महाभारत कथा - 457


 पोस्ट -( 457 ) - अथ श्री महाभारत कथा -- समीक्षा ( ५७ ) - भगवान श्री कृष्ण के वचनामृत - श्री कृष्ण का संजय के द्वारा ध्रतराष्ट्र को सन्देश तथा शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर जाने का निश्चय --

     🍎  राजा द्रुपद और भगवाबनवास और अज्ञातवास की अवधि समाप्त होने के बादन् श्री कृष्ण की सम्मति से द्रुपद के #पुरोहित को दूत बनाकर ध्रतराष्ट्र के पास भेजकर उनसे शांतिपूर्वक पांड्वो का राज्य वापस कर देने की बात कहलायी गयी परन्तु ध्रतराष्ट्र ने जबाब में अपने दूत संजय से कहलाया कि -

       राज्य करने व युद्ध करने में बहुत बुराइयां है -धर्मात्मा पांडव अभी जहाँ व जिस हाल में है वैसे ही रहें उन्होंने पान्डवों को राज्य वापस देने से इनकार कर दिया तब भगवान् श्री कृष्ण ने ध्रतराष्ट्र व् दुर्योधन को संजय के द्वारा सन्देश भिजवाया---

      " हे संजय -राजा धृतराष्ट्र को जाकर हमारा सन्देश सुनाइए ~~~

    युधिष्ठिर और हम शान्ति चाहते है -हम शर्त के अनुसार अब धर्म पूर्वक अपने राज्य की वापसी चाहते है -पांडव #धर्म रक्षा व #कर्तव्यपालन में #म्रत्यु से भी नहीं डरते है - दुर्योधन ने जिन राजाओ को अपनी और से युद्ध करने के लिये बुलाया है- वे #मूर्ख राजा अपने, बल के मद से मोहित होकर ,#मौत के फंदे में फंस गए है। पांडव ध्रतराष्ट्र की सेवा करने को भी तैयार है और युद्ध करने को भी। 

     श्री कृष्ण ने संजय से कहा जब सभा में भीष्म -द्रोण आदि सभी मौजूद हो तब यह मेरा सन्देश भी सुना देना

    कौरवो अब नाना प्रकार के यज्ञो का अनुष्ठान प्रारम्भ करो । पुत्रों और स्त्रियों से मिल जुल कर आनंद भोग लो और जो करना चाहो तुरंत कर लो -क्योकि तुम्हारे ऊपर बहुत बडा #भय आ पंहुचा है - क्योकि राजा युधिष्ठिर अब तुम लोगो पर विजय पाने को उतावले हो रहे है। 

      🍎 जिस समय कौरव सभा में द्रोपदी का वस्त्र खींचा जा रहा था -उस समय कृष्णा ( द्रोपदी ) ने आर्त भाव से ~"गोविन्द रक्षा करो " " गोविन्द रक्षा करो "  कह कर जो मुझे पुकारा था - उसका मेरे ऊपर बहुत बड़ा ऋण है -और समय के साथ ही , यह ऋण बढ़ता ही जा रहा है - अपराधी कौरवो का संहार किये बिना -उसका भार मेरे ह्रदय से दूर नही हो सकता । 

       जिसके पास अजेय तेजस्वी गांडीव नामक धनुष है -और जिसका मित्र या सहायक दूसरा मैं( कृष्ण ) हूँ -उस सव्यसाची अर्जुन का दुनिया में तो क्या , देवता असुर और मानव कोई भी सामना नहीं कर सकते हैं । 🍎

    🌋-----जिसका मैं सहायक हूँ उस अर्जुन को कोई नही जीत सकता ""-🍎

        ध्रतराष्ट्र के दूत संजय के वापस जाने के बाद अवश्यम्भावी हुए महायुद्ध को रोकने के अंतिम प्रयास के लिए युधिष्ठिर आदि पांडव और राजा द्रुपद सभी भगवान् कृष्ण के पास गए और उनसे शान्ति दूत बन कर हस्तिनापुर जाने की प्रार्थना की- भगवान कृष्ण बोले - 

    राजन मैं दोनों पक्षो के हित के लिए कौरवो की सभा में जाउंगा -अगर मैं दोनों पक्षो में संधि करा सका तो समझूंगा -मेरे द्वारा यह महान फलदायक और बहुत बडा पुण्यकर्म संपन्न हो गया - ऐसा होने पर मैं सारी प्रथ्वी को मानो मौत के फंदे से छुड़ा लूंगा -

     यद्दपि पापाचारी दुर्योधन संधि की बातो को मान लेगा इसमें संदेह है परन्तु संधि का प्रयत्न कर हमलोग सम्पूर्ण जगत के राजाओं की द्दष्टि में निंदा के पात्र नहीं होंगे । 

      🌋 दुर्योधन द्वारा मेरे संभावित तिरस्कार की बात सोच कर आप चिंतित न हो - क्योकि अगर मैं क्रोध करूँ तो संसार के सारे भूपाल मिलकर भी मेरे सामने युद्ध में खड़े नही हो सकते -यदि उन्होंने मेरे साथ कुछ भी अनुचित किया तो मैं उन समस्त कौरवो को जलाकर भस्म कर डालूँगा 

      मैं सभा में दुर्योधन के सभी दोषों को खोल दूंगा जिससे सभी लोग उसकी नीचता को समझ जायेंगे और उनके मन बदल जायेंगे ।"

     🎃 तभी द्रोपदी श्री कृष्ण के पास आयी और अपने #अपमान की बात याद दिलाते हुए अपने खुले केशो को दिखाया ( अपने बालो को दुशाशन के रक्त से धोने के बाद ही उसने बाँधने की प्रतिज्ञा की थी ) श्री कृष्ण ने उसे आश्वासन दिया -

       यदि काल के गाल में जाने वाले ध्रतराष्ट्र पुत्र मेरी बात नहीं सुनेगे तो मारे जाकर धरती पर लोटेंगे और कुत्तो और सियारो के भोजन बनेंगे ।

    

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