महाभारत कथा -479

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 पोस्ट -( 479 )- अथ श्री महाभारत कथा -- समीक्षा ( ७९ ) श्री मद भगवद गीता ज्ञान गंगा प्रवाह ( 12 ) --

 नवां अध्याय--श्लोक 1 से 22 तक - तथा श्री राम चरित मानस के आधार पर तुलनात्मक व्याख्या --

      🚫 श्री भगवान उवाच --है अर्जुन ! तुझ दोष रहित दृष्टि वाले भक्त के लिए इस परम गोपनीय ज्ञान जो सब धर्मो का राजा , अति पवित्र ,बड़ा सुगम और प्रत्यक्ष फल देने वाला अविनाशी है , को विस्तार से रहस्य सहित कहूंगा , जिसको जानकर तू दुःख रूपी संसार से मुक्त हो जाएगा । जो इस ज्ञान में श्रद्धा नही रखता ,वह मुझे न पाकर मृत्यु रूपी संसार के चक्र में घूमता रहता है ।

      🍊 1- " मुझ सच्चिदानन्द- घन परमात्मा से यह सब जगत जल के समान परिपूर्ण है , और सभी भूत ( वस्तु तथा प्राणी ) मेरे #संकल्प के #आधार पर #स्थित है -- मेरी योगमाया के प्रभाव को देख *** सभी भूतो को उत्पन्न ,पोषण करने वाला मैं वास्तव में भूतो में स्थित नही हूँ । जैसे आकाश से उतपन्न हुआ सर्वत्र विचरने वाला वायु ,सदा ही आकाश में स्थित है उसी प्रकार मेरे संकल्प से उत्पन्न सभी भूत भी मेरे में स्थित है ,मैं उनमे नही ।


      🍊 2- कल्प के अंत में सभी भूत ( जड़ व चेतन ) मेरी #प्रकृति में #लीन हो जाते है , और कल्प के आदि में तथा बाद में भी , मैं सभी को अपनी #त्रिगुण मयी #माया के अनुसार ,बारम्बार उनके कर्मों के अनुसार अपने संकल्प से पुनः रचता हूँ । हे अर्जुन ! उन कर्मो में आसक्ति रहित और उदासीन रहने के कारण ,वे कर्म , मुझ परमात्मा को नही बांधते है ।


       🍊 3-झूठी आशाओं ,वृथा कर्म और झूठे ज्ञान रखने वाले अज्ञानी जन, राक्षस और असुरो के मोहित करने वाले स्वभाव ,आसुरी व्रत्ति का पालन करते है । परंतु दैवी संस्क्रति को पालन करने वाले महात्मा जन अनन्य भाव से , मेरे #नाम और #गुणों का #कीर्तन करते हुए , मुझे बारम्बार प्रणाम करते हुए, मेरे ध्यान में रमे हुए -अनन्य भक्ति से मेरी उपासना करते है । कुछ भक्त साधक ,मेरे विराट स्वरूप परमात्मा का ज्ञान यज्ञ के द्वारा , कुछ मुझ वासुदेव को सर्वस्व समर्पण करके मेरी #शरण ग्रहण करके , तथा कोई कोई अन्य तरीकों से भी मेरी उपासना करते है ।

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           श्री राम चरित मानस के अनुसार ---

          मम गुन ग्राम नाम रत , गत ममता मद मोह । ता कर सुख सोई जाने परानन्द संदोह ।।

                        मम गुन गावत पुलक सरीरा । गदगद गिरा नयन बह नीरा ।।

                                काम आदि मद् दम्भ न जाके । तात निरन्तर बस मैं ताके ।।

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   🍊 4- सभी स्रौत कर्म , पांच महा यज्ञादिक स्मार्त कर्म मैं ही हूँ , #पितरो के निमित्त दिया जाने वाला अन्न , मैं ही हूँ ( #मुझे प्राप्त होता है ) ;  

   🍓 सभी वनस्पतियां ,औषधि ,मन्त्र ,घृत (घी ) अग्नि ,हवन रूप क्रिया ,सभी कुछ #मैं ही हूँ , -

    🍓 इस सम्पूर्ण जगत का #निर्माता ,धारण पोषण करने वाला कर्मो के हिसाब से फल देने वाला ,पिता पितामह माता,और जानने योग्य पवित्र ओमकार ॐ ,ऋगवेद, सामवेद ,यजुर्वेद ,सभी #मैं ही हूँ ---


    🍓 सभी प्राणियों की गति ,भरण पोषण करने वाला ,सबका स्वामी ,शुभाशुभ फल देने वाला ,सबका आश्रयस्थल ,कोई प्रतिफल के बिना ,सबका उपकार करने वाला ,उत्पत्ति तथा ,प्रलय रूप ,और सबका आधार और अविनाशी स्वरूप मैं ही हूँ -- 


      🍒🍓 मैं ही #सूर्य रूप से #तपता हूँ , वर्षा को आकर्षित करके जल #बरसाता हूँ , और मैं ही #अमृत और #मृत्यु और #सत और #असत्य सभी कुछ #मै ही हूँ -

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         श्री राम चरित मानस के अनुसार --

          सबकर परम प्रकाशक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ।।

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      🍊 5- वेदों के अनुसार सकाम कर्म करने वाले , सोमरस को पीने वाले , मुझे यज्ञों से पूज कर पापो से मुक्त हो कर #स्वर्ग की प्राप्ति चाहते है ; वे अपने पुण्यों के फलस्वरूप ,स्वर्ग जाकर ,दिव्य देवताओ के भोगो को भोगते है और पुण्यों के खत्म होने पर पुन मृत्यु लोक आते है ।


 🍘🍓 मैं अपने शरणागत भक्तों का स्वयम योगक्षेम वहन करता हूँ --

             🚫 अनन्य चिन्तयत्नत:मगम ये ,जन:परपुपास्ते ।

                    तेषां नित्याभियुक्तानां, योगक्षेम वहामयहम ।।(अध्याय 9 दोहा 22 )

 जो साधक निष्काम और , अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मुझमे स्थित रहते है उनका योगक्षेम ( भरण पोषण सम्बन्धी सारी चिंताएं ) मैं स्वयं वहन करता हूँ 

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    राम चरित मानस अरण्य कांड दोहा 42 के बाद --श्री राम और नारद संवाद --

       *सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा । भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा ।।

                  करौं सदा तिन्ह कर रखवारी ।। जिमि बालकहिं राख महतारी ।।

 शेष अगली पोस्ट में ********** राम नाथ गुप्त कन्नौज***

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