पोस्ट -( 455 )-- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( 55 )- पांडवो द्वारा अपना राज्य वापस पाने के लिए उद्योग प्रारम्भ --
जिस समय पांडव वनवास में थे ,कौरवों ने विश्व विजय द्वारा ,राजाओ को शक्ति व धन के बल पर अपने साथ करने ,पांडवो के अपार धन से हथियारों के संग्रह करने का पूरी ताकत से प्रयास किया --
वन में द्रोपदी का हरण करने का असफल प्रयास करने वाले ,और युधिष्ठिर की दया पर छूटे , दुर्योधन के बहनोई - #जयद्रथ - ने कठोर तपस्या करके तमाम #वरदानों और अस्त्र सश्त्रो को प्राप्त किया ,यही नही , जयद्रथ के वन में तपस्या कर रहे पिता ने उसकी रक्षा के लिए वर पाया कि जो भी #जयद्रथ का #सिर #भूमि पर गिरायेगा उसका #मस्तक तुरंत #विस्फोटित हो जाएगा -इस कारण दुराचारी जयद्रथ अपने को दुर्जय मानने लगा था -
🍎 इस दौरान महाबली कर्ण ने विश्व के देशों को जीतने के लिए विजय यात्राऐं की और अनेकानेक राजाओ के मुकुट छीनकर -दुर्योधन के पिता राजा ध्रतराष्ट्र के कदमो में लाकर डाल दिये ,उन्हें उनके आधीन कर दिया---दूसरी तरफ 13 वर्ष तक वनवास और अज्ञातवास में रहने के कारण पांडव पक्ष काफी कमजोर हो गया था ।
🍎 विराटनगर में अभिमन्यु और राजकुमारी उत्तरा के विवाह में दोनों पक्षों के सभी रिश्तेदार व राजा लोग उपस्थित हुए थे --विवाह के बाद भगवान कृष्ण के कहने पर सभी विराट की राज सभा मे उपस्थित हुए --
द्रोपदी के पिता द्रुपद और राजा विराट आयु में वरिष्ठ होने के कारण मुख्य आसन पर और सभी पांचो पांडव अपने पांचो पुत्रो ,भगवान कृष्ण ,बलराम जी ,वासुदेव जी , शनि वंश के श्रेष्ठ सात्यकी ,राजा द्रुपद और विराट के पुत्र ,अभिमन्यू , व अन्य राजा स्वर्णिम सिंहासनों पर विराजित हुए
तब सभा मे सभी को संबोधित करते हुए भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों की संपूर्ण कहानी ,वनवास के समय उनके द्वारा भुगते गए अपार कष्टो को बताते हुए कहा कि ~
" पांडव सदा सत्य के रथ पर आरूढ़ रहते है ,कौरवों को जीतने की शक्ति होने के बाबजूद इन्होंने #प्रतिज्ञानुसार अपार #कष्ट भोगा है -अब इन्हें अपना राज्य व धन जिस पर दुर्योधन ने #छल से #कब्जा कर रक्खा है ,वापस मिलना ही चाहिए । ऐसी स्थिति में जिस भी उपाय से धर्मपुत्र युधिष्ठिर और राजा दुर्योधन का हित हो उनके बारे आप लोग विचार करके प्रयास करें "--
🎈" धर्मराज युधिष्ठिर यदि धर्म के विरुद्ध देवताओ का भी राज्य प्राप्त होता हो तब भी नही लेंगे परंतु धर्मयुक्त अगर किसी छोटे से गाँव का भी राज्य मिले तो स्वीकार करेंगे ।
🍎 " जैसी सम्भावना है दुर्योधन शांति से राज्य वापस नही करेगा तब क्रोधी पांडव सभी कौरवों को निश्चित रूप से मार डालेंगे -इन्हें कोई कमजोर न समझे "
🎄🍎 फिर श्री बलराम जी ने किसी हालत में युद्ध न करने तथा समस्या को शांति से सुलझाने की बात कही ।
" जब कोई दुर्बुद्धि बेईमान बिना युद्ध कुछ भी मानने को तैयार न हो तब उससे श्री बलराम जी के कहे अनुसार युद्ध न करके ; केवल न्याय शांति की बात करना बिल्कुल निरर्थक होती है "
सन विनय ,कुटिल सन प्रीती । सहज कृपन सन सुंदर नीती ॥शठ
ममता रत सन ज्ञान कहानी । अति लोभी सन बिरति बखानी ॥
क्रोधिहि सन कामिहि हरि कथा । ऊसर बीज बये फल जथा ॥
श्री बलराम की बातों का सात्यकी ने अत्यंत उत्तेजित होकर विरोध किया और दुर्योधन के पान्डवों को राज्य वापिस करने से इनकार करने पर बलपूर्वक कौरवों को मार डालने की बात कही ।
🍎 सभी ने श्री कृष्ण और सात्यकी की बात का समर्थन किया । फिर श्री कृष्ण ने राजा द्रुपद से कहा कि वे अपने मित्र रहे ध्रतराष्ट्र और भीष्मपितामह के पास उचित प्रकार से संदेश भेजे और अगर दुर्बुद्धि दुर्योधन समझौता करने को तैयार न हो तब सभी मित्र राजाओ को युद्ध मे सहायता के लिए निमंत्रण भेजे और हम सब तब युधीष्ठिर की सहायता करने को फिर उपस्थित होंगें ।
फिर तब गांडीव धारी अर्जुन के कुपित होने पर मंदबुद्धि मूढ़ दुर्योधन अपने मंत्रियो और बंधुजनों , मित्रो के साथ सर्वथा नष्ट हो जाएगा -फिर अभिमन्यु के विवाह में आये हुए सभी राजा वापस अपने अपने राज्यो को चले गए

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