण पर्व अध्याय 91 श्लोक 1 से 14 तक )
💞♥️ " राधानन्दन ! सौभाग्य की बात है कि आज तुम्हें धर्म की याद आ रही है । प्राय: नीच मनुष्य विपत्ति में पड़ने पर दैव की निंदा करते हैं ; अपने किये कुकर्मों की नहीं । कर्ण ! जब तुमने ,दुःशाशन और शकुनि ने एक वस्त्र धारण करने वाली रजस्वला द्रोपदी को सभा में बुलवाया था , उस समय तुम्हारे मन में धर्म का विचार नहीं उठा था ? जब कौरव सभा में जुए के खेल का ज्ञान नहीं रखने वाले राजा युधिष्ठिर को शकुनि ने जानबूझकर छलपूर्वक हराया था , उस समय तुम्हारा धर्म कहां चला गया था ? "
♥️ " कर्ण ! वनवास के तेहरवां वर्ष बीत जाने पर भी ,जब तुमने पांडवों का राज्य उन्हें वापस नहीं दिया था ,उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था ? जब दुर्योधन ने तुम्हारी ही सलाह लेकर भीमसेन को जहर मिलाया हुआ अन्न खिलाया और उन्हें सांपों से डँसवाया , जब वर्णावर्त नगर में लाक्षा भवन के भीतर सोए हुए कुंती कुमारों को , जब तुमने जलाने का प्रयत्न कराया था ,उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था ?
💞♥️ " भरी सभा में दुःशाशन के वश में पड़ी हुई रजस्वला द्रोपदी को लक्ष्य करके जब तुमने उपहास किया था ,तब तुम्हारा धर्म कहां चला गया था ? राधानन्दन ! पहले नीच कौरवों द्वारा क्लेश पाती हुई निरपराध द्रोपदी को ,जब तुम निकट से आंखें फाड़कर फाड़कर देख रहे थे , तब तुम्हारा धर्म कहां चला गया था ? जब तुमने द्रोपदी से कहा था - ' कृष्णे ! पांडव नष्ट हो गए ,सदा के लिए नरक में पड़ गए । अब तू किसी दूसरे पति का वरण कर ले "-- तब तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था ? कर्ण फिर राज्य के लोभ में पड़कर तुमने शकुनि की सलाह से जब पांडवों को दुबारा जुएं के लिए बुलवाया ,उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था ? " जब युद्ध में तुम बहुत से महारथियों ने मिलकर बालक अभिमन्यु को चारों ओर से घेर कर मार डाला था ,उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था ?"
🇦🇺" यदि उन अवसरों पर यह धर्म नहीं था ,तो आज भी यहां सर्वथा धर्म की दुहाई देकर , तालु सुखाने से क्या लाभ ? कर्ण ! अब यहां धर्म के कितने ही कार्य क्यों न कर डालो , तथापि जीते जी तुम्हारा छुटकारा नहीं ही सकता । पुष्कर ने राजा नल को जुएं में जीत लिया था ; किंतु उन्होंने अपने ही पराक्रम से पुनः अपने राज्य और यश दोनों को पुनः प्राप्त कर लिया । इसी प्रकार लोभ शून्य पांडव भी अपनी भुजाओं के बल से सम्पूर्ण सगे
संबंघियों के साथ रहकर समरांगण में बड़े बड़े शत्रुओं का संहार करके ; फिर अपना राज्य प्राप्त करेंगे ।
पुरुषसिंह पांडव सदैव अपने धर्म से सुरक्षित हैं ; अतः उनके द्वारा अवश्य धृतराष्ट्र के पुत्रों का नाश हो जाएगा ।
🍅 उस समय भगवान श्री कृष्ण के ऐसा कहने पर कर्ण ने लज्जा से अपना सिर झुका लिया , उससे कुछ भी उत्तर देतें नहीं बना । भगवान श्री कृष्ण के आदेश पर अर्जुन ने अपने गांडीव पर तीर चढ़ाकर उससे कर्ण के सिर को काट डाला और इस प्रकार कौरव सेनापति कर्ण का भी वध हो गया ।
*** क्रमशः *****
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