पोस्ट --( 492 )-- अथ श्री महाभारत कथा समीक्षा ( ९२ ) -- महाभारत युद्ध में दो सर्वश्रेष्ठ सारथी थे
** भगवान श्री कृष्ण और महराजा शल्य --
🚫 *सारथी से मतलब हमारे जीवन के उद्देश्य -नीतियाँ -निश्चित कर उन उद्देश्यों को सफलता से पाने में आने वाली बाधाओं का निवारण कर ; सफलता पाने के सरलतम साधन पर हमे ले जाकर ; हमे हर और विजय दिलाने वाले में सक्षम व्यक्ति को भी सारथि कहते है जिसे हम जीवन की बागडोर सौंप देते है -
🍊 परन्तु महाभारत युद्ध के सम्बन्ध में अपने महारथी योद्धा के युद्ध रथ के घोडो की बागडोर अपने हाथो में लेकर उसे युद्ध संचालन में सर्वोत्तम सहायता करने वाले को सारथी कहा गया है -
🎈🍓 महाभारत युद्ध में दो विश्व के सर्वोत्तम सारथी थे -प्रथम भगवान् श्री कृष्ण -युद्ध प्राम्भ होने से पहले जब दुर्योधन ने श्री कृष्ण से द्वारिका की नारायणी सेना मांगी थी तब अर्जुन ने निहत्थे श्री कृष्ण से अपने सारथी और मार्ग दर्शक बनने की स्वीकृति ली थी । श्री कृष्ण ने अर्जुन के युद्ध के पहले ही हथियार डालने पर विश्व प्रसिद्द श्री गीता जी का ज्ञान और अपने विराट रूप को प्रगट कर अर्जुन का डर व भय दूर किया व निष्काम कर्तव्यपथ पर उसे चलने की प्रेरणा दी ।
🚫 श्री कृष्ण ने युद्ध में समय समय पर भीष्म पितामह -द्रोणाचार्य कर्ण आदि से युद्ध में बराबर अर्जुन का उत्साहवर्धन किया और उसके युद्ध कौशल की प्रशंशा की । जयद्रथ से युद्ध में अर्जुन की प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए #बनावटी #सूर्यास्त भी उत्पन्न किया ; और जब जमीन में धंसे हुए रथ के पहिए को निकालने के लिए कर्ण समय मांग रहा था तब अर्जुन को कौरव व् कर्ण द्वारा किये गए अत्याचारों - अन्याय पूर्वक सब दुश्मनों द्वारा बालक आभिमनयू के वध की याद दिलाकर कर्ण का वध कराया । और अंतत: यूद्ध में पूर्ण विजय अर्जुन व पाडवो को दिलाने का कार्य किया ।
🚫 वही दूसरी और भगवान् श्री कृष्ण की तरह ही योग्य -रथ संचालन व् युद्ध संचालन में निपुण एक और
भी महाराजा थे जिनसे दुर्योधन और कर्ण ने नम्रता पूर्वक कर्ण के युद्ध रथ का संचालन करने की स्वीकृति ली
थी पर्रन्तु अपने #कटु #सम्भाशरणो से उन्होंने कर्ण व कौरवो के साथ साथ ही , अपने भी सर्वनाश का रास्ता चुना ।
🍓भगवान् श्री कृष्ण के रथ संचालन की बराबरी कर सकने की योग्यता में निपूर्ण एक और अति रथी थे - मद्र देश ( सिंध बलूचिस्तान आज का पाकिस्तान आदि ) के महाराजा #शल्य - जो पांडव भाइयो में नकुल और सहदेव की माँ माद्री के भाई यानी दोनों पांड्वो के सगे मामा थे -मन ही मन श्री कृष्ण से #चिढ के कारण जरासंध के पुराने साथी थे ; महाभारत युद्ध निश्चित होने पर अपने भांजो पांड्वो की सहायतार्थ 2 अक्षौणी सेना लेकर अपने राज्य से चले थे । पांडव तो निश्चिन्त थे कि मामा उनके पास ही आ रहे है । पांड्वो के पास 7 अक्षौणी सेना जमा हो चुकी थी और कौरवो के पास ,9 अक्षौणी इकट्ठा हुई थी -शल्य की 2अक्षौणी पांड्वो की सेना में मिलकर दोनों सेनाए बराबर हो जानी थी -परन्तु यहाँ दुर्योधन चालाकी कर गया - मद्र देश से कुरुक्षेत्र तक रास्ते में जगह जगह महराजा शल्य का सेनासहित खूब सत्कार हुआ । शल्य इसे पांड्वो द्वारा की गयी सेवा समझते रहे परन्तु कुरुक्षेत्र पहुँचने पर जब दुर्योधन सेवा में उपस्थित हुआ तब दुर्योधन द्वारा प्रार्थना करने पर पांसा ही पलट गया ।
🍎 , ने सेना सहित कौरवो की और से युद्ध करना स्वीकार कर लिया । अब कौरव ,11 अक्षौणी व पांडवो की केवल 7 अक्षौणी सेना रही ; हां युधिष्ठिर से मिलने पर शल्य ने कर्ण से युद्ध के समय मानसिक रूप से पांडवो की मदद करना मंजूर कर लिया -कौरवो के पहले व दुसरे सेनापति भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य के मारे जाने के बाद जब **कर्ण **सेनापति बने तब दुर्योधन ने प्रार्थना कर -श्री कृष्ण का सामना कर सकने में योग्य महाराजा शल्य को कर्ण का सारथी बनवाया ।
🚫 शल्य विशाल साम्राज्य के राजा तथा अपने को किसी भी भाँति से कर्ण से युद्ध कौशल में कम नहीं समझते थे इसलिए कदम कदम पर कर्ण को नीचा दिखाने ; अपमानित करने और उनके मुकाबले अर्जुन की वीरता की बाते कर कर्ण के मन को अपमान क्षोभ व् हीनता से ग्रसित कर उसके मनोबल को कम करते रहे -नतीजा जहाँ श्री कृष्ण अर्जुन की प्रशंशा कर उसे नवीन उत्साह से भर रहे थे ; कर्ण अपमानित होकर नैराश्य से ग्रसित था -और कर्ण मारा गया -
🍓कर्ण के बाद कौरवो के अंतिम सेनापति महराजा शल्य बने मगर जिसका स्वभाव #धोखा हो पहले पांड्वो से फिर कर्ण से ; उसे अपनी सारी सेना सभी भाइओ सगे संबंधियो सहित मरना ही था -शल्य की मृत्यु के साथ ही महाभारत युद्ध का भी निर्णय हो गया ।
*********************** अपनी बात *******************
आध्यात्मिक समीक्षा--
🍎 सारथि चाहे युद्ध में हो या मनुष्य के जीवन को संचालित करने वाला *** या देश का नेतृत्व करने वाला ; उसमें ( 1 ) -योग्यता के साथ ही अगर (2 ) उसमे* निष्ठा *समर्पण * और (3) अपनों के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की भावना नही है तो वह कभी भी हितकारी नहीं हो सकता है ।
🍎🍊🍍**हमे इसी लिए अपने जीवन रथ का सारथी श्री कृष्ण को ही बनाना चाहिए तभी जीवन संग्राम मे विजय , तथा मुक्ति मिल सकती है*
**क्रमशः ********** राम नाथ गुप्त कन्नौज ******

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें