महाभारत कथा - 459

                                    अथ श्री महाभारत कथा

 पोस्ट --( 459 )- अथ श्री महाभारत कथा -- समीक्षा ( ५९ ) --- कौरवो की राज सभा में शांति दूत बन कर गए भगवान् कृष्ण की गर्जना ( २ )    

         दुर्योधन को समझाने के लिए श्री कृष्ण के कहे वचनों का भीष्म पितामह - राजा ध्रतराष्ट्र- द्रोणाचार्य - विदुर जी आदि सबने समर्थन किया - 

    विदुर जी ने दुर्योधन से कहा - 

    मुझे तुम्हारे बूढ़े माता पिता ध्रतराष्ट्र व् गांधारी के लिए भारी शोक हो रहा है जो तुम जैसे दुष्ट सहायक के कारण ; तुम्हारे और तुम्हारे मित्रो संबंधियो मंत्रियो के मारे जाने पर कटे पंख वाले पक्षी की भाँति अनाथ होकर विचरेंगे और भिक्षुओ का जीवन बिताएंगे ।

     सभी की अप्रिय बाते सुनकर राजा दुर्योधन ने श्रीकृष्ण से कहा --

     🍎 "" केशव आपको अच्छी तरह सोच कर बोलना चाहिए - आप सब मेरे दोष देख रहे है मगर मुझे अपने में कोई दोष नही दीखता । हम उनके ( पांडवो ) भयानक कामो को देखकर या आप सब की भीषण बातो को सुनकर डरने वाले नही है ; पांडवो में हमारा सामना करने की शक्ति नही है । मेरे जीवित रहते मेरे राज्य का कोई हिस्सा कोई नहीं ले सकता । मै पांडवो को इतनी भूमि भी नही दे सकता जितनी एक बारीक सुई की नोक से छिद सकती हो ""🍎


     यह सुनकर श्री कृष्ण की आँखे लाल हो उठी -वे दुर्योधन से बोले -- 
     🎆 "" दुर्योधन अब बहुत बड़ा #नरसंहार होने वाला है -तेरी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी और तुझे साथियों मित्रो सहित रण भूमि में वीर शैय्या प्राप्त होगी - 
       तू कहता है तेरा कोई दोष नहीं है । जुएं का खेल सत्पुरुषों की भी बुद्धि का नाश करता है और अगर दुष्ट पुरुष उसमे प्रवत्त हो तो भारी कलह और भयंकर संकट आ जाता है । धर्म पर चलने वाले पांडवो को कपट से जुए में हराकर सब कुछ हड़प कर ; अपनी भाभी महारानी द्रोपदी की भरी सभा में बेइज्जती कर ; फिर वन जाते पांड्वो से दुष्टतापूर्ण तिरस्कार पूर्ण बाते कहकर और इससे पहले भी तुमने उन्हें लाक्षागृह में जलाने का प्रयास किया था और फिर भी मानते हो कोई गलती नही की ; तू हमेशा अधर्म और अपयश का काम करता है अब संधि कर ले ""
    फिर श्री कृष्ण सभी को संबोधित कर बोले -


     🎈"" #कुरुकुल के बड़े बूढ़े लोगो का यह बहुत बड़ा अन्याय है कि आप सब ने इस मूर्ख दुर्योधन को राजा के पद पर बैठा रक्खा है और अब इसका बलपूर्वक नियंत्रण भी नही कर रहे है 


      🍎जैसे अत्याचारी कंस का सभी भोज वंशी अन्धक और वृष्णि वंशी क्षत्रियो ने त्याग किया और मैंने उसे मार कर उसके पिता उग्रसेन को गद्दी पर बैठाया जिसके परिणाम स्वरुप हम लोग उन्नति के शिखर पर है -उसी प्रकार आप लोग दुर्योधन -कर्ण - सुबल पुत्र शकुनि और दु:शाशन को बन्दी बनाकर पांड्वो के हाथ में दे दे -तभी इस महायुद्ध से बचा जा सकता है -


    🎆🎈 समस्त कुल की भलाई के लिए एक पुरुष को - एक गाँव के हित के लिए एक कुल को , जनपद के भले के लिए एक गाँव को - और आत्म कल्याण के लिए समस्त भूमंडल को त्याग देना चाहिए -


      है राजन ( ध्रतराष्ट ) ! आप दुर्योधन को कैद करके पांड्वो से संधि कर ले - क्षत्रिय शिरोमणि ! ऐसा न हो कि आपके कारण समस्त क्षत्रियो का विनाश हो जाए ""


    🍊 श्री कृष्ण की बात सुनकर ध्रतराष्ट्र ने रानी गांधारी को बुलाया - गांधारी ने सभा में पुन: दुर्योधन को समझाया परन्तु अपनी माँ की बात भी न सुनकर दुर्योधन सभा से उठ कर चला गया और अपने मंत्रियो तथा मित्रो की सलाह से श्री कृष्ण को बंदी बनाने का षडयँत्र करने लगा ।
       तब विदुर ने ध्रतराष्ट्र को चेतावनी देते हुए कहा - "" श्री कृष्ण को बंदी बनाने का दु:साहस करके आपके बेटे जलती आग से खेल रहे है - अवश्य ही ये सब पतंगो की तरह जल मरेंगे ।""


        अथ श्री महाभारत कथा उद्योग पर्व 128 --श्लोक 1 से 50 तक     

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