श्री शिव महापुराण पुष्प माला 1882,भगवान शंकर का सर्व Enjoy और सर्व देवमय रथ


 पोस्ट -( 1882 ) - श्री शिव महापुराण - पुष्प माला - 【 ८२ 】 -  त्रिपुरारी भगवान शंकर का सर्व लोकमय  और सर्व देवमय  रथ पर चढ़कर युद्ध  में एक ही बाण से तीनों पुरों का विनाश  --

 रुद्र संहिता -- युद्ध खण्ड - अध्याय  9-10 ~

        🚱 तदनन्तर विश्वकर्मा ने रुद्र देव के लिये  बड़े यत्न से  सर्व  लोकमय सर्व देवमय ,  दिव्य रथ की रचना की। वह सर्वसम्मत तथा सर्व भूतमय रथ सुवर्णका बना हुआ था। उसके दाहिने चक्र में सूर्य और वाम चक्र में चन्द्रमा विराजमान थे। दाहिने चक्र में बारह अरे लगे हुए थे, जिनमें बारहों सूर्य प्रतिष्ठित थे और बायाँ पहिया सोलह अरों से युक्त था, जिनमें चन्द्रमा की सोलह कलाएँ विराजमान थीं। अश्विनी आदि सभी सत्ताईसों नक्षत्र भी उस वाम चक्र की ही शोभा बढ़ा रहे थे। छहों ऋतुएँ उन दोनों पहियों की नेमि बनीं । अन्तरिक्ष रथ का अग्र भाग हुआ और मन्दराचल ने रथ की बैठक का स्थान ग्रहण किया। उदयाचल और अस्ताचल-ये दोनों उस रथ के कूबर हुए। महामेरु अधिष्ठान हुआ और शाखा पर्वत उसके आश्रय स्थान हुए। 

         🌍  देवाधिदेव भगवान् ब्रह्मा लगाम पकड़ने वाले सारथी हुए और ब्रह्मदैवत ॐकार उन ब्रह्मदेव का चाबुक हुआ । अकार ने विशाल छत्र का रूप धारण किया। मन्दराचल पार्श्वभाग का दण्ड हुआ। शैलराज हिमालय धनुष और स्वयं नागराज शेष उसकी प्रत्यंचा बने। श्रुतिरूपिणी सरस्वती देवी उस धनुष की घण्टा हुई और महातेजस्वी विष्णु बाण तथा अग्नि उस बाण के नोक बने। मुने! चारों वेद उस रथमें जुतनेवाले चार घोड़े कहे गये हैं। 

         🌍 इसके बाद शेष बची हुई ज्योतियाँ उन अश्वों की आभूषण हुई। विष से उत्पन्न हुई वस्तुओं ने सेना का रूप धारण किया,   #संक्षेप_में_ब्रह्माण्ड_में_जो_कुछ_वस्तु_थी_वह_सब_उस_रथमें_विद्यमान_थी। इस प्रकार के महान् दिव्य रथ में, जो अनेक  विधि आश्चर्यों से युक्त था उसमें , वेदरूपी अश्वों को जोतकर ब्रह्मा ने उसे शिव को समर्पित कर दिया। तब महान् ऐश्वर्यशाली सर्व देवमय शम्भु  रथ - सामग्री  से युक्त उस दिव्य रथ पर आरूढ़ हुए। 

         🍊  तदनन्तर महेश द्वारा अधिष्ठित उस उत्तम रथ में बैठे हुए ब्रह्मा जी ने रथ में जुते हुए मन और वायु के समान वेगशाली वेदमय अश्वों को उन तपस्वी दानवों के आकाश स्थित तीनों पुरों को लक्ष्य करके आगे बढ़ाया।

तत्पश्चात् लोकों के कल्याणकर्ता भगवान् रुद्र के आदेश से बड़े-बड़े देवता तथा असुर भगवान् शंकर  के पशु   ( आज्ञा पालक ) बने और पशुत्व रूपी पाश से विमुक्त करनेवाले रुद्र पशुपति हुए। तभी से महेश्वर का ‘पशुपति’ यह नाम विश्व में विख्यात हो गया। यह नाम समस्त लोकों में कल्याण प्रदान करनेवाला है। उस समय सम्पूर्ण देवता तथा ऋषि हर्षमग्न होकर जय-जयकार करने लगे 

           🚱  तदनन्तर जो शिवा तथा सम्पूर्ण जगत के स्वामी और समस्त प्राणियों को सुख प्रदान करनेवाले हैं, वे महेश्वर यों सुसज्जित होकर त्रिपुर का संहार करनेके लिये प्रस्थित हुए। जिस समय देवाथिदेव महादेव त्रिपुर का विनाश करनेके लिये चले, उस अवसर पर देवराज आदि सभी प्रधान-प्रधान देवता भी उनके साथ प्रस्थित हुए। 

