पोस्ट - ( 452 ) - अथ श्री महाभारत कथा - ,समीक्षा ( ५२ ) - गुप्तवास के समय पान्डवों के निवास स्थान राजा विराट के मत्स्य देश पर एक तरफ सुशर्मा और दूसरी तरफ से कौरवों का आक्रमण -
मत्स्य देश के पड़ोसी त्रिगर्त देश का राजा सुशर्मा कई बार मत्स्यदेश पर आक्रमण कर चुका था परंतु सेनापति महाबली कीचक के कारण हर बार वह बुरी तरह परास्त हुआ था । उधर जिस तरह कीचक मारा गया था ,उससे दुर्योधन को भी मत्स्यदेश में भीम के होने पर संदेह हो गया था । तब दुर्योधन की योजनानुसार राजा सुशर्मा ने अपनी ओर से मत्स्यदेश पर आक्रमण करके लाखों गायों को जबरन पकड़ लिया । पता चलने पर राजा विराट अपनी विशाल सेना के साथ युद्ध करने के लिए जब जाने लगे तब कंक के रूप में रह रहे युधिष्ठिर के आग्रह पर राजा उन्हें तथा गुप्त रूप में रह रहे अन्य तीनो पांडब , भीमसेन ,नकुल और सहदेव को साथ में ले गए ।
दोनो सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ । परन्तु राजा सुशर्मा ने अचानक राजा विराट पर आक्रमण करके उनके रथ आदि को तोड़कर उन्हें जबरन पकड़ लिया और ले जाने लगा । तब युधिष्ठिर , वल्लभ के रूप में उपस्थित भीमसेन से बोले -
महाबाहो त्रिगर्तराज सुशर्मा ने मत्स्यराज को पकड़ लिया है। उन्हे शीघ्र छुड़ाओ ; जिससे वे शत्रुओं के वश में न पड़ जायँ। ‘हम सब लोग उनके यहाँ सुखपूर्वक रहे हैं और उन्होंने हमें सब प्रकार की अभीष्ट वस्तुएँ देकर हमारा भली-भाँति सतकार किया है। अतःभीमसेन! तुम्हें उनके घर में रहने के उपकार का बदला चुकाना चाहिये’।
भीमसेन बोले- महाराज! आपकी आज्ञा से मैं इन्हें सुशर्मा के हाथों से छुड़ा लूँगा। आज आप शत्रुओं के साथ युद्ध करते समय मेरे महान पराक्रम को देखें। यह सामने जो महान वृक्ष है, इसकी शाखाएँ बड़ी सुन्दर हैं। यह तो मानो गदा के ही रूप में खड़ा है। अतः मैं इसी को उखाड़कर इसके द्वारा शत्रुओं को मार भगाऊँगा।
तब धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने वीर भ्राता से कहा- ‘भीमसेन! ऐसा दुःसाहस न करो, यदि तुम इस महावृक्ष को उखाड़ने का अतिमानुष (मानवों के लिये असाध्य) कर्म करोगे, तो सब लोग पहचान लेंगे कि यह तो भीम हे। अतः तुम किसी दूसरे मानवोचित आयुध को ही ग्रहण करो। ‘धनुष, शक्ति, खड्ग अथवा कुठार, जो भी मनुष्योचित अस्त्र-शस्त्र तुम्हें ठीक लगे; जिससे तुम दूसरों द्वारा पहचाने न जा सको, वही लेकर राजा को शीघ्र छुड़ाओ । ये महाबली नकुल और सहदेव तुम्हारे रथ के पहियों की रक्षा करेंगे। तुम तीनों भाई युद्ध में एक साथ मिलकर महाराज विराट को छुड़ा लाओ।
युधिष्ठिर के उक्त आदेश देने पर महान वेगशाली महाबली भीमसेन ने शीघ्रता-पूर्वक एक उत्तम धनुष हाथ में ले लिया। फिर तो जैसे मेघ जल की धारा बरसाता हो, उसी प्रकार वे वेगपूर्वक बाणों की वर्षा करने लगे। तदनन्तर भीमसेन भयंकर कर्म करने वाले सुशर्मा की ओर दौड़े और विराट की ओर देखते हुए सुशर्मा से बोले- ‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह’। रथियों में श्रेष्ठ सुशर्मा पीछे की ओर से आते और ‘खड़ा रह, खड़ा रह’ कहते हुए काल, अन्तक एवं यमराज के समान भयंकर वीर पुरुष को देखकर चिन्ता में पड़ गया और सुशर्मा भाइयों सहित धनुष उठाये लौट पड़ा।
