महाभारत कथा -490,अठारहवाँ अध्याय

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पोस्ट --( 490 )-- अथ श्री महाभारत कथा -- समीक्षा - ( ९० )-- श्री मद bhagwat  गीता ज्ञान गंगा प्रवाह 


नम्बर ( 23 ) --अठारहवाँ अध्याय - ( प्रथम पोस्ट )

     

 🍘 पिछले अध्याय से ही त्रिगुणमयी श्रष्टि के बारे में भगवान बता रहे है । इस अध्याय में भी अध्याय 18 श्लोक 40 -में भी भगवान ने कहा है --

   

 न तदस्ति प्रथिव्याँ वा दिवि देवेषु वा पुनः । स्तवं प्रकृतिजैमुर्ततं यदेभि: स्यात्रिभिगुणे ।।

  

🚫 कि पृथ्वी में या स्वर्ग में अथवा देवताओ में कोई ऐसा प्राणी नही है जो इन तीन गुणों से रहित है ।

         

  -इस अध्याय के प्रारम्भ में अर्जुन श्री कृष्ण से बोले -- 

    

  🌰 " महाबाहो ! मैं सन्यास और त्याग को अलग अलग जानना चाहता हूँ " - 


भगवान श्री कृष्ण ने उत्तर दिया -

     

🚫 सन्यास --विद्वान लोग तीन प्रकार के सन्यास की बात करते हैं -

     

🍍 कुछ कर्म मात्र को दोष मानकर सभी प्रकार के कर्मो के त्याग को ही सन्यास समझते है-   

    

 🍍 कुछ यज्ञ , दान और तप को छोड़ कर बाकी कर्मो के त्याग करने को कहते है मगर 

    

 🍍 शास्त्र विहित कर्म करना कर्तव्य है , इसलिए #आसक्ति और #फल का #त्याग करके जो कर्म किये जाते है वे #सात्विक त्याग है --- जो अकुशल कर्म से द्वेष नही करता और कुशल कर्म में आसक्त नही होता वह सत्वगुण से युक्त ,संशय रहित व्यक्ति , मेधावी और सच्चा त्यागी है - 

    

 🎈कर्मफल का त्याग न करने वालो को अच्छा या बुरा ,या मिला हुआ ऐसे तीन फल मरने के बाद जरूर मिलते है


    

 🍎 सांख्य शास्त्र के अनुसार सभी कर्म पांच कारणों से सिद्ध ( सम्पन्न ) होते है -

  

1 अधिष्ठान माने शरीर ---2- कर्ता - जीवात्मा --3- इंद्रियां --4-- विभिन्न प्रकार के प्रयास और --5-दैव --

   

 🌏 जो पुरुष केवल अपने को कर्त्ता मानता है वह सच नही जानता है ; जिसके मन मे मैं कर्त्ता हूँ , यह भाव नही है ,वह कर्मबन्धन में नहीं बंधता है -

      

🎈* ज्ञाता , ज्ञान और ज्ञेय यह तीन प्रकार की कर्म प्रेरणा है और कर्त्ता कर्म और क्रिया ,यह तीन प्रकार का कर्मसंग्रह है *


    🚫 🍓 त्रिविधि #ज्ञान -- जिस ज्ञान द्वारा मनुष्य , सब भूतो में #मुझ परमात्मा परमेश्वर को देखता है ,वह #सात्विक ज्ञान है --

   

 🎈संपूर्ण भूतो में #भिन्न ज्ञान रखना ही #राजसी ज्ञान है और -

   

 🎈 जिस ज्ञान से मनुष्य इस क्षण भंगुर #शरीर को ही सब कुछ ( #परमात्मा ) समझ कर इसमे ही #आसक्त रहता है , यह #तामस ज्ञान है ।


     🎈🍎 त्रिविधि कर्म --आसक्ति रहित , अहंकार के वचन न बोलने वाला , धैर्य और उत्साह से युक्त , कर्मो के फल न चाहने वाला ,सफल और असफल होने पर भी हर्ष विशाद से रहित कार्य करने वाले के कर्म सात्विक है -

   

  🍍 कर्म फल में आसक्ति युक्त ,लोभी दूसरो को कष्ट पंहुचाने वाला ,अशुद्धाचारी , हर्ष शोकादि युक्त , के कर्म राजस है --

     

 🍍और शिक्षा रहित ,घमंडी ,धूर्त ,दूसरो की जीविका का नाश करने वाला ,शोकायुक्त ,आलसी के कर्म तामस है ।


     🎈🍓 त्रिविधि बुद्धि - -- जो बुद्धि ,प्रवृत्ति और निवृत्ति , कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य , भय और अभय ,बन्धन और मोक्ष को यथार्थ रूप से जानती है वही सात्विक है , 

       

🍍इन्हें सही न जानने वाली राजसी बूद्धि है और 

      

 🍍सभी बातों में विपरीत #अधर्म को #धर्म मानने वाली बूद्धि #तामसी है -


      🎈🍓 इसी प्रकार विषयो को इन्ही तीनो प्रकार से धारण करने वाली * ध्रति *( धारण करना ) भी त्रिगुण मयी है

     

 🎈🍓त्रिविधि सुख -- जिस सुख में साधक , भगवान के ध्यान , भजन , सेवादि के अभ्यास में रमण करता है , शुरू में अप्रिय लगने के बाबजूद , आत्म बुद्धि के प्रसाद से यह सुख , दुखो का अंत करने वाला ,अमृततुल्य और सात्विक है --

     

 🍍विषयो और इन्द्रियो के सहयोग से उत्पन्न होने वाला सुख ,आरम्भ में आनंददायक लगने के बाबजूद , विष के तुल्य और राजसी सुख है -- 

     

 🍍भोग काल मे और परिणाम में भी मोहित करने वाला , निद्रा ,आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख , तामसी है 

     

 🚫 फल सहित वर्णानुसार कर्मो का विवरण -

     

 🍍ब्राह्मणों के कर्म -- अंत: करण का निग्रह , इन्द्रियो का दमन , कष्ट सहते हुए धर्मपालन ,तप ,शुद्धि ,क्षमा , आस्तिकता , शास्त्रो का अध्यन ,परमात्मा के तत्व का अनुभव, यह ब्राह्मणों के कर्म है

       

🍍 क्षत्रियो के कर्म --शौर्य ,तेज ,धैर्य ,दक्षता ,युद्ध में पीठ न दिखाना , दान और स्वाभिमान है   

      

 🍍 वैश्यों के कर्म -- खेती ,गोरक्षण और वाणिज्य है तथा  

       

🍍सेवा करना चतुर्थ वर्ण का स्वाभाविक कर्म है ।

      

 🍍 अपने अपने #स्वाभाविक #कर्मो मे लगा हुआ मनुष्य , #भगवदप्राप्ति परम् #सिद्धि को पाता है 


 अध्याय 18 श्लोक 47 -

  

श्रेयान , स्वधर्मो विगुन: , परधर्मात स्वनुष्ठितात ।स्वभाव नियतं कर्म कुर्वन नाप्नोति किलविष्म ।।

      

🍓🚫 गुणी परधर्म की अपेक्षा , गुण रहित #स्वधर्म ही #उत्तम है , स्वभाव नियत स्वधर्म , कर्म का करता हुआ मनुष्य पापो का भागी नही बनता ।

    

  शेष अगली पोस्ट में 

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