महाभारत कथा -474

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 पोस्ट -( 474 )-- अथ श्री महाभारत कथा -- समीक्षा ( 74 )- --श्री मद् भगवद् गीता ज्ञान गंगा प्रवाह ( 7 ) चतुर्थ अध्याय - योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा तथा फल सहित विविध यज्ञ का वर्णन 

      ( चतुर्थ अध्याय -श्लोक 19 से 42 तक )

    🚫 पंडित ( विद्वान ) तथा योगी महात्मा पुरुषों के निम्न गुण व आचरण होते है --


   🎈 1- जिसके सम्पूर्ण शास्त्र सम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते है तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञान रूपी अग्नि से दग्ध हो गए है उसको ज्ञानी जन भी पंडित कहते है । 


   🎈2-जो पुरुष समस्त कर्मो में और उसके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके - भोग मय संसार के आश्रय से रहित हो गया हो ; और परमात्मा में नित्य तृप्त है , वह कर्मो में भलीभांति प्रवत्त होता हुआ भी वास्तव में कुछ नही करता और पाप को प्राप्त नही होता ।


   🎈 3-जो बिना इच्छा के अपने आप प्राप्त हुयी परिस्थिति में सदा संतुष्ट रहता है -जिसमे मत्सरता ( द्वेष ,कुढ़न ) का सर्वथा अभाव हो गया है ; जो हर्ष ,शोक आदि द्वन्दों से ऊपर हो गया हो , सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला ऐसा - कर्मयोगी - कर्म करते हुए भी कर्मो में नही बंधता ।


    🎈4 -जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है -जो देहाभिमान और ममता से मुक्त हो गया है -जिसका चरित्र निरंतर परमात्मा के ज्ञान और ध्यान में लगा रहा है -केवल यज्ञ ( भगवत सेवा यानी समस्त प्राणियो की सेवा और निष्काम कर्म ) के लिए कर्म करने वाले ऐसे पुरुष के कर्म पूर्ण रूप से विलीन हो जाते है -उनका कुफल उसे नही मिलता ।

        फल सहित विभिन्न यज्ञओ का वर्णन --

    🚫 1- जिस यज्ञ में अपर्ण अर्थात श्रुवा आदि भी ब्रम्ह है -हवन किये जाने वाले द्रव्य भी ब्रम्ह है -और ब्रम्ह रूप कर्ता द्वारा -ब्रम्ह रूप अग्नि में - आहुति देने की रूप क्रिया भी ब्रम्ह है -ऐसे उस ब्रम्ह कर्म में स्थित योगी के द्वारा प्राप्त किये जाने वाले फल भी ** ब्रम्ह **ही है ।

       निसी प्रकार का विवरण श्री राम चरित मानस में वर्णीत है -

          सीय राम मय सब जग जानी - करऊँ प्रणाम जोरि जग पानी ।। तथा 

             उमा जे राम चरन रत । विगत काम मद क्रोध ॥

             निज प्रभु मय देखहि जगत । केहि सन करहि विरोध ॥ और 

      सो अनन्य जाके अस मति न टरई हनुमन्त । में सेवक सचरासर रूप राशि भगवंत ।।


    🚫2-कुछ योगी लोग इन्द्रियो की संपूर्ण क्रियाओं को और प्राणो की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयम -योग रूप अग्नि - में हवन किया करते है ।


    🚫 3- कई पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले ~~~, कुछ तप रूपी यज्ञ करने वाले ,~~~ कुछ योग रूप यज्ञ करने वाले और --~~~ कितने ही अहिंसादि कठिन व्रतों से युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्याय रूपी ज्ञान यज्ञ करते है । ~~~ कुछ प्राण वायु में अपान वायु को हवन करते हुए तपस्या रत है । 

यह सभी साधक यज्ञों द्वारा पापो को नाश करने वाले और यज्ञों को जानने वाले है ।


       🍎 हे अर्जुन ! यज्ञ से बचे हुए अमृत प्रसाद का भोजन करने वाले सनातन ब्रम्ह को प्राप्त होते है -और यज्ञ को न करने वाले पुरुष के लिए यह मनुष्य लोक और परलोक दोनो सुखदायक नही होते ।


       🎆 परंतप ! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ है क्योंकि कर्म पूर्णतया ज्ञान में समाप्त हो जाते है ।


     🍟 है अर्जुन ! श्रद्धावान , तत्पर और जितेंद्रिय पुरुष को प्राप्त ज्ञान रूपी अग्नि ; उनके संपूर्ण कर्मो को भस्ममय कर देती है और वह तुरन्त परम् शांति को प्राप्त हो जाता है । अज्ञानी और श्रद्धारहित संशय से भरा हुआ ; मनुष्यवृत परमार्थ पथ से अवश्य भृष्ट हो जाता है ।

      🚫 इसलिए भरतवंशी अर्जुन ! तू ह्रदय में स्थित इस अज्ञान जनित संशय को , ज्ञान रूपी तलवार द्वारा काटकर समत्व रूप कर्म योग में स्थित हो जा ; और युद्ध करने के लिए उठ खड़ा हो ।

 शेष अगली पोस्ट में ************* राम नाथ गुप्त कन्नौज ****

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