इधर भीमसेन ने निमेषमात्र में ही गदा लेकर शत्रुओं के भयंकर धनुष धारण करने वाले रथी, हाथी सवार और घुड़सवार वीरों के हजारों सैनिकों के समूहों को राजा विराट के समीप मार डाला और बहुत से पैदल सिपाहियों का भी संहार कर डाला। पाण्डवों को त्रिगर्तों की ओर रथ लौटाते देख मत्स्यवीरों की वह विशाल वाहिनी भी लौट पड़ी। विराट के पुत्र श्वेत अत्यत क्रोध में भरकर बड़ा अद्भुत युद्ध करने लगा । कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने एक हजार त्रिगर्तों को मार गिराया। भीमसेन ने सात हजार योद्धाओं को यमलोक का दर्शन कराया।। नकुल ने अपने बाणों से सात सौ सैनिकों को यमराज के घर भेज दिया तथा पुरुषों मे प्रतापी वीर सहदेव ने युधिष्ठिर की आज्ञा से तीन सौ शूरवीरों का संहार कर डाला।
तदनन्तर महारथी सहदेव त्रिगर्तों की उस महासेना का संहार करके अत्यंत उग्र रूप धारण किये हाथ में धनुष ले सुशर्मा पर चढ़ आये। तत्पश्चात् महारथी राजा युधिष्ठिर भी बड़ी उतावली के साथ सुशर्मा पर धावा बोलकर उसे बाणों द्वारा बारंबार बींधने लगे। राजन्! फिर तो शीघ्रता करने वाले कुन्तीपुत्र भीम ने सुशर्मा के पास पहुँचकर उत्तम बाणों से उसके घोड़ों को मार डाला। साथ ही उसके पृष्ठ रक्षकों को भी मारकर कुपित हो उसके सारथि को भी रथ से नीचे गिरा दिया।
सुशर्मा को रथ हीन हुआ देखकर राजा विराट के चक्ररक्षक सुप्रसिद्ध वीर मदिराक्ष भी वहाँ आ पहुँचे और त्रिगर्तनरेश पर बाणों से प्रहार करने लगे। इसी बीच में बलवान राजा विराट --- सुशर्मा के रथ से कूद पड़े और उसकी गदा लेकर उसी की ओर दौड़े। उस समय हाथ में गदा लिये राजा विराट बूढ़े होने पर भी तरुण के समान रणभूमि में विचर रहे थे। इसी बीच में मौका पाकर त्रिगर्तराज सुशर्मा भागने लगा
तब सुशर्मा के पास पहुँचकर भीम ने उसके केश पकड़ लिये और क्रोध पूर्वक उसे उठाकर पृथ्वी पर दे मारा। तत्पश्चात् उसे वहीं रगड़ने लगे। इससे सुशर्मा विलाप करने लगा। उस समय भीम ने उसके मस्तक पर लात मारी और उसके पेट को घुटनों से दबाकर ऐसा घूँसा मारा कि उसके भारी आघात से पीड़ित होकर राजा सुशर्मा मूर्च्छित हो गया। त्रिगर्तों का महारथी वीर सुशर्मा जब रथ हीन होकर कैद कर लिया गया, तब सारी त्रिगर्त सेना भय से व्याकुल हो तितर-बितर हो गयी। तदनन्तर पाण्डु के महारथी पुत्र -- सुशर्मा को परास्त करने के पश्चात् सब गौओं को लौटाकर और लूट का सारा धन वापस लेकर चले।
भीमसेन ने सुशर्मा को कैद करके युधिष्ठिर और राजा विराट के #कदमों में लाकर डाल दिया । तब क्षमामूर्ति ,धर्मराज युधिष्ठिर ने इतने मुश्किल से कैद किये गए राजा सुशर्मा को भीम से कहकर #रिहा करवा दिया और उसे अपने राज्य में जाने की अनुमति दे दी ।
************ अपनी बात **************
फिर वही समस्या है कि विजयी होने पर हमारे शाशक हमेशा दयावान और छमाशील क्यों हो जाते है ? यही सुशर्मा और उसकी त्रिगर्त सेना , महाभारत युद्ध मे बहुत बड़ा सिर दर्द बनी थी ।
राजा विराट ने दूत को नगर में भेजकर विजय का समाचार भेजा । नगर के लोग खुशियां मनाते इससे पहले ही ,राजा विराट और उनकी सेना की अनुपस्थित में , दूसरी ओर से दुर्योधन ने भीष्म पितामह ,द्रोणाचार्य ,कर्ण सहित राजा विराट के नगर पर आक्रमण करके हजारों गायों को जबरन पकड़कर युद्ध प्रारम्भ कर दिया ।

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