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अथ श्री महाभारत कथा
पोस्ट--( 470 )-- अथ श्री महाभारत कथा -- समीक्षा-( ७० ) -श्री मद भगवद गीता ज्ञान गंगा प्रवाह ( ३ ) द्वितीय अध्याय - निष्काम कर्मयोग और स्थितिप्रज्ञ पुरुष के लक्षण और उनका महत्व --
🍎 भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में अर्जुन को उपदेश देते हुए द्वितीय अध्याय में श्लोक 1 से 38 तक - सांख्य योग ( ज्ञान योग ) के बारे में बताते हुए अब श्लोक 39 से53 तक निष्काम कर्म योग और 55 से 72 तक स्थिति प्रज्ञ पुरुष के बारे मे बताया -
कर्मण्येवाधिकारस्ते , मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतु भूर्मा ते संगोअस्तवकर्मनि ।।
श्लोक 47
🎈(1) तेरा कर्मो में ही अधिकार है , उनके फलो ( results ) में कभी नहीं । इसलिए तू कर्मो के फल की वासना वाला मत हो ; तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो ।
🎈(2) धनंजय ! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में सम बूद्धि होकर , योग में स्थित हुआ ,कर्तव्य कर्मो को कर , यह समत्व ही योग कहलाता है ।
🎈(3) सकाम कर्म करने वाले , फल चाहने वाले पुरुष , भोग एश्र्वर्य में अत्यंत आसक्त होते है उनकी बूद्धि कभी भी निश्चयात्मक नही होती है ,वे कर्मबन्धन से कभी भी मुक्त नही हो सकते है और हमेशा जन्म मरण के चक्रव्यूह में बंधे रहते है । इस लिए समत्वरूप बुद्धि योग वाले निष्काम कर्म की अपेक्षा सकाम कर्म अत्यंत ही तुच्छ है ।
🎈(4) निष्काम कर्म करने वाला व्यक्ति , अपने सभी कर्मो का फल में आसक्ति न होने के कारण , पुण्य और पाप दोनो को इसी लोक में त्याग देता है (उनसे मुक्त हो जाता है ) । यही कर्म बन्धन से छूटने का एकमात्र उपाय है ; और जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर निरापद परम् पद को प्राप्त करने का उपाय है ।
🎈(5) इसलिए ,अर्जुन तू इस समत्वररूप बुद्धि योग ( निष्काम कर्म ) का पालन कर अपने कर्मो को करो , इसे करते करते ,जब तेरी बूद्धि मोह रूपी दलदल को भलीभांति पार कर जाएगी , उस समय तू सुने हुए और भविष्य में सुने जाने वाले इस लोक ,परलोक के सभी भोगों से विरक्त हो जाएगा ।
🎈 (6) भांति भांति के वचनों को सुनने से विचलित हुयी तेरी बुद्धि ,जब शुद्ध स्वरूप ,परमात्मा में चली और वही ठहर जाएगी , तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा ।
स्थितिप्रज्ञ पुरुष के लक्षण--
🍎 जब व्यक्ति मन मे स्थित सम्पूर्ण कामनाओं में आसक्ति को त्यागकर आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है ,दुखो की प्राप्ति होने पर जिसके मन मे उद्वेग नही होता और सुखों के प्राप्त होने पर सर्वथा निस्पृह रहता है ,सर्वत्र स्नेह रहित होते हुए ,शुभ और अशुभ वस्तुओं को प्राप्त होकर न तो प्रसन्न होता है न ही द्वेष करता है वही स्थितिप्रज्ञ परुष कहलाता है ।
**** व्याख्या - ****** अपनी बात ****
🍎🎈विषयो का चिंतन करने वाले व्यक्ति की उन विषयों में आसक्ति होती है , आसक्ति से उनकी कामना उत्पन्न होती है ; कामना में विघ्न पड़ने पर क्रोध उत्पन्न होता है ; क्रोध से मूढ़ भाव और फिर स्मृति का नाश फिर बुद्धि का नाश ; जिसके बाद वह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है उसका सर्वनाश हो जाता है ।
🎈🍎 परंतु निष्काम कर्म करने वाला स्थितिप्रज्ञ , अपने वश में की हुई राग द्वेष से रहित इन्द्रियो के द्वारा विषयो में विचरण करता हुआ भी ; #अंत:करण के #विमलता यानी #प्रसन्नता को प्राप्त होता है ।
🚫 जिस पुरुष की इंद्रियां ,इन्द्रियो के विषयों से सभी प्रकार से निग्रह की हुई है वही परमानन्द और परमपद को प्राप्त होता है
********************** अपनी बात ************
श्री रामचरित मानस में श्री राम जी भी विभीषण से कहते है -( सूंदर कांड 48 /49)
🚫 जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भुवन सुह्रद परिवारा ।।
सबके ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँधि बर डोरी ।।
समदरसी इच्छा कछु नाँही । हर्ष शोक भय नहिं मन मांही ।।
अस सज्जन मम उर बस कैसे । लोभी ह्रदय बसहि धनु जैसे ।।
🎆🍎 जो माता ,पिता ,भाई ,पुत्र ,शरीर ,भवन ,परिवार आदि में ममता त्यागकर प्रभु को समर्पित हो जाता है -सब में व सबसे समान प्रीति करने वाला ,जिसकी कामनाओं में आसक्ति नही है , शोक और भय से मुक्त है ; ऐसे (स्थितिप्रज्ञ ) व्यक्ति को प्रभु ऐसे अपने ह्रदय में बसा लेते है जैसे लोभी के ह्रदय में धन बसता है - वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है ।🍎🍊
अथ श्री महाभारत कथा
*** शेष अगली पोस्ट में **************राम नाथ गुप्त कन्नौज *
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