महाभारत कथा -473

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पोस्ट -( 473 )- अथ श्री महाभारत कथा -- समीक्षा ( ७३ ) -- श्री मद् भगवद् गीता ज्ञान गंगा प्रवाह ( 6 )-- - गीता चतुर्थ अध्याय - श्लोक 1 से 42 तक -

      🍎 अवतार रहस्य - सगुण भगवान का प्रभाव -~~ निष्काम कर्म योग-योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और महिमा व ~~~ विविध यज्ञ और ज्ञान की महिमा -

( इस पोस्ट में श्री गीता जी के चतुर्थ अध्याय के 1 से 18 श्लोकों तक कि विवेचना है )

     🚫 भगवान श्रीकृष्ण बोले -- मैने इस अविनाशी योग ( भगवत सेवा और निष्काम कर्म योग ) को सूर्य से कहा था - सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्त मनु से और मनु ने अपने पुत्र सूर्य वंश के इच्छवाकु राजा से कहा था -


      🍎🎈 हे परंतप अर्जुन ! इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना परंतु बाद में यह ज्ञान बहुत काल तक लुप्तप्राय हो गया । मेरे भक्त और प्रिय सखा होने के कारण इस पुरातन ज्ञान को मैने तुझे बताया है ,यह अति उत्तम रहस्य है ।


      अर्जुन ने प्रश्न किया ---- " सूर्य का जन्म पुरातन काल से है जब कि आपका जन्म तो अभी हुआ है तब मैं कैसे मान लूँ कि आपने यह सब सूर्य से कैसे कहा था "?


       🚫 श्री कृष्ण बोले -- " #मेरे और #तेरे #बहुत से #जन्म हो चुके है । मैं उन सबको जानता हूँ मगर तू

 नहीं । मैं अजन्मा ,अविनाशी स्वरूप तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर रहते हुए ; अपनी प्रकृति में अधिष्ठित रहकर अपनी योगमाया से प्रगट होता हूँ -


            🚫 यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।

                  अभ्युत्थानं धर्मस्य तदात्मानं श्रजाम्यहम ।।7।।

                         परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम ।

                         धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।।8।। 

       " है अर्जुन ! जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है , तब तब ही मैं अपने को उपर्युक्त रूप में प्रकट करता हूँ , साधु पुरुषों का परित्राण करने और पाप कर्म करने वालो का विनाश करने के लिए ,और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग युग मे प्रकट हुआ करता हूँ " 

  *********************** अपनी बात ********

        श्री राम चरित मानस में भी इसी प्रकार वर्णित है -

             जब जब होइ धर्म कै हानी । बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ।।

             तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा । हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ।।

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         🍎 "" हे अर्जुन ! मेरे #जन्म और #कर्म #दिव्य (अप्राकृत और अलौकिक ) है । जो इस तत्व को जान लेता है वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म नही लेता ; वह मुझे ही प्राप्त हो जाता है ।

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              व्याख्या -- अपनी बात ***********

       🍎 भगवान अजन्मा होते हुए भी जन्म लेते से दिखते है ; अविनाशी होते हुए भी प्रकट हो जाते है ; अनन्त लोको के अनन्त प्राणियो के सर्वतन्त्र स्वतंत्र सर्व समर्थ महान ईश्वर होते हुए भी -माता , पिता , बन्धु , बांधव , आदि तथा प्रेमी भक्तो के पराधीन से प्रकट होते है । #प्राकृत जगत में #अप्राकृत लीला करने के लिए भगवान अपनी #प्रकृति में #अधिष्ठित रहकर अपनी * #माया * से प्रकट होते है ।

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        🚫 श्री कृष्ण उवाच - " पहले भी जिनके राग ,भय ,और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए थे ,और जो मुझमे अनन्य प्रेम पूर्वक स्थिर रहते थे ,ऐसे मेरे #आश्रित रहने वाले ,बहुत से #भक्त , उपर्युक्त मेरे जन्म कर्म के तत्वज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे भाव ( #मुझे ) को प्राप्त हो चुके है "

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       राम चरित मानस में #अनन्य भक्त के बारे में श्री राम , श्री हनूमान जी से बताते है - 


       🍎 सो अनन्य जाकी असि , मति न टरई हनुमंत । मैं सेवक सचराचर रूप राशि भगवंत ।।

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     🍎 ** ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तास्वथैव भजाम्यहम । मम वर्तमानुव तरन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:*(11)


     🚫🍘 जो मुझे #जिस #प्रकार #भजते है मैं भी उनको #उसी #प्रकार से #भजता हूँ ! अर्जुन #सभी #मनुष्य सब प्रकार से #मेरे ही #मार्ग का #अनुसरण करते है । #सकाम कर्म करने वाले #शीघ्र फल प्राप्ति हेतु #देवताओ का पूजन करते है , उन्हें #वही फल मैं देता हूँ ।


       🚫 इस प्रकार सभी कार्यो को करते हुए भी , मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू अकर्ता ही जान ! कर्म और फल मुझ में लिप्त नही होते ; यह जानकर तू पूर्वजो द्वारा किये जाने वाले कर्मो को ही कर !


        🚫 कर्म क्या है इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हो जाते है -इसलिए करने योग्य कर्म और न करने वाले कर्मो के बारे में निश्चयात्मक रूप से निर्णय करना चाहिए ।

             शेष अगली पोस्ट में ************* राम नाथ गुप्त कन्नौज ******
 

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