पोस्ट -( 478 )-- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा -( ७८ ) और श्री मद भगवद गीता ज्ञान गंगा प्रवाह ( 11 ) --आठवां अध्याय -- ब्रम्ह, अध्यात्म और कर्मादि के विषय मे अर्जुन के सात प्रश्न ,और श्री कृष्ण द्वारा उनका उत्तर -
🚫 अर्जुन ने भगवान से प्रश्न किये
1- हे पुरुषोत्तम ! जिस ब्रम्ह का आपने वर्णन किया है वह क्या है ?
2-- अध्यात्म क्या है ?
3- कर्म क्या हैं ?-
4- अधिभूत शब्द किसके लिए सम्बोधित है ? -
5 -अधिदैव क्या कहा जाता है? -
6- अधियज्ञ कौन है और इस शरीर मे कैसे है ? -
7- साधना करने वाले व्यक्तियों के अंत समय मे आप (भगवान) ध्यान में कैसे आते हो ?
🚫 श्री हरि ने उत्तर दिया -
1-*परम् अक्षर* अर्थात जिसका कभी नाश नही होता ऐसे सच्चिदानन्द धन परमात्मा को * ब्रम्ह * कहते है -
2- अपना स्वरूप अर्थात *जीवात्मा * को अध्यात्म कहते है ।
3- भूतो के भाव को उत्पन्न करने वाला , शास्त्र विहित ,यज्ञ ,दान ,होम, आदि के निमित्त जो द्रव्यादि का
त्याग है ,वह कर्म कहा गया है
4- सभी पदार्थ ,जिनकी #उत्पत्ति और #विनाश होता है , वे *#अधिभूत*हैं
5- परम #ब्रम्ह हिरण्यमय पुरुष ही *#अधिदैव *है
6- देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! इस शरीर मे मैं #वासुदेव ही विष्णु रूप से #अधियज्ञ हूँ
7- और जो पुरुष ,#अंतकाल मे , मेरे को ही #स्मरण करता हुआ ,शरीर #त्याग कर जाता है , वह मेरे साक्षात
#स्वरूप को प्राप्त होता है , इसमे सँशय नही है -
🍘अंतकाल में जिस जिस भाव को स्मरण करता हुआ मनुष्य ,शरीर को त्याग करता है , वह मनुष्य अगले जन्म में ,उस ( योनि ) को ही प्राप्त करता है ।
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राम चरित मानस किष्किंधाकांड दोहा 9 के बाद में जब श्री राम बालि से कहते है
अचल करौं , तनु राखहु प्राना । बालि कहा सुनु कृपानिधाना ।।--
तुम प्राणो को स्थिर रख्खो ; मैं तुम्हे जीवित करूंगा ।
तब बाली बोला ----
🚫 जन्म जन्म मुनि जतन कराहीं । अंत राम कहि आवत नाहीं ।।
जासु नाम बल शँकर कासी । देत सबहि सम गति अविनाशी ।।
मम लोचन गोचर सोई आवा । बहुरि की प्रभु अस बनहि बनावा ।।
और बालि ने श्री राम के सामने मर का मुक्त होना स्वीकार किया , पुनर्जीवित होने से इनकार कर दिया ।
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🎆 इस कारण हे अर्जुन ! सब समय मे निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर ! मन और बूद्धि से पूरी तरह मुझको ही समर्पित हुआ तू ,निसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा -
🚫 मुझ परमेश्वर में निरंतर ध्यान का अभ्यास करके , चित्त से निरंतर मेरा चिंतन करने वाला व्यक्ति , परम् प्रकाश रूपी दिव्य पुरुष यानी मुझ परमेश्वर को पा लेता है ।
🚫 जो पुरुष - सर्वज्ञ ,अनादि , सूक्ष्म से अति सूक्ष्म ,सबको धारण पोषण करने वाले ,अचिन्त्य स्वरूप , सूर्य के समान चेतन प्रकाश रूप ,अविद्या रहित ,सच्चिदानन्द घन ,मुझ #परमात्मा का #स्मरण करता है ,, वह अंत काल मे भी योगबल से भृकुटि के मध्य में प्राण को अच्छी तरह स्थापित करके निश्छल मन से मुझे स्मरण करता हुआ ,उस दिव्यस्वरूप परमात्मा को #पा लेता है ।
वेद को जानने वाले व योगीजन जिस परमपद की चाहना करते है ,उसका विवरण इस प्रकार है
🚫 ** सब इन्द्रियो को विषयो से हटाकर , मन को स्थिर करके , अपने प्राण को मस्तक में स्थापित करके ,योग धारणा में स्थित होकर , जो योगीजन--
🍎 ॐ इस एक अक्षर स्वरूप ब्रम्ह को उच्चारण करता हुआ ,मेरा चिंतन करता हुआ शरीर को त्याग देता है ,वह परम शांति को प्राप्त करता है ।
🚫हे अर्जुन ! परम् सिद्धि को पाए हुए योगीजन ,का #पुनर्जन्म #नही होता है ।
🍊 संपूर्ण दृश्यमान जगत व प्राणी गण , ब्रम्हा के दिन के प्रवेश काल मे उत्पन्न होते है और ब्रम्हा जी की रात्रि के प्रवेश काल मे ब्रम्हा जी के सूक्ष्म शरीर में ही लय हो जाते हैं - परंतु परमात्मा कभी भी नष्ट नही होते ।
🎃 ॐ अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परम गति कहते है ; और परम गति पाकर मेरे धाम गया हुआ कोई भी वापस नही आता ।
🚫 पुण्य लोको में जाने के 2 मार्ग हैँ--
🍘 सूर्य के उत्तरायण रहने के 6 माह में मर कर गए ब्रम्हवेत्ता योगीजन , ब्रम्ह को प्राप्त होते है --
🍘 जब कि सूर्य के दक्षिरायण रहने के 6 महीनों में मरकर गया हुआ सकाम कर्मयोगी को , स्वर्ग में अपने शुभकर्मों का फल भोगकर फिर मृत्यु लोक में जन्म लेना पड़ता है ।
योगी जन किसी प्रकार मोहित नही होते इस लिए है अर्जुन ! तू सब काल मे मेरी प्राप्ति के लिए साधन कर ।
योगी पुरुष इस तत्व को जानकर सनातन परम पद को पाता है ।
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श्री भीष्म पितामह ने मृत्यु के लिए सूर्य के उत्तरायण होने - मकर सक्रांति -तक की प्रतीक्षा की और तब तक शर शैया पर लेटे रहकर अत्यंत कष्टमय जीवन जिया
शेष अगली पोस्ट में ************* राम नाथ गुप्त कन्नौज***

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