महाभारत कथा 496


 पोस्ट --( 496 )-- अथ श्री महाभारत कथा -- समीक्षा --( ९६ )- द्रोणाचार्य द्वारा चक्रव्यूह का निर्माण - कौरव योद्धाओं द्वारा घेरकर निहत्थे अभिमन्यु का वध और "" बिना सोचे समझे प्रतिज्ञा करके चक्कर मे पड़े अर्जुन""

      🍅 इच्छा मृत्यु का वरदान पाए शर शैया पर पड़े भीष्म पितामह ने असीमित कष्टो को सहते हुए भी सूर्य के उत्तरायण होने ( १४ जनवरी से सूर्य उत्तरायण होता है ) पर शरीर छोड़ने का निश्चय किया - सनातन मान्यताओं के अनुसार उत्तरायण में मरने वालों की आत्मा उत्तम लोको को जाती है --

        🚫 अपने शिविर में हर्ष से बैठे हुए पांडवो के पास जाकर श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बधाई देते हुए कहा ( भीष्म पर्व अध्याय 120 श्लोक 66/67 )

        🍱 -"- कुरुनन्दन ! सौभाग्य की बात है कि तुम जीत रहे हो , यह भी भाग्य की बात है कि भीष्म रथ से गिरा दिए गए - उन्हें मनुष्य तथा संपूर्ण देवता भी मिलकर हरा नही सकते थे" युधिष्ठिर ने भी भगवान श्री कृष्ण का आभार व्यक्त किया 

       श्री भीष्म जी के युद्ध मैदान से हटने के बाद गुरु #द्रोणाचार्य जी #कौरवो के #सेनापति बने । अब कर्ण भी उनके नेतृत्व में युद्ध मे शामिल हुआ - 

      🚫 द्रोणाचार्य ने दुर्योधन को पांडवों के राजा युधिष्ठिर को कैद कर लेने और इस प्रकार कौरवों को विजय दिलाने का आश्वासन दिया - सबसे विकट व्यूह चक्र व्यूह का भेदन करना केवल अर्जुन ही जानते थे ,इस लिए संतप्तको से युद्ध मे अर्जुन व श्री कृष्ण को बहुत दूर योजनानुसार उलझा दिया गया और फिर आचार्य द्रोण ने चक्रव्यूह की रचना की -

      🍎 अर्जुन के न होने के कारण पांडव विकट चिंता में पड़ गए । व्यूह के द्वार रक्षक स्वयं आचार्य द्रोण थे ।

वे पांडव सेना का संहार कर रहे थे और किसी को अंदर घुसने नही दे रहे थे -

      🚫अर्जुन के 16 वर्षीय पुत्र #अभिमन्यु ने अपनी गर्भावस्था में पिता अर्जुन को, माता से व्यूह के अंदर जाने की विधि बताते हुए सुना था - उसने दादा युधिष्ठिर से व्यूह भेदन करने की इजाजत मांगी व बताया कि वह भेदन की विधि तो जानता है परंतु निकलने की नही - तब युधिष्ठिर और भीमसेन ने उसे उसके साथ चलने का आश्वासन दिया - अभिमन्यु बड़ा बलवान , पराक्रमी और उत्साही था ,वह कौरवो की चतुरंगी सेना का संहार करते हुए व्यूह का द्वार तोड़ते हुए उसमें घुस गया ; परंतु अभिमन्यु के पीछे आने वाले वीरो को जयद्रथ ने वरदान के प्रभाव से रोक दिया -बड़े बड़े योद्धाओ को अभिमन्यु ने मार डाला और आचार्य द्रोण की सेना में भगदड़ मच गई 

     🎈 तब द्रोणाचार्य ,कृपाचार्य ,कर्ण ,अश्वत्थामा , ब्रह्तद्वल , और कृतवर्मा इन 6 महारथियो ने अभिमन्यु को घेर लिया -अकेले पड़े अभिमन्यु ने एक बार उन्हें परास्त भी किया परंतु उन्होंने एक साथ प्रहार करके उसे रथ और शश्त्र विहीन कर दिया और फिर निहात्थे अभिमन्यु का क्रूरतापूर्वक वध कर दिया ।


       🌰 पांडवो को अभिमन्यु के वीरगति प्राप्त करने से बहुत दुख हुआ --अर्जुन अपने पुत्र के मारे जाने से व्याकुल हो गए और इसका मुख्य दोषी " जयद्रथ " जिसने वरदान के प्रभाव से किसी सहायक को अभिमन्यु के साथ व्यूह में नही जाने दिया को माना -- 

        🚫 अत्यंत रोष में भरकर अर्जुन ने जयद्रथ को अगले दिन सूर्यास्त के पूर्व ही मारने की प्रतिज्ञा कर ली तथा ऐसा न कर पाने पर स्वयम चिता में प्रवेश करने की भी प्रतिज्ञा की 🚫


    🎈विकट प्रतिज्ञा जो केवल श्री कृष्ण के कारण पूरी हो सकी ( महाभारत द्रोण पर्व अ 77श्लोक 21/ 42 )

      🎃 पांडवो की बिना सोचे समझे प्रतिज्ञा करने की आदत ने अर्जुन के जीवन तथा युद्ध के परिणाम पर

 भयँकर संकट पैदा कर दिया -- भविष्य के प्रति चिंतित भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से विजय के लिए रात्रि में भगवान शिव का पूजन करवाया -- श्री कृष्ण अर्जुन की जयद्रथ वध प्रतिज्ञा को स्मरण करके अर्ध रात्रि में जग गए और अर्जुन के प्रेम में उन्मत्त से होकर अपने सारथी दारुक को बुला कर उससे बोले -

 ~~~ श्री कृष्ण उवाच ~~~~

     🍎🌰 "" अपने पुत्र के मारे जाने से शोकातुर होकर अर्जुन ने जो शाम तक जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा की है ,अब दुर्योधन जयद्रथ को अपनी सेना के सभी वीरो से सुरक्षित करके ऐसी व्यवस्था करेगा कि कोई जयद्रथ को देख भी न सके - द्रोणाचार्य से सुरक्षित जयद्रथ को इंद्र भी नही मार सकते है परंतु मैं कल वह उद्योग करूंगा जिससे अर्जुन सूर्यास्त के पूर्व ही जयद्रथ को मार सकें""

     🌰 🚫 "" मुझे अर्जुन के समान कोई प्रिय नही है , मैं अर्जुन के लिए दुर्योधन सहित उनकी पूरी सेना को नष्ट कर दूंगा - दारुक ! धनंजय ( अर्जुन ) के लिए युद्ध मे पराक्रम प्रकट करते हुए मैं अपने चक्र से कौरवो की सेना को चूर चूर करते हुए मार गिराऊंगा , तीनो लोक मुझे देखें --🚫

     🎈🌰 जो अर्जुन से द्वेष रखता है , वह मेरा भी दुश्मन है -प्रात:काल मेरा सुसज्जित रथ लेकर युद्ध मैदान में पंहुचो -- दारुक बोला कि आप जिसके सारथी बने है , उसे कौन मार सकता है आप चिंता न करे ।

     🍱 इधर अर्जुन भगवान शिव के मंत्र का चिंतन करते हुए सोये , स्वप्न में उन्होंने श्री कृष्ण को अपने पास आया देखा और उन्होंने जयद्रथ वध कैसे सम्भव है यह श्री कृष्ण से पूछा ,फिर दोनों भगवान शिव जी के पास कैलाश गए -अर्जुन के निवेदन पर भगवान शिव ने उन्हें पाशुपतास्त्र प्रदान किया - यह सब उहोने स्वप्न में देखा ।

        

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