पोस्ट -( 1847 ) - श्री शिव महापुराण - पुष्प माला ~ 【 ४७ 】 - बरात की बिदाई के बाद शिव और सती का अपने धाम कैलाश पंहुचना तथा वहां सती का प्रश्न तथा उसके उत्तर में भगवान् शिव द्वारा ज्ञान एवं नवधा भक्ति के स्वरूप का विवेचन -- रुद्र संहिता ~ सती खण्ड ~ अध्याय 19 से 22 तक --
🍎 ब्रह्माजी कहते हैं— नारद! कन्यादान करने और भाँवरों के बाद दक्ष ने नाना प्रकार की वस्तुएं श्री शंकर जी को दहेज में दीं । फिर भगवान विष्णु ने शिवा और शिव की स्तुति की तथा शिव तत्व का सभी के सामने वर्णन किया । सभी वैवाहिक कार्य विधिवत समाप्त होने के बाद , श्री शंकर जी ने पुरोहित का कार्य निभा रहे मुझ ( ब्रम्हा ) से दक्षिणा के विषय मे पूछा । मैने दक्षिणा में जगत कल्याण के निमित्त परमेश्वर शिव से निवेदन किया ~~~
🚱 " महादेव ! आप इसी रूप में इसी वेदी पर सदा विराजमान रहें, जिससे आपके दर्शनों से मनुष्यों के पाप धुल जायें। चन्द्रशेखर ! आपका सानिध्य होने से मैं इस वेदी के समीप आश्रम बनाकर तपस्या करूँगा —यह मेरी अभिलाषा है। चैत्र के शुक्ल पक्ष को त्रयोदशी को पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में रविवार के दिन इस भूतल पर जो मनुष्य भक्तिभाव से आपका दर्शन करे, उसके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जायें , विपुल पुण्य की वृद्धि हो और समस्त रोगों का सर्वथा नाश हो जायें। जो नारी दुर्भागा, वन्ध्या, कानी अथवा रूपहीना हो, वह भी आपके दर्शनमात्र से ही अवश्य निर्दोष हो जाय। "
🚱 मेरी बात सुनकर शिव जी एवमस्तु कहते हुए उस बेदी के मध्य ही भगवती सती के साथ , अदृश्य रूप से , स्थित हो गए । तदुपरांत दक्ष ने शिव की विविध भांति स्तुति की और फिर दूल्हा और दुलहिन के साथ बारात बिदा हो गयी । बाद में शिव जी , हम सभी को बिदा करके वे भगवती सती के साथ अपने धाम को प्रस्थान कर गए ।
🚱 ब्रम्हा जी बोले -- कुछ समय बाद एक दिन आदि शक्ति महेश्वरी सती जी ने केवल जीवों के उद्धार के लिए उत्तम भक्ति भाव के साथ अत्यंत विनय पूर्वक भगवान महादेव से निवेदन किया --
🍎 " देवेश्वर हर! अब मैं उस परम तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहती हूँ, जो निरतिशय सुख प्रदान करनेवाला है तथा जिसके द्वारा जीव संसार-दुःख से अनायास ही उद्धार पा सकता है। नाथ! जिस कर्म का अनुष्ठान करके विषयी जीव भी परम पद को प्राप्त कर लें और संसार बन्धन में न बँधे, उसे आप बताकर, मुझपर कृपा कीजिये"
तब सती जी के उस प्रश्नको सुनकर स्वेच्छा से शरीर धारण करने वाले तथा योग के द्वारा भोग से विरक्त चित्त वाले परम पिता महादेव शिव ने अत्यन्त प्रसन्न होकर सती से इस प्रकार कहा --
🚱 " देवि! दक्षनन्दिनि! महेश्वरि! सुनो; मैं उसी परम तत्त्व का वर्णन करता हूँ, जिससे वासना बद्ध जीव तत्काल मुक्त हो सकता है। परमेश्वरि ! तुम विज्ञान को परम तत्त्व जानो। विज्ञान वह है, जिसके उदय होने पर ~~
~ ‘मैं ब्रह्म हूँ’ " ~ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाता है, ब्रह्म के सिवा दूसरी किसी वस्तु का स्मरण नहीं रहता तथा उस विज्ञानी पुरुष की बुद्धि सर्वथा शुद्ध हो जाती हैं। प्रिये ! वह विज्ञान दुर्लभ है। इस त्रिलोकी में उसका ज्ञाता कोई बिरला ही होता है। वह जो और जैसा भी है, सदा मेरा स्वरूप ही है, साक्षात परात्पर ब्रह्म है। उस विज्ञान की माता
है मेरी भक्ति, जो भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करने वाली है। वह मेरी कृपा से ही सुलभ होती है।"
