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अथ श्री महाभारत कथा
पोस्ट -( 471 )- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( ७१ ) - श्री मद गीता ज्ञान प्रवाह ॥ 4 ॥ -गीता तृतीय अध्याय -ज्ञानयोग और निष्काम कर्म योग के अनुसार -अनासक्त भाव से नियत काम करने की श्रेष्ठता --
🍎अर्जुन उवाच-- अर्जुन ने श्री कृष्ण से प्रश्न किया - " जनार्दन अगर आप कर्म की अपेक्षा ज्ञान को श्रेष्ठ मानते है तो मुझे घोर कर्म ( युद्ध ) में क्यो लगा रहे है ; आपके इन मिले हुए वचनों से मेरी बुद्धि मोहित हो रही है इसलिए मेरे कल्याण की निश्चित बात बतलाइए "-
🚫 भगवान श्री कृष्ण ने उत्तर दिया - "" निष्पाप अर्जुन ! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा कही गयी है -
1- सांख्य योग की ज्ञान योग से और यही
2- योगियों को कर्मयोग करने से सम्पन्न सम्पन्न होती है ।
🍎 मनुष्य कर्मो को त्यागकर सांख्य योग से सिद्धि कभी नही प्राप्त कर सकता है क्योंकि कोई भी क्षण भर भी बिना कर्म किये नही रह सकता है ।
🍘 सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणो से विवश होकर कर्म करने को बाध्य होता है । जो मनुष्य कर्मेन्द्रियों को हठ पूर्वक रोककर ,मन से उन इन्द्रियो के विषयों का स्मरण करता रहता है , वह मूढात्मा --मिथ्याचारी कहलाता है -
जो मनुष्य मन से इन्द्रियो को वश में करके , अनासक्त होकर , समस्त इन्द्रियो द्वारा कर्म योग का आचरण करता है , वही श्रेष्ठ है -
🎈🍎 तू नियत (शास्त्र विहित कर्तव्य ) कर्म कर - ***क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है --और कर्म न करने से तेरा शरीर का निर्वाह भी नही हो सकेगा **
🍎🎆 यज्ञ ~~~ ( भगवत सेवा और भगवान को समर्पित सभी कर्म ही यज्ञ है ) द्वारा किये जाने वाले कर्मो के अतिरिक्त दूसरे कर्मो में लगा हुआ यह मनुष्य कर्म बन्धन से बंध जाता है इस लिए तू आसक्ति रहित होकर भगवान को समर्पित कर उनके लिए ही सभी कर्मो को कर -
🚫 कल्प के आरम्भ में प्रजापति ने यज्ञ सहित सभी प्रजाओ को उत्पन्न करके सभी से कहा कि यह यज्ञ तुम्हे इच्छित भोग प्रदान करने वाले हों , तुम सब फलो फूलो और इस यज्ञ से देवताओ को उन्नत करो और सभी देवता निस्वार्थ भाव से तुम सब को उन्नत करें और सभी कल्याण को प्राप्त करो ।
🍎 -यज्ञ ( प्राप्त वस्तुओं को प्रभु को समर्पण करना ) से बचे हुए पदार्थो को खाने वाले पुरुष सभी पापो से मुक्त हो जाते है और जो मनुष्य केवल अपने पोषण के लिए ही पकाते खाते है वे पाप को खाते है और वे निश्चय ही चोर है ।
🚫🎈🎆 ( यहां प्रभु को समर्पण माने -प्रभु सभी प्राणियों में बसते है , इसलिए गरीबो और अनाथों के सेवा में प्राप्त वस्तु को लगाना ही प्रभु को समर्पण यानी यज्ञ है )🍎🍊🍘
🍎 कर्म समुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न जान -इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी- अक्षर ब्रम्ह - परमात्मा सदा ही यज्ञ ( सभी जीवों की सेवा ) में प्रतिष्ठित है ।
🍊 तू निरन्त आसक्ति रहित होकर कर्तव्य कर्म का भली भांति आचरण करता रह ; क्योंकि आसक्ति से रहित कर्म करता हुआ मनुष्य ही परमात्मा को प्राप्त हो जाता है ।
🚫 श्री कृष्ण अपना उदाहरण देकर पुनः बोले - यद्यपि तीनो लोको में मेरे लिए न तो कुछ कर्तव्य है , न ही किसी अज्ञात वस्तु को मुझे प्राप्त करना है ; तथापि मैं लगातार कर्म करता रहता हूँ ; क्योकि अगर मैं कर्म न करूं और मेरी देखा देखी जनसमुदाय भी कर्म न करे तो सारी श्रष्टि नष्ट भ्रष्ट हो जाएगी । इस लिए आसक्ति रहित होकर अर्जुन तू कर्म कर -
अथ श्री महाभारत कथा
शेष अगली पोस्ट में ---------------- राम नाथ गुप्त कन्नौज******
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