पोस्ट -( 480 ) अथ श्री महाभारत कथा --- समीक्षा ( ८० ) और श्री मद् भगवद् गीता ज्ञान गंगा प्रवाह नम्बर ( 13 ) -----नवम अध्याय दोहा 23 से 34 तक - तथा श्री राम चरित मानस से साम्य ~~~
🚫 भगवान श्री कृष्ण ने श्रद्धा से युक्त हुए , सकाम भक्तो द्वारा जल्द कामना पूर्ति हेतु , दूसरे देवताओ की पूजन करने वालो के सम्बंध में - पुनः विस्तृत रूप से बताते हुए कहा -
🌰 1- उपर्युक्त तरीके से दूसरे देवताओ की पूजा करने वाले भी मेरे ( श्री कृष्ण ) को ही पूजते है -परंतु उनकी पूजा #अविधि पूर्वक और #अज्ञान मयी है । क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ( श्री कृष्ण ) ही हूँ ,परंतु अन्य देवताओ की पूजा करने वाले मुझ अधियज्ञ स्वरूप #परमेश्वर को #तत्व से नही जानते है ; इसीलिए मृत्यु के बाद #पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं -
🌰 2- विभिन्न देवताओ को पूजने वाले , उन्ही देवताओ को प्राप्त होते है , पितरो को पूजने वाले पितरो को , भूतो को पूजने वाले भूतो को ,प्राप्त होते है ; परंतु मेरे भक्त ,मुझे ही प्राप्त होते है इसलिए उनका पुनर्जन्म नही होता है ।
🌰 3- पत्र ,पुष्प ,फल, जल ,इत्यादि जो भक्त मुझे #प्रेम से अर्पण करता है , उस शुद्ध , बुद्धि ,निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेम पूर्वक अर्पित किया हुआ वह पत्र पुष्पादि ,मैं #सगुण रूप से प्रकट होकर #प्रीति सहित खाता हूं
🌰 4- हे अर्जुन ! तू जो कुछ भी #कर्म करता है ( भोजन करना ,हवन करना ,दान देना ) और जो स्वधर्माचरण #तप करता है ,वह सब मेरे #अर्पण कर दे , इस प्रकार , तू शुभाशुभ फलरूप कर्म बन्धन से मुक्त हो जाएगा और मेरे को ही प्राप्त होगा ।
🌰 5- मैं ( भगवान ) सब भूतो ( जड़ +चेतन ) में #समभाव से #व्यापक हूँ, ; न तो मेरा कोई अप्रिय है और न ही प्रिय है ,परंतु जो भक्त प्रेम से मेरा #भजन करते है , वे मेरे में और मैं भी #उनमे , #प्रत्यक्ष रुप से #प्रगट हूँ,।
🌰 6-यदि अतिशय #दुराचारी भी ,#अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मेरा निरंतर #भजन करता है तो वह #निश्चयात्मक बूद्धि रखने के कारण #साधु ही माना जायेगा और जल्द ही धर्मात्मा कहलाकर #परम #शांति को प्राप्त होता है - इस लिए हे अर्जुन ! निश्चय पूर्वक सत्य जान कि मेरा #भक्त #नष्ट नही होता है ।
🌰 7- हे अर्जुन ! स्त्री ,वैश्य ,शूद्रादिक , कोई भी नीची से नीची जाति का व्यक्ति हो , चाहे पाप योनि वाला हो , वे भी मेरे शरण होकर परम् गति को प्राप्त करते हैं ।
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श्री राम चरित मानस -उत्तर कांड अंतिम दोहा 130 - के अनुसार -
🍅 पाई न केहि गति पतितपावन , राम भजि सुनु सठ मना ।
गणिका ,अजामिल ,ब्याध ,गीध ,गजादि खल तारे घना ।।
आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघ रूप जे ।
कहि नाम बारक , तेपि पावन , होंहि राम नमामि ते ।।
सुंदर सुजान कृपा निधान , अनाथ पर कर प्रीति जो ।
सो एक राम , अकाम हित , निर्वाण प्रद सम आन को ।।
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🍊 -फिर पुण्यशील , ब्राम्हण जन , राजऋषि , भक्तजनों का तो कहना ही क्या है ; इस लिए तू अर्जुन ! दुर्लभ परंतु क्षण भंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त करके , अज्ञान से सुख रूप लगने वाले विषय भोगों में न फंसकर , निरंतर मेरा भजन कर ।
🚫 इस प्रकार मेरे शरण हुआ तू अपनी #आत्मा को मेरे में #एकीभाव करके #मेरे को ही #प्राप्त होवेगा
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श्री राम चरित मानस उत्तर कांड दोहा 43 के पहले -
बड़े भाग मानुष तनु पावा । सुर दुर्लभ सद्ग्रंथिन्ह गावा ।।
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाई न जेहि परलोक सँवारा ।।
सो परत्र दुख पावइ , सिर धुनि धुनि पछताय ।
कालहि करमहि ईश्वरहि , मिथ्या दोष लगाई ।।
एहि तनु कर फल विषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ।।
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शेष अगली पोस्ट में *********** राम नाथ गुप्त कन्नौज--

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