श्री रामायण जी की कथाएँ 119


 पोस्ट --( 119 ) श्री रामायण जी की कथाएँ -- श्री बाल्मीक रामायण - उत्तरकाण्ड सर्ग --19 से 22 तक -

    राजा मरुत्त को जीतने के बाद राक्षस राज रावण क्रमशः अन्य नरेशों के नगरों मे भी गया - तब निर्भय , बुद्धिमान, तथा धर्मपूर्ण विचार रखनेवाले बहुत से शक्तिशाली राजाओ ने भी शत्रु की प्रबलता देखकर , उसके सम्मुख अपनी हार स्वीकार कर ली -राजा दुष्यंत , राजा सुरथ ,कन्नौज के राजा #गाधि ( महर्षि विश्वामित्र के पिता ) , राजा गय , और हस्तिनापुर के राजा पुरुरवा ,इन सभी भूपालों ने रावण के सम्मुख अपनी हार स्वीकार कर ली 

     🍎 तदन्तर रावण इंद्र द्वारा सुरक्षित, अमरावती के भांति शोभायमान , श्री राम के पूर्वज "राजा अनरण्य " द्वारा शाषित अयोध्या पुरी पंहुचा -- राजा अनरण्य ने रावण की विश्व विजय यात्रा के बारे में सुन रक्खा था इसलिए उन्होंने रावण का मुकाबला करने के लिए पूरी तैयारी करते हुए बहुत बड़ी सेना एकत्रित कर ली थी - दोनो सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ परंतु अनरण्य की सेना , इसी प्रकार नष्ट होने लगी जैसे पतिंगे दीपक के सामने जल मरते है - तब अनरण्य और रावण का द्वंद युद्ध हुआ - 


     🎃 वर के प्रभाव से अजेय हो चुके रावण ने एक जोर दार तमाचा ,राजा अनरण्य के मस्तक पर मारा जिससे व्याकुल होकर थर थर कांपते हुए , वे रथ से गिर पड़े - मृत्यु की ओर जाते हुए राजा अनरण्य की रावण ने हंसी उड़ाते हुए , इच्छवाकु कुल की वीरता का मजाक बनाया - तब राजा उससे बोले --


    🎈" मेरे प्राण जा रहे है इस लिए काल विवश मैं कुछ नही कर सकता हूँ -- राक्षस ! तूने अपने व्यंगपूर्ण वचनों से इच्छवाकु कुल का अपमान किया है ,इस लिए मैं तुम्हे श्राप देता हूँ कि मेरे ही वंश में दशरथ नन्दन श्री राम प्रकट होंगें , जो तेरे प्राणों का अपहरण करेंगे --


        फिर एक दिन आकाश मार्ग में विचरण करते समय रावण की भेंट देवर्षि नारद से हो गयी -- नारद जी ने

रावण के अत्याचारों से संसार के प्राणियों की रक्षा करने के उद्देश्य से , रावण के बल पराक्रम की प्रसंशा करते हुए उससे कहा --

    🎃 "तुम मृत्यु के आधीन मानवों को क्यो मार रहे हो -- यह मृत्यु लोक तो वैसे भी , भूख ,प्यास जरा आदि से क्षीण हो रहा है ,दैव के मारे हुए इस मृत्युलोक का विनाश न करो -- शत्रु नगरी पर विजय पाने वाले पुलस्त्य नन्दन ! इन सब प्राणियों को यमलोक में अवश्य जाना पड़ता है --अतः अगर शक्ति हो तो तुम यमराज को अपने काबू में करो । उन्हें जीत लेने पर तुम सबको जीता हुआ मानो।"

        ऋषि नारद की बात स्वीकार करके अभिमानी रावण , यमराज का वध करने के लिए उद्द्यत होकर दक्षिण दिशा की ओर चला , जहां यमराज निवास करते हैं -- देवर्षि नारद भी शीघ्रता से चलकर पहले ही यमराज के पास पँहुचे तथा उन्हें आने वाले संकट , रावण के आक्रमण की सूचना दी 


        रावण ने यमलोक पंहुचकर , यमराज के सेवको द्वारा पापी प्राणियों को नाना प्रकार के भयंकर दण्ड देते हुए देखा व उन प्राणियों की दारुण चीखों को भी सुना -- वहां पुण्यात्मा व्यक्ति तमाम प्रकार के सुखों का उपयोग भी कर रहे थे -- 


       🎈यह देखकर बलवान राक्षस दशग्रीव ने अपने पराक्रम से उन यातना भोगने वाले प्राणियों को बल पूर्वक मुक्त कर दिया --तब उन प्रेतों की रक्षा करने वाले यमदूत रावण पर टूट पड़े -- पहले रावण घायल हुआ परंतु फिर उसने भगवान शंकर के पासुपतास्त्र को छोड़ दिया जिससे यमराज के सैनिक दग्ध हो गए ।


          समाचार पाकर " यमराज " ," मृत्यु " को साथ लेकर वहां आये , दोनो ओर से भयंकर संग्राम हुआ ; फिर क्रोधित होकर यमराज ने अपना अमोघ कालदण्ड को रावण पर प्रहार करने के लिए उठा लिया --कालदण्ड को देखकर सभी सैनिक भाग गए -यमराज कालदण्ड से रावण पर प्रहार करना ही चाहते थे कि वहां ब्रम्हा जी प्रगट हो गए और उन्होंने यमराज को रावण पर कालदण्ड से प्रहार करने से रोकते हुए कहा -


        🎈" मैने इस राक्षस को देवताओ द्वारा अवध्य होने का वरदान दिया है -- मेरे द्वारा निर्मित इस -कालदण्ड का प्रभाव भी अमोघ है - कालदण्ड पड़ने पर भी यदि राक्षस मरा या वर के कारण न मरा , तब भी दोनो स्थितियों में मेरी बात असत्य होगी --

    🎃🎄"" अगर समस्त लोको पर तुम्हारी दृष्टि है ,तो आज रावण की रक्षा करके मुझे सत्यवादी बनाओ ""


      🍓 यमराज बोले --""आपकी आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है --परन्तु यदि वरदान से युक्त होने के कारण मेरे द्वारा इस निशाचर का वध नही हो सकता है तो इस समय इसके साथ युद्ध करके ही मैं क्या करूंगा ""

      यह कहकर यमराज अपने रथ सहित वहां से अन्तरध्यान ही गए -- और रावण अपनी विजय की दुन्दुभी बजाता हुआ , चला गया --


  * क्रमशः ********* राम नाथ गुप्त कन्नौज ****

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