महाभारत कथा -475, सांख्य योग , निष्काम कर्म योग एवं भक्ति सहित ज्ञान योग का वर्णन

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 पोस्ट -( 475 )- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( ७५ ) तथा श्री मद भगवद गीता ज्ञान गंगा प्रवाह ( 8 )--सांख्य योग , निष्काम कर्म योग एवं भक्ति सहित ज्ञान योग का वर्णन --गीता पंचम अध्याय श्लोक 1 से 29 तक -सम्पूर्ण अध्याय - तथा श्री राम चरित मानस के साथ तुलनात्मक विवेचना ----

     🍎 अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से प्रश्न किया - " आप कभी तो कर्मो से सन्यास की ओर और कभी कर्मयोग की प्रशंसा करते है ; इन दोनों में से जो एक मेरे लिए भलीभांति सुनिश्चित कल्याण कारक हो ,वही मुझे बतलाइए " -

     श्री भगवानुवाच -- 

     🚫 1- "कर्मयोग और कर्म सन्यास ये दोनों ही कल्याण करने वाले है , परंतु इन दोनो में भी कर्म सन्यास की अपेक्षा #कर्मयोग ,साधन में सुलभ होने के कारण #श्रेष्ठ है ।


     🚫 2- जो पुरुष न किसी से #द्वेष रखता है ,न ही #आकांक्षा करता है उसे सदा #सन्यासी ही समझना चाहिए ,क्योकि राग द्वेषादि ,द्वंन्दों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार बन्धन से मुक्त हो जाता है ।

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      श्री राम चरित मानस उत्तरकाण्ड दोहा 38 में श्री राम जी स्वयम् बताते हैं --

           निंदा स्तुति उभय सम । ममता मम पद कंज ।।

           ते सज्जन मम प्रान प्रिय । गुन मन्दिर सुख पुंज ।।

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     🚫 3- कम बुद्धि के लोग ही उपर्युक्त सन्यास और कर्मयोग को अलग अलग फल देने वाले बतलाते है । सच्चाई में विद्वजनों के अनुसार ; इन दोनों में से एक मे भी सम्यक ( पूर्ण ) रूप से स्थित पुरुष , दोनो के फल - *रूप #परमात्मा*- को प्राप्त हो जाता है । ज्ञानियो द्वारा जो #परमधाम प्राप्त किया जाता है , वही #कर्मयोगिओ को भी प्राप्त होता है ; परंतु #कर्मयोग के #बिना #सन्यास ( यानि मन इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले संपूर्ण कर्मो में कर्त्ता पन का त्याग ) प्राप्त होना #कठिन है ।


     🚫 4 - भगवत स्वरूप का भजन करने वाला कर्मयोगी ,परम ब्रम्ह परमात्मा को प्राप्त हो जाता है 

     🚫 5- कर्मयोगी कौन है - 

       🍎 जिसका मन अपने वश में है ; जो जितेंद्रिय और विशुद्ध अंतःकरण वाला है ; और सम्पूर्ण प्राणियो का आत्मरूप #परमात्मा ही जिसकी #आत्मा है , ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी पापो में लिप्त नही होता -इन्द्रियो से सम्पूर्ण कर्म को करता हुआ भी वह मानता है कि मैं कुछ नही करता हूँ परंतु #सकाम पुरुष कामना की प्रेरणा में फल में #आसक्त होकर कर्म बन्धन में #बन्ध जाता है ।


      🚫 6 -ज्ञानयोग ---

       🍎 जो मन और बूद्धि से अपने आप को सच्चिदानन्द #परमात्मा में निरंतर #एकाकार का भाव उत्पन्न कर लेता है ऐसे भागवत पारायण पुरुष ज्ञान के द्वारा पाप रहित होकर #परमगति को प्राप्त होते है । 


      🍎 ये ज्ञानी जन ,विद्या सम्पन्न ब्राम्हण और गौ हाथी कुत्ते , और चांडाल में #भेदभाव नही करते है और सम दर्शी होकर सभी मे परमात्मा का दर्शन करते है ; क्योंकि #ब्रम्ह_सभी_प्राणियों_में_निर्दोष_और_समान_रूप से है -इसलिए वे ब्रम्ह में ही स्थित माने जाते है ।

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         राम चरित मानस के अनुसार - भगवान शंकर उमा जी से कहते है -

                   उमा जे राम चरन रत , विगत काम मद क्रोध ।

                   निज प्रभुमय देखहि जगत , केहि सन करहि विरोध ।

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       🍎 जो पुरुष प्रिय ( मनभावन सुखदायी )को प्राप्त करके हर्षित नही होता और अप्रिय प्राप्त होने पर दुखी नही होता -वह श्री बुद्ध , ब्रम्हवेत्ता पुरुष परमब्रम्ह में स्थित है -

        

        🚫 इन्द्रिय और विषयो के सहयोग से उत्पन्न होने वाले जितने भी भोग है वे वास्तव मे दुख के ही उत्पत्ति स्थल है - जो साधक शरीर छूटने से पहले ही काम क्रोध से उत्पमन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है वही पुरुष योगी है और सुखी है ।

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   रामचरित मानस अरण्य कांड दोहा 14 /15 

                  ज्ञान मान जँह एकहु नाहीं । देख ब्रम्ह समान सब मांही ॥

                  कहिअ तात सो परम बिरागी । तृन सम सिद्धि तीन गुन त्यागी ॥

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        🚫 बाहर के विषय भोगो का चिन्तन कभी भी न करता हुआ , उन्हें बाहर ही निकालकर , नेत्रों की दृष्टि को भृकुटि के बीच स्थित करके नासिका के बीच विचरने वाले प्राण और अपानवायु को सम करके , जिसकी इंद्रियां मन और बुद्धि जीती हुयी है ; ऐसा जो मोक्ष पारायण मुनि ,इच्छा भय और क्रोध से रहित हो गया हो , वह सदा मुक्त है ।


       🚫 पर जो ऐसा कठिन उपाय नही कर सकता हो तब प्रभु को भक्ति से अपना बना लेता है वह शांति को और मुझको प्राप्त हो जाता है ।

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            🍘 राम चरित मानस अरण्य कांड दोहा 16 से पहले -

                  मम गुन गावत पुलक सरीरा । गद गद गिरा नयन बह नीरा ।।

                  काम आदि मद दम्भ न जाके । तात निरंन्तर बस मैं ताके ।।    

     🍎बचन कर्म मन मोरि गति ,भजनु करहिं नि:काम ।।

          तिन्ह के ह्रदय कमल महुँ , करउ सदा बिश्राम ।।

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    *शेष अगली पोस्ट ************ राम नाथ गुप्त कन्नौज***

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