सभी दण्डी एवं जटाधारी मुनि हर्ष मनाने लगे और आकाशचारी सिद्ध तथा चारण पुष्पों  की वृष्टि करने लगे। विप्रेन्द्र! त्रिपुर की यात्रा करते समय जितने गण शिव जी के साथ थे, उनकी गणना करके कौन पार पा सकता है;

         🍎 फिर शिव जी ने रथ के शीर्ष-स्थान पर स्थित होकर  उस महान् अद्भुत धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ायी और उस पर उत्तम बाण का संधान करके वे रोषावेश से होठ को चाटने लगे। फिर धनुष की मूठ को दृढ़ता- पूर्वक पकड़कर और दृष्टि में दृष्टि मिलाकर वे वहाँ अचल भावसे खड़े हो गये परंतु  वे तीनों पुर त्रिशूल धारी शंकर का लक्ष्य नहीं बन सके। तब धनुष-बाणधारी मुंजकेश विरूपाक्ष शंकर ने परम शोभन आकाश- वाणी सुनी ~


     🍎🍊 ‘ऐश्वर्यशाली जगदीश्वर! जबतक आप विघ्न विनाशक  गणेश जी की अर्चना नहीं कर लेंगे, तबतक इन तीनों पुरोंका संहार नहीं कर सकेंगे। ”🌍🍘

           🎃  तब ऐसी बात सुनकर अन्धकासुर के निहन्ता भगवान् शिव ने भद्रकाली को बुलाकर गजानन का पूजन किया।  फिर तो भगवान् शंकर को उन तारक पुत्र महा मनस्वी दैत्यों के तीनों नगर यथोक्त रूपसे आकाश में स्थित दीख पड़े और वे तीनों पुर काल वश शीघ्र ही एकता  को प्राप्त हो गये। मुने ! उन त्रिपुरों के परस्पर मिलकर एक  लाइन में  हो जाने पर महान् आत्मबलसे सम्पन्न देवताओं को महान् हर्ष हुआ । 

         🌍 शंकर जी ने जिस समय अपने अद्भुत धनुष को खींचा था, उस समय अभिजित् मुहूर्त चल रहा था। उन्होंने धनुष की टंकार तथा दुस्सह सिंहनाद करके अपना नाम घोषित किया और उन महासुरों को ललकार कर करोड़ों सूर्योके समान प्रकाशमान उस भीषण बाण को उन पर छोड़ दिया। तब जिसके नोक पर अग्निदेव प्रतिष्ठित थे और जो विशेष रूप से पाप का विनाशक तथा विष्णुमय था; उस महान् जाज्वल्यमान शीघ्रगामी बाण ने उन त्रिपुर निवासी दैत्यों को दग्ध कर दिया । 

          🍎 उस बाण से  वे तीनों पुर भस्म हो गये और एक साथ ही समुद्रों रूपी मेखला वाली भूमि पर गिर पड़े। उन पुरों के बालक , युवा , वृद्ध , स्त्री पुरुष , पशु पक्षी - सभी जलकर भस्म हो गए ;    केवल  असुरों  का विश्वकर्मा अविनाशी " मय " ( मायासुर ) बच गया; क्योंकि वह देवों का अविरोधी, शम्भु के तेज से सुरक्षित और सद्भधक्त था। विपत्तिके अवसर पर भी वह महेश्वर का शरणागत बना रहता था। वह शिव की आज्ञा से पाताल  लोक ( वर्तमान अमेरिका ) चला गया ।

         🎆  जिन दैत्यों तथा अन्य प्राणियोंका भाव-अभाव अथवा कृत- अकृत के प्राप्त होने पर नाशकारक पतन नहीं होता, वे विनाशसे बचे रहते हैं । इसलिये सत्पुरुषोंको अत्यन्त सम्भावित- उत्तम कर्म के लिये ही प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि निन्दित कर्म करनेसे प्राणी का विनाश हो जाता है। अत: गर्हित कर्म का आचरण भूलकर भी न करे। उस समय भी जो दैत्य बन्धु-बान्धवोंसहित शिव जीकी पूजा में तत्पर थे, वे सब-के-सब शिवपूजाके प्रभाव से (दूसरे जन्ममें) गणों के अधिपति हो गये।

      ~  त्रिपुर दहन कथा की  आध्यात्मिक  व्याख्या  अगली पोस्ट   ( 1883 )  में ~   **********

********  क्रमशः ******* राम नाथ गुप्त  ************

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