पोस्ट --( 488 )-- अथ श्री महाभारत कथा -- समीक्षा -( ८८ ) - श्री मद भगवत गीता ज्ञान गंगा प्रवाह ( 21 ) -- सोलहवां अध्याय ; दैवी सम्पत्ति और आसुरी संपत्ति वाले व्यक्तियों का वर्णन--
🌰 भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से बोले --इस लोक में हमे दैवी और आसुर दो प्रकार के प्राणी मिलते है -
🚫 1- दैवी स्वभाव ( संपत्ति ) वाले प्राणी --अहिंसा -सत्य -क्रोध न करना -त्याग -शांति -दूसरो में कमियां न तलाश करना -सब प्राणियों पर दया -लालच से दूर रहना -कोमल स्वभाव - लज्जा रखना -तेज -छमा -पवित्रता -किसी से द्वेष न रखना -घमण्ड न करना ---यह सब देवी सम्पदा में जन्म लेने वालों के लक्षण हैं ।
🍎 2 - आसुरी सम्पत्ति ( स्वभाव ),वाले प्राणी --दम्भ ,दर्प ( घमंड )-अभिमान - क्रोध - कठोरता -अज्ञान -पवित्रता -- आचार और सत्यता नही होना -यह सब आसुरी सम्पदा में जन्म लेने वालों के लक्षण हैं ।
🍎यह सब अनीश्वर वादी है । ऐसी बुद्धि वाले नष्टात्मा , दुष्टबुद्धि ,और जगत के शत्रु है । यह सब अपवित्र व्रत वाले , कभी न पूरी होने वाली इच्छा रखने वाले ,मद से युक्त ,मोह के मारे हुए , असत कार्यो को करते रहते है । यह सब सैकड़ो तरह की आशाओं के जाल में फंसे हुए, काम और क्रोध में लिप्त होकर ,केवल काम उपभोग के लिए अन्याय से धन बटोरना चाहते है ।
🍎 यह सभी धन और मद से चूर ,आडंबर सहित ,बिना विधि के यज्ञादि भी करते है । मुझ से द्वेष रखने वाले व मेरी निंदा करने वाले यह सभी -- सदैव अपवित्र नरक में पड़ते है , इन क्रूरों द्वेषियों को मैं - सदैव अपवित्र और आसुरी योनियों में ला पटकता हूँ । ये मूढ़ , जन्म जन्मांतर में कभी भी मुझे नही प्राप्त कर पाते है और अंत मे अत्यंत अधम योनि को प्राप्त करते है ।
🌏 है अर्जुन ! दैवी सम्पत्ति #मोक्ष का और आसुरी सम्पत्ति #बन्धन का कारण होती है -
🚫 हे पांडव ! तू दैवी सम्पदा में पैदा हुया है , इस लिए शोक मत कर ।
🎁 काम क्रोध और लोभ -यह नरक के द्वार है ; जो मनुष्य का #नाश कर देते हैं । इसलिए इन तीनो का त्याग कर देना चाहिए । हे कौन्तेय ! अंधकार में ले जाने वाले ,इन तीनो द्वारों से छुटकारा पाया हुआ मनुष्य , अपने आत्मकल्याण का आचरण करता हुआ अंत मे परम पद को प्राप्त होता है ।
🎈 जो शास्त्र विधि को छोड़कर , जो जी मे आता है वही करता है ,वह न तो सिद्धि पाता है ,न ही सुख और परम गति --
🍎 इसलिये हे अर्जुन ! कर्तव्य और अकर्तव्य को निश्चित करने के लिए , तुम्हे शास्त्र को प्रमाण मानना चाहिए -और उठो ! #शास्त्र #विहित #विधान को जानकर #कर्म करो --
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श्री राम चरित मानस से तुलनातक व्याख्या ---
श्री राम चरित मानस में सन्त ( दैवी सम्पत्ति वाले )और आसुरी सम्पत्ति वालो के लक्षण --
संत असंतन्हि के अस करनी । जिमि कुठार चंदन आचरनी ।।
कोमल चित दीनन्ह पर दाया । मन बच क्रम मम भगति अमाया ।।
सबहिं मान प्रद आपु अमानी । भरत प्रान सम मम ते प्रानी ।।
बिगत काम मम नाम परायन । सांति बिरति बिनती मुदितायन ।।
सीतलता सरलता मयत्री । द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री ।।
ए सब लक्षण बसंहि जासु उर । जानेहु तात सन्त सन्तत फुर ।।
सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं । पुरुष बचन कबहुँ न बोलन्हि ।।
निंदा अस्तुति उभय सम । ममता मम पद कंज ।।
ते सज्जन मम प्रान प्रिय । गुन मन्दिर सुख पुंज ।। ( उत्तर कांड 37 / 38 )
शेष अगली पोस्ट में ----***** राम नाथ गुप्त कन्नौज***

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