पोस्ट -( 454 )-- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( ५४ ) -- द्रोपदी की सजगता से महा अनर्थ होने से बचा
🎈 दूसरो से की गई प्रतिज्ञाये तथा -स्वयं अपने आप से की गयी प्रतिज्ञाओ का पांडवो का खुद का बनाया चक्रव्यूह --कितनी #समस्याओं का जनक हुआ --🎈
🌋 एक तरफ पड़ोसी राजा सुशर्मा पर भीमसेन की मदद से विजय प्राप्त करके राजा विराट वापस अपने नगर में आये और दूसरी ओर दुर्योधन ,कर्ण ,द्रोणाचार्य ,कृपाचार्य अश्वत्थामा , भीष्म पितामह जैसे महारथियो और अतिरथियो से अर्जुन की मदद से युद्ध मे अविश्वसनीय रूप से विजय प्राप्त करके राजकुमार उत्तर ने विराटनगर में प्रवेश किया -
सारे शहर को दुल्हन की तरह सजाया गया था -और सभी का शानदार स्वागत नगर वासियो ने किया -#दीपावली जैसा पर्व का अवसर था -अभी तक बृहन्नला के अर्जुन होने की बात केवल राजकुमार उत्तर को ज्ञात थी ,इस लिए सभी इस विजय का श्रेय राजकुमार उत्तर को ही दे रहे थे ।
🎈 बृहन्नला ( अर्जुन ) ने कौरवों के अंग वस्त्र ,अपने वायदे के अनुसार , लाकर राजकुमारी उत्तरा को दिए- जय जयकार के बीच राजकुमार उत्तर ने राजसभा में प्रवेश किया -
🍎🍊 जब राजा विराट कौरवों पर शानदार जीत के लिए अपने पुत्र --उत्तर-की प्रशंशा के पुल बांध रहे थे -उस समय वास्तविकता जानने वाले कंक ( युधिष्ठिर ) के मुख से निकल गया ---
राजकुमार इस लिए विजयी हुए क्योकि बृहन्नला ( अर्जुन ) उनकी सारथी व सहयोगी थी
🍎 अपने पुत्र उत्तर की विजय का श्रेय एक नपुंसक नाच गाना सिखाने वाली बृहन्नला को देना ; राजा विराट को बर्दाश्त नही हुआ ; क्रोध में उन्होंने बहुत जोर से तमाचा - अपना मनोरंजन कराने वाले कंक ( युधिष्ठिर ) के मुख पर मार दिया -
युधिष्ठिर की नाक से खून बहता देखकर , वहां उपस्थित सैरंध्री (द्रोपदी ) भाग कर एक कटोरी ले आयी और उनके नाक से निकले खून को उसमे ले लिया , उनका मुख्य साफ किया और किसी को इसका पता नही लगने दिया ।
🎈 द्रोपदी की सावधानी से बहुत ही बड़ा अनर्थ होते बच गया --कारण जान कर आप भी आश्चर्य करेंगे -- द्रोपदी को अर्जुन की स्वयम अपने आप से की गयी प्रतिज्ञा ज्ञात थी --
🍎🌋 जो भी उनके बड़े भाई युधिष्ठिर के खून की बून्द भी जमीन पर गिराने का उत्तरदायी होगा उसका वे तुरन्त वध कर देंगे 🌋 🍎
और अर्जुन सत्यप्रतिज्ञ थे - वे बिना परिणाम की बात सोचे तुरन्त प्रतिज्ञाओं का पालन करते थे .--अगर अर्जुन ने युधिष्ठिर की नाक से निकले रक्त को देख लिया होता तो निश्चित रूप से महान अनर्थ हो जाता - अर्जुन अपने शरणदाता राजा विराट जिनके लिए अभी युद्ध जीता था -उनका बिना सोचे समझे निश्चित रूप से वध कर देते ।
🌋🎈भगवान कृष्ण ने कहा था - धर्म और अधर्म के बीच बहुत सूक्ष्म रेखा है -प्रतिज्ञाओं और वचनों का पालन #धर्मानुसार ही करना चाहिए - प्राणी के जीवन की रक्षा ,तथा समाज और राष्ट्र का हित ही सर्वोच्च है और इनके अनुरूप प्रतिज्ञाओं का पालन ही धर्म है । हमेशा बिना सोचे समझे प्रतिज्ञाएं करना और बिना परिणाम पर विचार करे , उनका पालन करने का प्रयास करना, पांडवो की महानतम भूल होती थी थी -इसीलिए प्रतिज्ञाओं के अपने द्वारा बनाये चक्रव्यूह में वे बार बार फंसे ।
अब पांडवो के अज्ञातवास का समय समाप्त हो चुका था । इसलिए अगले दिन सभी पांचो पांडव और द्रोपदी , राजसी वस्त्र धारण करके राजा विराट की राजसभा में पंहुचे और वहां आसनों पर विराजमान हो गए - जब रोजाना की तरह राजा विराट सभा मे आये और कंक ,बृहन्नला ,रसोइया वल्लभ और सेविका सैरन्ध्री आदि को आसनों पर विराजमान देखा तब क्रोध से चिल्लाते हुए राजा विराट ने उनसे वहां बैठने की हिम्मत करने का कारण पूंछा -
🌋 राजकुमार उत्तर ने अपने पिता को पांडवों का परिचय दिया तथा अर्जुन ने राजा से अपने अर्जुन होने तथा युधिष्ठिर आदि का परिचय दिया और अज्ञातवास के दिन उनके यहां गुप्त रूप से बिताने के बारे में बताया । जब युधिष्ठिर ने राजा विराट का आभार व्यक्त करना चाहा तब विराट युधिष्ठिर के पैरों पर गिर कर उनके साथ नौकरों सा बर्ताव करने के लिए माफी मांगने लगे ।
13 वर्ष पूर्व विश्व के सर्वोच्च शाशक रहे युधिष्ठिर और महारानी द्रोपदी ; जिनके दर्शन पाने के लिए विराट जैसे राजाओ को समय लेना पड़ता था ; राजा लोग उनके दर्शन पाना और उनसे आशीर्वाद पाना अपना सौभाग्य मानते थे , वे उनके यहां सेवक बन कर रहे , यह सोच सोच कर राजा विराट बहुत ही शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे
शिष्या पुत्री के समान होती है -उसके बारे में अन्यथा विचार करना भी अपराध है
🍘 अपराध बोध से ग्रसित राजा विराट ने पांडवो से संबंधों को पारिवारिक रूप देने के लिए ; अभी तक अर्जुन की शिष्या के रूप में रही *राजकुमारी उत्तरा * का अर्जुन से विवाह करने का प्रस्ताव युधिष्ठिर के सम्मुख रक्खा ; इस प्रस्ताव को सुनते ही जितेंद्रिय अर्जुन बोले कि उन्होंने अपनी शिष्या को पुत्री के रूप में देखा है उससे विवाह करने की बात वे सोच भी नही सकते । तब युधिष्ठिर की सम्मति से उत्तरा का विवाह , अर्जुन के पुत्र , भगवान श्री कृष्ण के भांजे -अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से करने का सभी ने निश्चय किया ।
🌰 फिर द्वारिका से भगवान श्री कृष्ण के साथ यदुकुल की बारात आयी और बहुत ही भव्य रूप में अभिमन्यु और राजकुमारी उत्तरा का विवाह संपन्न हुआ ।

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