पोस्ट --( 476 )-- अथ श्री महाभारत कथा -- समीक्षा नम्बर ( ७६ ) श्री मद भगवद गीता ज्ञान गंगा प्रवाह नम्बर
( ९ ) छठा अध्याय -
छठा अध्याय -- श्री कृष्ण द्वारा निष्काम कर्म योग का प्रतिपादन करते हुए आत्मोद्धार के लिये प्रेरणा -श्लोक 1 से 10 तक --- भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले --
🎈1-जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर #निष्काम कर्म करता है ,वही #सन्यासी और #योगी है -क्योकि उस पुरुष का शम ( सर्व संकल्पों का अभाव ) ही कल्याण का हेतु है -- -केवल अग्नि से तपने वाला या अग्नि का त्याग करने वाला और कर्मो की क्रियायो को त्याग करने वाला सन्यासी या योगी नही है , क्योकि संकल्पो का त्याग न करने वाला योगी हो ही नही सकता ।
🎈 2- यह मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है । जिसका #मन और #इन्द्रियो सहित शरीर #जीता हुआ है -जो सर्दी ,गर्मी, सुख दुख ,और मान अपमान में भी जिसके अंतःकरण की वृतियां भली भांति शांत हैं -जिसके लिए #मिट्टी ,पत्थर और #स्वर्ण #समान है -जो सुह्रद , मित्र शत्रु , उदासीन ,मध्यस्थ , बंधुगणों में तथा धर्मात्मा और पापियों में भी #समान #बुद्धि रखता है ,वही #श्रेष्ठ #योगी है और अपना #मित्र है
🎈 मन और इन्द्रियो के वश में रहकर उनके अनुसार चलने वाला , जो भी मनुष्य या साधक है वह अपना ही -शत्रु है ।
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श्री राम चरित मानस अरण्य कांड दोहा 35 के बाद -श्री राम द्वारा शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश --
मन्त्र जाप मम द्दढ बिस्वासा । पंचम -भजन सो वेद प्रकाशा ॥
छठ -दम सील बिरति बहु कर्मा । निरत निरंतर सज्जन धरमा ॥
सातवँ -सम मोहि मय जग देखा । मोते सन्त अधिक कर लेखा ॥
आठवँ - जथा लाभ संतोषा । सपनेहुँ नहि देखहि पर दोषा ॥
नवम-सरल सब सन छलहीना । मम भरोस हिंय हरष न दीना ॥
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श्लोक 11 से 32 तक --ध्यान योग की विधि आदि का विस्तृत उपदेश -
🎈 1- शुद्ध स्थान में जिस पर क्रमशः , कुशा ,मृगछाला और वस्त्र बिछे हों -जो न बहुत ऊंचा हो न बहुत नीचा -उस आसन पर बैठकर ,चित्त और इन्द्रियो की क्रियाओं को वश में रखते हुए ,मन को एकाग्र करके अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करें ।
🎈2--शरीर ,गले और सिर को समान सीधा रखकर - स्थिर होकर ,अपनी नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि जमाकर ,अन्य दिशाओ की ओर न देखता हुआ , भय रहित , सावधान रहकर -मन को रोककर -मुझ ( श्री कृष्ण ) में चित्त लगाकर --आत्मा को निरंतर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में जोड़े --
🎈 3-- इस प्रकार योग साधना करता हुआ पुरुष , मुझ में रहने वाली निर्वाणपरमा ( मुक्तिदायक ) --
परमानन्द की पराकाष्ठा स्वरूप शांति को प्राप्त होता है ।
🎈4- जब भली भांति वश में किया हुआ चित्त परमात्मा में स्थित हो जाता है ; तब संपूर्ण भोगो में अनासक्त पुरुष, सच मे योगयुक्त माना जाता है और जैसे वायु रहित स्थान में दीपक की ज्योति स्थिर रहती है उसी प्रकार उसका मन मुझ परमेश्वर में स्थिर रहता है और सच्चिदानन्द ब्रम्ह के साथ ऐक्य भाव को प्राप्तकर उत्तम सुखों को प्राप्त होता है ।
🎈5-- जो पुरुष सर्वत्र मुझ भगवान वासुदेव को ही देखता है , उसके लिए मैं कभी भी अदृश्य नही होता -और वह मेरे लिए अदृश्य नही होता ; यानी प्रभु बराबर उसके साथ रहकर #उसकी #रक्षा करते है ।🚫
श्लोक 33 से 36 - मन की चंचलता और उसको रोकने का साधन
अर्जुन ने भगवान से प्रश्न किया --" है कृष्ण , यह मन बड़ा चंचल बड़ा बलवान है , इसको रोकना वायु को रोकने के समान दुष्कर है ; इसे कैसे रोका जाए "?
श्री कृष्ण बोले -- 🚫 निसंदेह मन को वश में करना और इन्द्रिय जनित सुखों की ओर जाने से रोकना , बहुत मुश्किल है -परंतु अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में किया जा सकता है ।
श्लोक 37 से 47 तक #योगभ्रष्ट पुरुष की गतियां और भगवदचित्त होकर श्रद्धापूर्वक भजन करने वाले योगी की महिमा । अर्जुन के इस सम्बंध में प्रश्न का उत्तर देते हुए श्री कृष्ण बोले --
🚫1- योग में श्रद्धा रखने वाला परंतु किसी कारणवश मनके विचलित होने के कारण ,जो योग भ्रष्ट हो जाये --उसका भी न तो इस लोक में नाश होता है और न ही परलोक में --वह दुर्गति को प्राप्त नही होता ----
🎈ऐसा योगभ्रष्ट पुरुष , अपने कर्मो के आधार पर ,पुण्यकर्मा पुरुषों के लोको (स्वर्गादि उत्तम लोको ) में बहुत काल तक निवास करके , फिर पृथ्वी पर जन्म लेकर , पूर्व जन्म के अभ्यास के कारण , पुनः योगों में प्रवत्त होकर ,तत्काल ही परम गति को प्राप्त कर लेता है ।
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🎈योग भ्रष्ट पुरुषों में जड़ भरत की कथा प्रसिद्ध है - शिकारी के बाण से मृत मृगी के तुरंत पैदा हुए बच्चे के मोह में पड़ कर राजर्षि भरत ने दिन रात उसी बच्चे की चिन्ता करके अपनी साधना को गंवा दिया तथा योगभ्रष्ट हुए ,फिर अगले जन्म में पूर्व जन्म के संस्कार से अत्यंत विद्वान होते हुए भी - आंतरिक ब्रम्ह ध्यान में निरंतर रहते हुए , मूक और निस्पर्ह पागलों सा जीवन जिया और एक राजा रहूगण को ब्रम्हज्ञान का उपदेश भी दिया और उसी जन्म में मुक्त हो गए 🎈
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🍎 2- योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है -और वह सकाम कर्म करने वालो से भी उत्तम है -इसलिए अर्जुन तू योगी बन ।
3-- संपूर्ण योगियों में जो श्रद्धावान योगी , अपनी अंतरात्मा को मुझ में लगाकर , निरंतर मुझे भजता है -वह योगी मेरे मत में सर्वोत्तम है --
शेष अगली पोस्ट में ********* राम नाथ गुप्त कन्नौज*****

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