नम्बर ( 23 ) --अठारहवाँ अध्याय - ( प्रथम पोस्ट )
🍘 पिछले अध्याय से ही त्रिगुणमयी श्रष्टि के बारे में भगवान बता रहे है । इस अध्याय में भी अध्याय 18 श्लोक 40 -में भी भगवान ने कहा है --
न तदस्ति प्रथिव्याँ वा दिवि देवेषु वा पुनः । स्तवं प्रकृतिजैमुर्ततं यदेभि: स्यात्रिभिगुणे ।।
🚫 कि पृथ्वी में या स्वर्ग में अथवा देवताओ में कोई ऐसा प्राणी नही है जो इन तीन गुणों से रहित है ।
-इस अध्याय के प्रारम्भ में अर्जुन श्री कृष्ण से बोले --
🌰 " महाबाहो ! मैं सन्यास और त्याग को अलग अलग जानना चाहता हूँ " -
भगवान श्री कृष्ण ने उत्तर दिया -
🚫 सन्यास --विद्वान लोग तीन प्रकार के सन्यास की बात करते हैं -
🍍 कुछ कर्म मात्र को दोष मानकर सभी प्रकार के कर्मो के त्याग को ही सन्यास समझते है-
🍍 कुछ यज्ञ , दान और तप को छोड़ कर बाकी कर्मो के त्याग करने को कहते है मगर
🍍 शास्त्र विहित कर्म करना कर्तव्य है , इसलिए #आसक्ति और #फल का #त्याग करके जो कर्म किये जाते है वे #सात्विक त्याग है --- जो अकुशल कर्म से द्वेष नही करता और कुशल कर्म में आसक्त नही होता वह सत्वगुण से युक्त ,संशय रहित व्यक्ति , मेधावी और सच्चा त्यागी है -
🎈कर्मफल का त्याग न करने वालो को अच्छा या बुरा ,या मिला हुआ ऐसे तीन फल मरने के बाद जरूर मिलते है
🍎 सांख्य शास्त्र के अनुसार सभी कर्म पांच कारणों से सिद्ध ( सम्पन्न ) होते है -
1 अधिष्ठान माने शरीर ---2- कर्ता - जीवात्मा --3- इंद्रियां --4-- विभिन्न प्रकार के प्रयास और --5-दैव --
🌏 जो पुरुष केवल अपने को कर्त्ता मानता है वह सच नही जानता है ; जिसके मन मे मैं कर्त्ता हूँ , यह भाव नही है ,वह कर्मबन्धन में नहीं बंधता है -
🎈* ज्ञाता , ज्ञान और ज्ञेय यह तीन प्रकार की कर्म प्रेरणा है और कर्त्ता कर्म और क्रिया ,यह तीन प्रकार का कर्मसंग्रह है *
🚫 🍓 त्रिविधि #ज्ञान -- जिस ज्ञान द्वारा मनुष्य , सब भूतो में #मुझ परमात्मा परमेश्वर को देखता है ,वह #सात्विक ज्ञान है --
🎈संपूर्ण भूतो में #भिन्न ज्ञान रखना ही #राजसी ज्ञान है और -
🎈 जिस ज्ञान से मनुष्य इस क्षण भंगुर #शरीर को ही सब कुछ ( #परमात्मा ) समझ कर इसमे ही #आसक्त रहता है , यह #तामस ज्ञान है ।
🎈🍎 त्रिविधि कर्म --आसक्ति रहित , अहंकार के वचन न बोलने वाला , धैर्य और उत्साह से युक्त , कर्मो के फल न चाहने वाला ,सफल और असफल होने पर भी हर्ष विशाद से रहित कार्य करने वाले के कर्म सात्विक है -
🍍 कर्म फल में आसक्ति युक्त ,लोभी दूसरो को कष्ट पंहुचाने वाला ,अशुद्धाचारी , हर्ष शोकादि युक्त , के कर्म राजस है --
🍍और शिक्षा रहित ,घमंडी ,धूर्त ,दूसरो की जीविका का नाश करने वाला ,शोकायुक्त ,आलसी के कर्म तामस है ।
🎈🍓 त्रिविधि बुद्धि - -- जो बुद्धि ,प्रवृत्ति और निवृत्ति , कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य , भय और अभय ,बन्धन और मोक्ष को यथार्थ रूप से जानती है वही सात्विक है ,
🍍इन्हें सही न जानने वाली राजसी बूद्धि है और
🍍सभी बातों में विपरीत #अधर्म को #धर्म मानने वाली बूद्धि #तामसी है -
🎈🍓 इसी प्रकार विषयो को इन्ही तीनो प्रकार से धारण करने वाली * ध्रति *( धारण करना ) भी त्रिगुण मयी है
🎈🍓त्रिविधि सुख -- जिस सुख में साधक , भगवान के ध्यान , भजन , सेवादि के अभ्यास में रमण करता है , शुरू में अप्रिय लगने के बाबजूद , आत्म बुद्धि के प्रसाद से यह सुख , दुखो का अंत करने वाला ,अमृततुल्य और सात्विक है --
🍍विषयो और इन्द्रियो के सहयोग से उत्पन्न होने वाला सुख ,आरम्भ में आनंददायक लगने के बाबजूद , विष के तुल्य और राजसी सुख है --
🍍भोग काल मे और परिणाम में भी मोहित करने वाला , निद्रा ,आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख , तामसी है
🚫 फल सहित वर्णानुसार कर्मो का विवरण -
🍍ब्राह्मणों के कर्म -- अंत: करण का निग्रह , इन्द्रियो का दमन , कष्ट सहते हुए धर्मपालन ,तप ,शुद्धि ,क्षमा , आस्तिकता , शास्त्रो का अध्यन ,परमात्मा के तत्व का अनुभव, यह ब्राह्मणों के कर्म है
🍍 क्षत्रियो के कर्म --शौर्य ,तेज ,धैर्य ,दक्षता ,युद्ध में पीठ न दिखाना , दान और स्वाभिमान है
🍍 वैश्यों के कर्म -- खेती ,गोरक्षण और वाणिज्य है तथा
🍍सेवा करना चतुर्थ वर्ण का स्वाभाविक कर्म है ।
🍍 अपने अपने #स्वाभाविक #कर्मो मे लगा हुआ मनुष्य , #भगवदप्राप्ति परम् #सिद्धि को पाता है
अध्याय 18 श्लोक 47 -
श्रेयान , स्वधर्मो विगुन: , परधर्मात स्वनुष्ठितात ।स्वभाव नियतं कर्म कुर्वन नाप्नोति किलविष्म ।।
🍓🚫 गुणी परधर्म की अपेक्षा , गुण रहित #स्वधर्म ही #उत्तम है , स्वभाव नियत स्वधर्म , कर्म का करता हुआ मनुष्य पापो का भागी नही बनता ।
शेष अगली पोस्ट में

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