महाभारत कथा 499,द्रोणाचार्य का वध


 पोस्ट --( 499 )--- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा --( ९९ )- गुरु द्रोणाचार्य का वध ; भगवान श्री कृष्ण द्वारा अश्वत्थामा के छोड़े नारायणास्त्र से पान्डवों की रक्षा --

      🎈भगवान श्री कृष्ण के समझाने के बाबजूद घटोत्कच की मृत्यु से अत्यंत दुखी राजा युधिष्ठिर उसी समय रात्रि में कर्ण से युद्ध करने के लिए रथ पर चढ़ कर जाने लगे -तब श्री व्यास जी ने वहां प्रकट होकर युधिष्ठिर को बहुत समझाया और #जल्दबाजी में कोई #काम करने से #मना किया --

     🍘 उस समय रात्रि में दोनों सेनाओ के सैनिक बहुत थक गए थे तब अर्जुन ने कुछ समय सेनाओ को विश्राम करने का सुझाव दिया जिसे द्रोणाचार्य ने मान लिया -- द्रोणाचार्य के अपने शिविर में पंहुचते ही दुर्योधन ने #विश्राम के निर्णय के लिए #द्रोणाचार्य को रोष पूर्वक काफी #उलाहना दिया - उस रात चंद्रोदय होते ही पुनः युद्ध शुरू हुआ 


      🍊 दुर्योधन के उलाहना से व्यथित श्री द्रोणाचार्य ने अगले दिन #कर्ण के साथ मिलकर पांडव सेना का #भयंकर #संहार शुरू किया तब ऋषियों ने आकाश में प्रगट होकर द्रोणाचार्य को शश्त्र त्यागने का निर्देश दिया


    🍎 -- जब तक गुरु द्रोणाचार्य के पास अस्त्र शस्त्र हो , उन्हें पराजित करना असंभव था --


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     🍱 पांडवो को यह बात पता चली कि अगर किसी अत्यंत #प्रियजन की #मृत्यु का समाचार द्रोणाचार्य को मिले तो वह दुख में #शस्त्र #त्याग देगे -- भगवान श्री कृष्ण की सलाह पर पहले भीमसेन ने अश्वत्थामा नाम के हाथी का वध किया फिर जोर जोर से " अश्वत्थामा मारा गया " चिल्लाने लगे -

    🚫 इसे "द्रोणाचार्य के एकमात्र पुत्र महारथी अश्वत्थामा की मौत की बात की घोषणा " सभी ने माना ।


    🍎 पांडव वीर हर्ष में भर कर नाचने लगे -- चकित द्रोणाचार्य ने इसकी पुष्टि करने के लिये सत्यवादी युधिष्ठिर से पूछा । श्री कृष्ण की पूर्व निश्चित योजना के अनुसार युधिष्ठिर ने अर्ध्य सत्य बोला , वे जोर से चिल्लाकर बोले --  

   🎃 " हाँ अश्वत्थामा मारा गया "" फिर धीरे से बोले " मनुष्य या हाथी मुझे नही पता ""🎃


   🚫-इसी बीच जोरो से नगाड़े बजा दिए गये जिससे बाद वाली बात किसी को नही सुनाई दी -- सभी जानते थे कि युधिष्ठिर हमेशा सत्य ही बोलेंगे ,इस लिए पुत्र के वियोग में द्रोणाचार्य ने अपना धनुष और हथियार नीचे रख दिये फिर योगासन लगाकर प्राण छोड़ दिये -- उसी समय पांडव सेनापति द्रष्टद्युम्न ने तलवार से द्रोणाचार्य का सिर काट दिया --


      🚫 ****द्रुपद की यज्ञ में द्रष्टद्युम्न का प्राकट्य द्रोणाचार्य का वध करने के उद्देश्य से ही हुआ था -- उसने अपना कार्य पूरा किया **** 🚫

      🍎 अपने सेनापति द्रोणाचार्य की मृत्यु होते ही कौरव सेना में भगदड़ मच गयी --पिता की मृत्यु के कारण को जानकर अश्वत्थामा बेहद क्रोधित हुआ - उसने #नारायणास्त्र का प्रयोग किया --


     🚫 भयंकर अग्नि से प्रज्वलित " नारायण अस्त्र "" को आते देख युधिष्ठिर सर्वनाश होता जानकर विषाद करने लगे -- तब नारायण के अवतार भगवान श्री कृष्ण ने अपने ही नारायणास्त्र की काट -- उससे बचने का उपाय बताया -श्री कृष्ण ने सभी से अपने #अस्त्रो #शस्त्रों को #त्यागकर रथ से उतरकर , सर झुकाकर , #हाथ #जोड़ कर #खड़े हो जाने को कहा । 

     🚫🎃 नारायण अस्त्र , निहत्थे , और शरण मे आये हुए व्यक्ति पर प्रहार नही करता था - सभी को विनम्रता से खड़े देखकर नारायण अस्त्र शांत हो गया -- 


   ******** व्याख्या ************** अपनी बात ***************

      🌏 चाहे नारायण हों या उनका नारायण अस्त्र , यह शरण मे आये हुए व्यक्ति की हमेशा रक्षा करते है 


       राम चरित मानस ( सुंदर कांड दोहा 47 / 48 )----प्रभु राम स्वयम विभीषण से कहते है ---- 

                    जो नर होइ चराचर द्रोही । आवै सभय शरण तकि मोही ।।

                    तजि मद मोह कपट छल नाना । करउ सद्द तेहि साधु समाना ।।

                     जननी जनक ,बन्धु सुत दारा । तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा ।।

                     सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहिं बांधि बर डोरी ।।

                      समदरसी इच्छा कछु नाहीं । हर्ष सोक भय नहिं मन मांही ।।

                      अस सज्जन मम उर बस कैसे । लोभी ह्रदय बसहि धनु जैसे ।।

      🎃 भगवान राम कहते है -- सारे विश्व से द्रोह करने वाला व्यक्ति भी अगर मोह कपट छल छोड़कर मेरी शरण मे आता है तो मैं उसे साधू के समान पवित्र बना देता हूँ , जो व्यक्ति माता ,पिता , भाई ,पुत्र ,अपने शरीर ,धन , मकान , प्रियजनों ,परिवार के प्रति लगाव ( प्रेम ) को एक डोरी में बटकर मेरे पैरों से बांध देता है , समदरसी है , जिसके मन मे हर्ष शोक और कोई इच्छा बाकी नही है, ऐसे सज्जन व्यक्ति को मैं अपने ह्रदय में बसा लेता हूं जैसे लोभी के ह्रदय में केवल धन ही बसता है 🍅

            मनुष्य को केवल इतना ही कहना पड़ता है -- 

             🎈 श्रवन , सुजसु सुनि आयऊ , प्रभु भँजन भव भीर ।

                   त्राहि त्राहि आरति हरण , सरन सुखद रघुबीर ।। 🎈 ( सुंदर कांड दोहा 45 )


          🎇 जब प्रभु की शरण ग्रहण कर ली तब नारायण के प्रसन्न होते ही नारायणास्त्र ( दुःखो , पीड़ा , संकट ) को शांत होकर अंतर्ध्यान होना ही है और तब आनन्द ही आनन्द और परमानन्द है -

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