महाभारत कथा 472

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                       अथ श्री महाभारत कथा


 पोस्ट -( 472 )- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा -( ७२ ) -श्री मद भगवद गीता ज्ञान प्रवाह ( 5 ) - 
  गीता तृतीय अध्याय -


       🚫 अज्ञानी और ज्ञानी के लक्षण तथा राग द्वेष रहित कर्म करने लिए प्रेरणा और पाप में कारण काम ( वासनाएं )और काम के निरोध का साधन --


     पिछली पोस्ट में तृतीय अध्याय के 1 से 24 तक के श्लोकों के आधार पर व्याख्या प्रस्तुत की थी -अब तृतीय अध्याय के श्लोक 25 से 43 तक के आधार पर व्याख्या प्रस्तुत है 


      भगवान श्री कृष्ण -अर्जुनसे ज्ञानी और अज्ञानी के लक्षण बताते हुए कहते है -


     🍎 #कर्म में #आसक्त हुए अज्ञानी जन जिस प्रकार कर्म करते है ---आसक्ति रहित विद्वान ( ज्ञानी ) को भी --लोकसंग्रह चाहते हुए --बिल्कुल #उसीप्रकार #कर्म करने चाहिए ।


     🍘 यद्यपि सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते है - तथापि जिनका #अंतःकरण #अहंकार से #मोहित हो रहा है ,वह #अज्ञानी अपने को सभी काम करने वाला * #कर्ता* मानता है ---परंतु #ज्ञानी ,सारे कर्मो को उसी प्रकार करते हुए भी उनमे #आसक्त नही होता -


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   श्री राम चरित मानस सुंदर कांड दोहा 47 / 4 भगवान श्री राम यही बात विभीषण से कहते है --


             जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुहद परिवारा ।।
             सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँधि बर डोरी ।।
             समदर्शी इच्छा कछु नाहीं । हर्ष शोक भय नहिँ मन मांही ।।
             अस सज्जन मम उर बस कैसे । लोभी ह्रदय बसई धनु जैसे ।।


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        🚫🍊 इसलिए हे अर्जुन ! मुझ ( भगवान ) में लगे हुए चित्त के द्वारा , सब #कर्मो को मुझ में #निक्षेप करके -- #आशारहित -- #ममतारहित --(#कामना #ज्वर से #रहित ) होकर तू #युद्ध कर !! #


        इन्द्रिय इन्द्रिय में राग द्वेष छिपे हुए स्थित है , मनुष्य को इन #राग #द्वेष के वश में नही होना चाहिए , क्योकि ये दोनों ही उसके कल्याण धन को लूटने वाले #बटमार #शत्रु है ।


       🚫 अच्छी प्रकारसे आचरण में लाये हुए पराए धर्म से , गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है , परंतु पराया धर्म भयकारक है -


      🍎 अर्जुन ने प्रश्न किया -श्री कृष्ण, तो फिर यह मनुष्य स्वयम न चाहता हुआ भी बलात्कार से लगाये हुए की भांति , किसके द्वारा प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है ?


           
        🎆 भगवान श्री कृष्ण ने उत्तर दिया --रजोगुण ( विष्याशक्ति रूप रज - राग ) से उतपन्न यह #काम ( विभिन्न कामनाये ) से प्रतिहित ( किसी के कारण #अपूर्ण रहने पर ) --- #क्रोध बनता है --यह भोगो से कभी तृप्त न होने वाली कामनाएं ही बड़ी पापी है इनको तू वैरी जान ! 


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   कुछ इसी प्रकार का विवरण -श्री राम चरित मानस उत्तर कांड 120 /121- में है -


             मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला । तेहिं ते पुनि उपजहिं बहु सूला ।।
             काम -बात कफ -लोभ अपारा । क्रोध -पित्त नित छाती जारा ।।
              प्रीति करहिं जो तीनहुँ भाई । उपजइ सन्यपात दुखदाई ।।
              विषय मनोरथ दुर्गम नाना । ते सब सूल नाम को जाना ।।


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           🚫 जिस प्रकार धुएं से अग्नि तथा मैल से दर्पण ढका रहता है -- है कुन्तीपुत्र अर्जुन ! इस विषयासक्ति ( कभी न पूर्ण होने वाली कामनाओं की धुंध से) #ज्ञान रूपी #अग्नि #ढकी रहती है -इंद्रियां ,मन और बुद्धि यह सब इसके वास स्थान कहे गए है ।


      🍊🚫 यह विषयो में आसक्ति का काम , ज्ञान को ढक कर जीवात्मा को मोहित करता रहता है - इसलिए #इन्द्रियो को #वश में करके , इस ज्ञान विज्ञान को नष्ट करने वाले #काम को अवश्य ही #बल पूर्वक #मार डाल !! 


      🎈🍎इन्द्रियो से परे मन है -और मन से भी परे बुद्धि है । और जो बुद्धि से भी अत्यंत परे है वह आत्मा है । -यह आत्मा ही तेरा स्वरूप है इसलिए बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके तू इस काम रूपी दुर्जय शत्रु को मार डाल !!


                     अथ श्री महाभारत कथा


  ** क्रमशः********** राम नाथ गुप्त कन्नौज**

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