पोस्ट ( 456 ) अथ श्री महाभारत कथा -समीक्षा -( ५६ ) - भगवान श्री कृष्ण से दुर्योधन और अर्जुन दोनों का युद्ध मे सहायता मांगना
*********** अपनी बात ************
हमारे एक परम स्नेही मित्र ने कमेंट करते हुए लिखा है
अतीत पर की गई टिप्पणियों से अतीत तो नही सुधरता पर वर्तमान के मन मे अतीत के प्रति घृणा अवश्य उत्पन्न हो सकती है । वर्तमान के समक्ष अतीत नहीं है , उसे आज के परिपेक्ष में लिखते रहने से कोई लाभ नहीं मिलता****
हमारा नम्र निवेदन है की हमारा रामायण महाभारत कालीन अतीत- आज से हजारो गुना ज्यादा गौरवशाली था - अतीत के अवलोकन से ही हमे अपने जीवन की गलतियों को सुधारने और श्री राम के जीवन से मर्यादानुसार जीने और और श्री कृष्ण के उपदेशो से मन से आसक्ति दायक भ्रमो को दूर कर , प्रभु पर विश्वास करने और कर्म योग करने की शिक्षा मिलती है ।
🌋 अहिंसा पर असीमित आसक्ति- दुश्मनों को बार बार जीवनदान देना - , क्षमा करने की सीमाओं की अनदेखी करना और हर व्यक्ति को हर हाल में शरण देकर अपने अस्तित्व पर संकट पैदा करने की दुर्भाग्यपूर्ण गलत नीतियों के कारण हम 1000 वर्ष गुलाम रहे व अभी भी गुलामी की मानसिकता में जी रहे है -
मैं इन्ही कारणों से अतीत के इतिहास पर नव दृष्टि से अवलोकन प्रस्तुत कर रहा हूँ--पुरानी नींव नया निर्माण
********** ***** कथा उद्योग पर्व *********
🍎 पांडव भावी युद्ध के लिए मित्रों व शक्तियों को एकत्र करने के उद्द्योग में लग गए - विराटनगर से चलकर श्री कृष्ण द्वारका पंहुचे -इसकी जानकारी मिलते ही दुर्योधन और अर्जुन दोनो , उनसे युद्ध मे सहायता मांगने द्वारका गए । उस समय श्री कृष्ण विश्राम कर रहे थे उस कक्ष में पहले दुर्योधन पंहुचा और अपने अभिमान व शान के अनुरूप भगवान श्री कृष्ण के #सिरहाने एक आसन पर बैठ गया । उसके तुरंत बाद अर्जुन भी वहां पंहुचे और श्री कृष्ण के बहनोई और सखा होने के बाद भी , अपने नम्रता पूर्ण आचरण के अनुकूल ,श्री कृष्ण के चरणों के पास खड़े हो गए ।
जागने पर स्वाभाविक रूप में श्री कृष्ण ने पहले अर्जुन को देखा परंतु दोनों का यथावत सत्कार किया -दुर्योधन बोला - " मधुसूदन मैं पहले आया हूं इसलिए युद्ध मे आप मेरी सहायता कीजिये "
-श्री कृष्ण बोले - " सच है आप पहले आये है परंतु मैने पहले अर्जुन को देखा है ,इसलिए मैं आप दोनों की सहायता करूंगा "
शास्त्र की आज्ञा है पहले बालकों ( छोटों ) को ही उनकी अभीष्ट वस्तु देनी चाहिए । अर्जुन को मैने पहले देखा , और वे आपसे उम्र में छोटे है ,इस लिए उन्हें पहले मनपसंद वस्तु को चुनने का हक है --
एक ओर मेरे पास बहुत बड़ी बलिष्ठ शरीर वाले 10 करोड़ गोपो की नारायणी सेना है और दूसरी ओर से मैं अकेला रहूंगा , मैं न तो युद्ध करूंगा और न ही सस्त्र धारण करूंगा -अर्जुन को पहले चुनने का हक है
🍎 कहने की जरूरत नही अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण को चुना इसलिए उन्ही की जीत हुई - दुर्योधन भगवान से प्रेम न करके उनकी शक्ति सेना को चाहते थे और वही उन्हें मिली -
अर्जुन से श्री कृष्ण ने सेना की बजाय उनको चुनने का कारण पूंछा तो अर्जुन ने नम्र शब्दो मे निवेदन किया कि वे भगवान को अपने रथ का सारथी बनाना चाहते है इसलिए उन्होंने उन्हें चुना --
🍎 कथा की व्याख्या **अपनी बात
1- नारायण रहित उनकी नारायणी सेना बिल्कुल वैसे ही है ,जैसी आत्मा रहित शरीर ।
2 - जहां श्री हरि है वही विजय है ।
3- चाहे युद्ध हो या जीवन जीने का संग्राम - जिसने वासनाओ की बजाय अपना सारथी श्री
कृष्ण को बना लिया ,उसी की जीत होती है ।
4- भगवान भले ही कहे कि वे अस्त्र नही उठाएंगे ,परंतु जब भक्त की आन बान और शान पर संकट आता है ,भगवान सभी प्रतिज्ञाओं को दरकिनार करके भक्त की हर तरीके से रक्षा करते है -श्री कृष्ण ने भी अर्जुन की रक्षा करने के लिए क्रोधित होकर अपनी प्रतिज्ञा भूल करके भीष्म को मारने के लिए रथ का पहिया उठा लिया था ।
5- प्रभु उसी के साथ जाते है जो विनम्र होकर उनके चरणों की शरण लेता है
🍎 आखिर नारायणी सेना कैसी थी -आध्यात्मिक व्याख्या --
महाभारत के युद्ध के वर्णन में नारायणी सेना से युद्ध का कोई विशेष उल्लेख नही मिलता है । क्या यह #मात्र #छलावा सरीखी थी ? --इस विषय में मेरी कोई जानकारी नही है , परंतु आध्यात्मिक व्याख्या निम्न प्रकार हो सकती है -
🌋 हम सब मानव - पूजा अर्चना भगवान को पाने के लिए न करके , उनसे ,सुख , सम्रद्धि , वैभव की #नारायणी सेना को पाने के लिए करते है -प्रभु मांगने पर इनकार नही करते , हमारे मन माफिक भौतिक सुखों रूपी * नारायणी सेना * हमे प्रदान करते है परंतु नारायण रहित ये नारायणी सेना , महाभारत युद्ध की तरह , माया की तरह छलावा करके #जरूरत के समय #अदृश्य हो जाती है--जिसने अपना जीवन का सारथी प्रभु श्री कृष्ण को बनाने से ही जीवन मे हर् छेत्र में विजय सुनिश्चित होती है ।

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