पोस्ट --( 487 )- अथ श्री महाभारत कथा -- समीक्षा ( ८७ ) और श्री मदभगवद गीता ज्ञान गंगा प्रवाह ( 20 )-पन्द्रहवां अध्याय -- संसार वृक्ष और भगवद प्राप्ति के उपाय का वर्णन ; जीवात्मा का स्वरूप और कार्य -
प्रभाव सहित भगवान के रूप का वर्णन --
भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से बोले ---
1--संसार वृक्ष और भगवद प्राप्ति के उपाय का वर्णन श्लोक 1 से 7 तक -
🚫 अविनाशी #संसार वृक्ष की एक ऐसे पीपल के विशाल #उल्टे #पेड़ के रूप में कल्पना की गयी है जिसमे संसार के मूल आदिपुरुष #परमेश्वर जड़ो के रूप में सबसे #ऊपर है -फिर परमेश्वर के बाद संसार के निर्माता श्री ब्रम्हा जी इसके तने शाखा के रूप में ,और छंद और वेद वाक्य जिसके पत्तो के रूप में हैं - इस वृक्ष को जो जानता है वही वेदों को जानता है -
🚫 मगर रूप और तीनों गुणों रूपी जल से बढ़ी हुयी विषय भोग रूपी कपोलो द्वारा मनुष्य ,देव ,और तिर्यक आदि योनि रूप शाखाएं , नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई है ,तथा मनुष्य लोक में कर्मो के अनुसार बांधने वाली अहंकार ,ममता और वासना रूपी जड़े भी नीचे और ऊपर तीनो लोको में व्याप्त है-इसका न तो आदि है न ही अंत है --इसलिए परम् वेदों और ब्रम्ह के बारे में जानना अत्यंत कठिन है ।
🍎 इसलिए इस खूब गहरी जड़ वाले अश्वत्थ ( उल्टे ) वृक्ष की #साधन में #बाधक #वासनामयी #शाखाओं और #कपोलो को -- #अनासक्ति रूपी -- द्दढ शस्त्र --से #काटकर ,उस स्थान ( परम पद ) को तलाश करना चाहिए ,जहां जाकर लौटना नही पड़ता ; इसके साथ ही जिससे यह पुरातन प्रवत्ति ( पेड़ ) निकली है , उसी #आदि #पुरुष की #शरण ग्रहण करना चाहिए ।
🍘 जो मान और मोह से रहित हैं ,जिन्होंने वासनाओ और कामनाओं को मिटाकर , आसक्ति के दोषों को जीत लिया है ,जो नित्य अध्यात्म ज्ञान में लीन होकर रहते है , जिन्हें सुख और दुख नही व्यापता ,वे ज्ञानी जन लक्ष्य स्थान को प्राप्त करते है ।
🍒 जिसको सूर्य और अग्नि नही प्रकाशित कर सकती ,वही परम धाम मेरा है , वहां जाकर लौटना नही पड़ता -मेरा ही सनातन अंश जीव बनकर , त्रिगुण मयी माया में स्थित हुये , मन सहित सभी इन्द्रियो को आकर्षित करता है ।
2---जीवात्मा का स्वरूप और कार्य --श्लोक 8 से 11 तक -
🚫 जैसे वायु -गन्ध ( खुशबू ) को अपने साथ दूसरे स्थान पर ले जाता है वैसे ही यह जीवात्मा भी जिस #शरीर को त्याग करता है उससे #मन सहित #इन्द्रियो को ग्रहण करके , नए शरीर मे जाता है-
🚫 जीवात्मा सभी इन्द्रियो के सहारे विषयो का सेवन करता है । जीवात्मा किसी को दिखाई नही देता है ,परंतु केवल ज्ञान रूपी नेत्र वाले ही इसे तत्व से जानते हैं और योगीजन जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध किया है वही हृदय में स्थित इस आत्मा को तत्व से देखते है ।
3-- प्रभाव सहित भगवान के रूप का वर्णन श्लोक 12 से 15 तक
🍎 श्री कृष्ण कहते है --ब्रम्हांड को प्रकाशित करने वाले - सूर्य तथा चंद्रमा और अग्नि का तेज
मेरा ही तेज है --
🎈मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके ,अपनी शक्ति से सभी भूतो को धारण करता हूँ ,और रसमय ( अमृतमय ) चंद्रमा होकर सभी वनस्पतियो , औषधियों को पुष्ट करता हूँ --
🎈 मैं ही सभी प्राणियों के शरीर मे स्थित प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर #अग्नि रूप होकर सभी #भोजन को #पचाता हूँ । मैं ही सब #प्राणियों के #ह्रदय में स्थित हूँ ,में ही वेदों का कर्ता व जानने योग्य हूँ ।
4-- नाशवान और अविनाशी --श्लोक 16 से 18 -
🎆 सम्पूर्ण भूत प्राणियो के शरीर तो क्षर ( नाशवान ) हैं और जीवात्मा अविनाशी ( अक्क्षर ) है -इन दोनों से उत्तम अन्य अविनाशी परमेश्वर ही है जो #तीनों #लोकों में प्रवेश करके सबका #भरण #पोषण करता है ; इसलिए मुझे #पुरुषोत्तम नाम से जाना जाता है
5-- श्री कृष्ण - गृहतम पुरुषोत्तम तत्व -श्लोक 19 +20 --
🍎इस प्रकार जो पुरुष ,मुझको पुरुषोत्तम जानता है ,वह निरंतर मेरा भजन करता है ,यही रहस्यमय गूढ़ तत्व है ।
*** शेष अगली पोस्ट में **** राम नाथ गुप्त ***कन्नौज****

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