🚱 भक्ति नौ प्रकारकी बतायी गयी है। सती! भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं है। भक्त और ज्ञानी दोनों को ही सदा सुख प्राप्त होता है। जो भक्ति का विरोधी है, उसे ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। देवि ! मैं सदा भक्त के अधीन रहता हूँ और भक्ति के प्रभाव से जाति - हीन, नीच मनुष्यों के घरों में भी चला जाता हूँ, इसमें संशय नहीं है । सती ! वह भक्ति दो प्रकार की है- सगुणा और निर्गुणा।
* भक्तौ ज्ञाने न भेदो हि तत्कर्तः सर्वदा सुखम् । विज्ञानं न भवत्येव सति भक्तिविरोधिनः॥
भक्ताधीनः सदाहं वै तत्प्रभावाद् गृहेष्वपि । नीचान जाति हीनानां यामि देवि न संशयः॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० अध्याय २३ श्लोक १६-१७ )
🍎 जो वैधी (शास्त्रविधिसे प्रेरित ) और स्वाभाविकी (हृदयके सहज अनुरागसे प्रेरित ) भक्ति होती है, वह श्रेष्ठ है। तथा इससे भिन्न जो कामना मूलक भक्ति होती है, वह निम्न कोटि की मानी गयी है।
पूर्वोक्त सगुणा और निर्गुणा-ये दोनों प्रकारकी भक्तियाँ नैष्ठिकी और अनैष्ठिकी के भेद से दो भेद वाली हो जाती हैं। प्रिये! मुनियोंने सगुणा और निर्गुणा दोनों भक्तियों के नौ अंग बताये हैं। दक्षनन्दिनि! मैं उन नवों अंगोंका वर्णन करता हूँ, तुम प्रेमसे सुनो। देवि! श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, दास्य, अर्चन, सदा मेरा वन्दन, सख्य और आत्मसमर्पण - ये विद्वानों ने भक्ति के नौ अंग माने हैं।
🍎 भक्ति के पूर्वोक्त नवों अंगों के पृथक-पृथक लक्षण सुनो; वे लक्षण भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। जो स्थिर आसन से बैठकर तन-मन आदिसे मेरी कथा-कीर्तन आदि का नित्य सम्मान करता हुआ प्रसन्नता- पूर्वक अपने श्रवण पुटों से उसके अमृतोपम रस का पान करता है, उसके इस साधन को ‘श्रवण’ कहते हैं।
☢ जो हृदयाकाश के द्वारा मेरे दिव्य जन्म-कर्मो का चिन्तन करता हुआ प्रेम से वाणी द्वारा उनका उच्चस्वर से उच्चारण करता है, उसके इस भजन- साधनको ‘कीर्तन’ कहते हैं।
☢ देवि! मुझ नित्य महेश्वरको सदा और सर्वत्र व्यापक जानकर जो संसार में निरन्तर निर्भय रहता है, उसी को " स्मरण "कहा गया है।
☢ अरुणोदय से लेकर हर समय सेव्य की अनुकूलता का ध्यान रखते हुए हृदय और इन्द्रियों से जो निरन्तर सेवा की जाती है, वही ‘सेवन’ नामक भक्ति है।
☢ अपने को प्रभु का किंकर समझ कर हृदयामृत के भोग से स्वामी का सदा प्रिय सम्पादन करना ‘दास्य’ कहा गया है।
☢ अपने धन-वैभव के अनुसार शास्त्रीय विधि से मुझ परमात्मा को सदा पाद्य आदि सोलह उपचारों का जो समर्पण करना है, उसे ‘अर्चन’ कहते हैं।
☢ मन से , ध्यान से और वाणी से वन्दनात्मक मन्त्रों के उच्चारण पूर्वक आठों अंगों से भूतल का स्पर्श करते हुए जो इष्टदेव को नमस्कार किया जाता है, उसे ‘वन्दन’ कहते हैं।
☢ ईश्वर मंगल या अमंगल जो कुछ भी करता है, वह सब मेरे मंगल के लिये ही है। ऐसा दृढ़ विश्वास रखना ‘सख्य’ भक्ति का लक्षण है।
☢ देह आदि जो कुछ भी अपनी कही जाने वाली वस्तु है, वह सब भगवान की प्रसन्नता के लिये उन्हीं को समर्पित करके अपने निर्वाह के लिये भी कुछ बचाकर न रखना अथवा निर्वाह की चिन्ता से भी रहित हो जाना ‘आत्मसमर्पण कहलाता है।
ये मेरी भक्ति के नौ अंग हैं , जो भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।
******************** क्रमशः ****************** राम नाथ गुप्त *******

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