महाभारत कथा -477

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पोस्ट -( 477 )- अथ श्री  महाभारत कथा - समीक्षा  ( ७७ ) - श्री मद् भगवद् गीता ज्ञान गंगा प्रवाह (10 ) -सप्तम अध्याय --

      श्लोक 1 से 7 तक भगवान के समग्र रूप संबंधी विज्ञान गुक्त ज्ञान का निरूपण - भगवान उवाच

   🚫1- अर्जुन - मैं तेरे लिए इस विज्ञान सहित ज्ञान को संपूर्णतया कहूंगा जिसे जानकर  संसार मे जानने योग्य और कुछ शेष नही बचेगा ।


   🚫 2-हजारो मनुष्यो में कोई एक ब्रम्ह साक्षात्कार रूप सिद्धि के लिए यत्न करता है ,और उस यत्न करने वाले सिद्ध पुरुषों में से भी कोई एक मेरे पारायण होकर  #ज्ञानोत्तर  #पराभक्ति  #प्रेम द्वारा मेरे समग्र रूप को तत्व से जानता है -


     🚫 3-मेरी दो प्रकार की प्रकृति या विद्याये है -पहली    पृथ्वी ,जल ,अग्नि ,वायु ,आकाश, मन, बूद्धि ,अहंकार इस प्रकार 8 प्रकार से विभाजित मेरी  #प्रकृति है -यह  #अपरा ( जड़ प्रकृति ) है- 

      और  दूसरी जिससे यह संपूर्ण जगत धारण ( निर्माण ,रक्षा ) किया जाता है वह जीव रूपी  #परा ( चेतन ) #प्रकृति जानिए । अर्जुन  तू यह समझ कि संपूर्ण भूत ( संसार मे विद्यमान सभी   वस्तुएं तथा सभी प्राणी ) इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होते है -- मैं ( #श्रीकृष्ण ) संपूर्ण जगत का  #प्रभव और  #प्रलय हूँ -

     मैं ही सम्पूर्ण जगत का मूल कारण हूँ -मुझसे (भगवान ) भिन्न कुछ भी नही है और सारा  #जगत -- #सूत्र में प्राणियो सहित  #मुझ में ही  #गूंथा हुआ है ।

      🍎दूसरे शब्दों में चेतन यानी सभी प्राणियों की आत्मा (परा शक्ति )और प्रकृति रूप अपरा जड़ शक्ति दोनो के मूलाधार श्री कृष्ण ही है उनसे अलग कुछ भी नही है ।


      श्लोक 8 से 13 तक -समस्त पदार्थो में जीवन तत्व रूप से भगवान की व्यापकता -

     🚫 जो भी कुछ संसार मे है वह श्री कृष्ण का ही स्वरूप है और उसका मूल तत्व भी श्री कृष्ण ही है -

  इसे समझाते हुए प्रभु बोले -

      🎈1--मैं जल में रस ( जल का गुण ) हूँ- चंद्रमा और सूर्य में प्रभा हूँ --सम्पूर्ण वेदों में ॐ  ओमकार हूँ --आकाश में शब्द हूँ--और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ --

        मैं पृथ्वी में गन्ध हूँ - अग्नि में तेज हूँ -संपूर्ण भूतो में उनका जीवन ( आत्मा ) हूँ और तपस्वियों में तप हूँ ।


       🎈 2- अर्जुन ! तू संपूर्ण  #भूतो  का  #सनातन  #बीज मुझको ही जान । मैं  बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ -मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल हूँ और सब भूतों मे धर्म शास्त्र के अनुकूल  काम  हूँ । 


       🎈3- सत्वगुण ,रजोगुण ,तमोगुण  की भावनाएं इन तीनो प्रकार के भावों से यह सब संसार और प्राणी समुदात मोहित हो रहा है ; उन सबको तू मुझसे ही उत्पन्न होता जान परंतु वे मुझसे उत्पन्न है इसलिए वास्तव में  मैं और वे मुझमे नही है ;  इसलिए इन तीनो गुणों से परे अलग मुझ अविनाशी परम भाव  स्वरूप भगवान को  वे नही जानते --


     श्लोक 14 से 19 तक भगवद भक्ति की महिमा , आसुर स्वभाव वालो की निंदा --

     🎃1- मेरी यह त्रिगुण मयी *माया* बड़ी दुस्तर है परंतु जो पुरुष मुझको निरंतर भजते और मेरी शरण ग्रहण करते  है  वे  इस माया का उलंघन करके संसार से मुक्त हो जाते  है ।

     🎃 2- माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है ,ऐसे आसुर स्वभाव वाले विषयासक्त मूढ़ मनुष्य मेरा भजन नही करते और संसार के मायाजाल में फंसे रहते है ।

      🎃3-चार प्रकार से  भक्तजन मेरा भजन करते है ---


     🎈 प्रथम - अथार्थी -जो लौकिक और पारलौकिक भोग सुखों के लिए कामना सहित  मेरा भजन करते है  जैसे , ध्रुव , सुग्रीव ,विभीषण आदि ।


      🎈दूसरे - आर्त --शारीरिक और मानसिक , वर्तमान और भावी संकट से व्याकुल होकर उनसे छूटने के लिए  मुझे भजते है   जैसे -गजराज  द्रोपदी आदि ।


       🎈तीसरे -- जिज्ञासु --  केवल भगवान  के स्वरूप को भली भांति जाने की इच्छा रखने  वाले 

  जैसे परीक्षित , उद्धव  आदि ।


         🎈चौथे --ज्ञानी -- परमात्मा के ज्ञान की अथवा परमात्मा की प्राप्ति हो जाने पर परमात्मा में रमे  हुए सहज ही उनका अनुभव रूप भजन करने वाले   जैसे   श्री शुकदेव जी ,सनकादि ऋषि  आदि ।


       🚫 श्री कृष्ण कहते है , इन सब भक्तो में मुझे ज्ञानी  और जो अनन्य भाव से मुझे भजता है वही सबसे ज्यादा प्रिय है ।


       🎆   श्लोक 20 से 23 तक मे भगवान  अन्य देवताओ की उपासना करने वालो के बारे में बताते हुए कहते है कि --भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है ; वे लोग अपने स्वभाववश श्रीघ्र  कामना  की पूर्ति हेतु -   #अन्य  #देवताओ को भजते है। वे   सभी अन्य देवता  #मेरे ही  #अंग_स्वरूप है -जो जो सकाम भक्त , जिस जिस देवता की श्रद्धा से पूजा करता है , वह उस देवता से  #मेरे ही  #विधान ( निश्चित )किये हुए उन इच्छित  #भोगो को निसंदेह प्राप्त करता है  । परंतु उन देवताओ से प्राप्त फल  #नाशवान होता है ।


    🚫  अन्य देवताओ को पूजने वाले उन्ही देवताओ को प्राप्त होते है ; परंतु मेरे भक्त -चाहे जैसे मुझे  भजे ; 

अन्ततः  मे वे  #मुझको ही  #प्राप्त होते है ।


     🎽🚫  श्लोक 24 से 30  में भगवान ने फिर जोर देकर कहा कि जो मेरे शरण होकर  जन्म और  मरण  से छूटने के लिए प्रयास करते है वे मुझको  अवश्य प्राप्त हो जाते हैं ।

  शेष अगली पोस्ट में --------------------  राम नाथ गुप्त   कन्नौज ---

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