भगवान श्री कृष्ण के विराट विश्व रूप दर्शन करने के बाद ; अर्जुन श्री कृष्ण से बोले --
🍎 " हे मधुसूदन ! जो भक्त आपका सगुण रूप से भजन और ध्यान करते है --और दूसरे जो आपकी निराकार ,अविनाशी रूप की उपासना करते है -- उन दोनों प्रकार के भक्तो में अति #उत्तम #योगवेत्ता कौन है ?
🚫 श्री कृष्ण ने उत्तर दिया -- " जो भक्त ,मेरे में #मन को #एकाग्र करके ,#श्रद्धा पूर्वक ,मुझ सगुण परमेश्वर के निरंतर #भजन और #ध्यान में लगे रहते है -मैं उन्हें योगियों से भी अति #उत्तम योगी मानता हूँ "-
🚫" जो व्यक्ति इन्द्रियो के समुदाय को अच्छी प्रकार से #वश में करके ,मन बुद्धि से ,सदा #एकरस रहते हुए , निरंतर -नित्य ,अचल ,निराकार मुझ सच्चिदानन्द ब्रम्ह का ध्यान करते है , ऐसे सभी मे #समान #भाव रखने वाले योगी भी मेरे को ही प्राप्त होते है परंतु इन्द्रियो में आसक्ति और देहाभिमान के कारण , #निराकार उपासना अत्यंत #कष्टकारक होती है "
🎃 " और जो , मेरे पारायण ( शरण ) हुए भक्तजन ,संपूर्ण #कर्मो को मुझ में #अर्पण करके ,मुझ #सगुण परमेश्वर का ध्यान योग से निरंतर भजन करते है , है अर्जुन ! उनका मैं श्रीघ्र ही मृत्यु रूप संसार समुद्र से #उद्धार कर देता हूँ ; इसलिए हे अर्जुन ! मेरे में मन , बुद्धि को लगाकर के तू मुझे ही प्राप्त होगा ,इसमे कोई संशय नही है "
🍎 अगर मन को मुझमें निरंतर लगाने में तू समर्थ नही है तब ,अभ्यास रूप योग करते हुए मुझे प्राप्त करने की #द्दढ #इच्छा कर ।
🚫 अगर उपर्युक्त अभ्यास करने में भी असमर्थ है तब ,सभी कर्म केवल मेरे लिए करने का प्रण करो - मेरे लिए कर्म करता हुआ भी तू मुझे प्राप्त कर लेगा ।
🎆 यदि इसको भी करने में असमर्थ है तो तू मन को जीत करके , मुझे प्राप्त करने की इच्छा से सभी #कर्मो के #फल का मेरे लिए त्याग कर ; कर्मो के फल में आसक्ति न रखकर , फल मुझे #समर्पित कर दे ।
🍎🚫 इस प्रकार मर्म को न जान कर किये गए अभ्यास से परोक्ष ज्ञान श्रेष्ठ है और ; ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है ; और ध्यान से भी सभी कर्मो के फल का मेरे लिए त्याग करना श्रेष्ठ है क्योंकि इस त्याग से तुरंत ही परम शांति मिलती है ।
🍎### इस प्रकार शांति को प्राप्त करने वाला ,सभी भूतो में द्वेष भाव रहित , स्वार्थ रहित ,सभी का प्रेमी और दयालु होता है तथा ममता और अहंकार से रहित ,दुखो और सुखों में सम तथा सभी को अभय देने वाला होता है ###🍊
🚫 जो भक्त निरन्तर ध्यान योग में लगा हुआ , शत्रु मित्र में सम ,,लाभ हानि में सम ,मन और इन्द्रियो को वश में किये हुए ,द्दढ निश्चयपूर्वक ,मन और बुद्धि को मुझ में अर्पित करता है , और क्रोध ,हर्ष ,दुख ,उद्वेग से रहित है -तथा जो कामना रहित ,शुभ और अशुभ सभी कर्मो के फल का त्यागी है , वह मुझे प्रिय है ।
🍎 निंदा और स्तुति को समान समझने वाला , मेरे परायण हुआ जो श्रद्धायुक्त पुरुष ,ऊपर बताए गए धर्ममय अमृत को निष्काम भाव से सेवन करते है , वे भक्त , मेरे को अतिशय प्रिय हैं ।
*************************************** अपनी बात ***********
श्री राम चरित मानस में भी निराकार ब्रम्ह उपासना से सगुण ब्रम्ह की भक्ति को ही उत्तम माना गया है--उत्तर कांड दोहा 118 के बाद --
🍓 ज्ञान पंथ कृपाण के धारा । परत खगेस होइ नहिँ बारा ।।
जो निर्विघ्न पंथ निरबहि । सो कैवल्य परम् पद लहई ।।
अति दुर्लभ कैवल्य परम् पद । सन्त पुराण निगम आगम बद ।।
*** राम भजत सोई मुकुति गोसाईं । अन इच्छित आवइ बरिआई ।।
सेवक सेव्य भाव बिनु ,भव न तरिअ उरगारि । भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि ।।
🚫 निराकार उपासना के ज्ञान पंथ पर चलना ,तलवार की धार पर चलना है क्योंकि इन्द्रियो के कारण साधन पथ से भटकने की बहुत संभावना होती है -जो कोई निर्विघन साधना पूरी कर पाता है वही प्रभु के परमपद को प्राप्त करता है जब कि सगुण श्री राम के भजन करने पर वही परम् पद और मुक्ति ,बिना इच्छा के ही मिल जाती है *****🚫
शेष अगली पोस्ट में ************** राम नाथ गुप्त कन्नौज

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