पोस्ट -( 451 )-- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा- ( ५१ ) - राजा विराट के साले और सेनापति कीचक द्वारा द्रोपदी का अपमान और कीचक का वध - दुर्योधन की साजिश - मत्स्य देश पर दोतरफा आक्रमण
* सैरन्ध्री* के नाम से अज्ञातवास के समय में मत्यस्य देश के राजा विराट की रानी सुदेषणा की दासी बनकर उसकी सेवा कर रही द्रोपदी से जब कीचक ने काम विवश होकर अनुचित बाते की तब द्रोपदी ने कीचक का विरोध करते हुए उसे चेताया कि 5 गंधर्व उसके पति है अगर उसने अनुचित प्रयास किया तो वे उसे निश्चित रूप से मार डालेंगे -फिर कीचक से बचने के लिए भागती हुई द्रोपदी जब मत्स्यराज के दरबार मे रक्षा की गुहार लगाती पंहुची तब दबंग कीचक ने भरी सभा मे उसे गिरा कर उसके जोर की लात मारी -
अपने सेनापति के विरुद्ध राजा कुछ नही बोल पाए । सभा मे वल्लभ के रूप में मौजूद भीमसेन ने जब कीचक का प्रतिकार करने के लिए उठना चाहा तब प्रतिज्ञावश कंक के रूप में वहां उपस्थित युधीष्ठिर ने उन्हें रोक दिया - महारानी सुदेषणा भी अपने भाई के विरुद्ध कुछ न कर पाई ।
कपटी और अत्याचारी व्यक्ति के साथ सत्य , अहिंसा और प्रतिज्ञा का पालन --अहिंसा और धर्म की अपने रूढ़िवादी अपरिवर्तनीय रूप में आंखों पर पट्टी बांधकर नारी (यहां तो अपनी महारानी पत्नी ) के साथ होते असहनीय अत्याचारों को अनदेखी करना ,उनका अपनी पूर्ण शक्ति से प्रतिरोध न करना - युधीष्ठिर के लिया कहां तक धर्मानुकूल कहा जा सकता है ?
उस दिन रात्रि में एकांत मिलने पर द्रोपदी ने अपने भयंकर अपमान से व्यथित होकर भीमसेन और अर्जुन को अपनी दुखद सेविका की हालत ,काम करते करते अपने हाथों में पड़े छालों को दिखाते हुए कहा कि धिक्कार है युधिष्ठिर पर - जो सत्य और अज्ञातवास की प्रतिज्ञा के बन्धन ऐसे बंधे है उसका बराबर घोर अपमान होते हुए भी सब कुछ शांति से देख रहे है -- अब वह इस अपमानजनक जिंदगी को नही जी पाएगी , अगर उसे जीवित देखना चाहते हो तो कीचक से तुरन्त बदला लीजिये - द्रोपदी के पीड़ा से व्यथित अर्जुन और भीमसेन ने कीचक को गुप्त रूप से मारने की योजना बनाई ।
योजनानुसार द्रोपदी ने कीचक से जाकर माफी मांगी और रात्रि में उसे कुछ दूरी पर स्थित बगीचे में स्थित संगीत व नृत्य मंडप में एकांत में मिलन के लिए बुलाया । वहां भीमसेन द्रोपदी के वस्त्र पहन कर बैठे -अत्यंत प्रसन्न कीचक ने जैसे ही द्रोपदी समझ कर उन्हें छुआ , भीमसेन ने कीचक को अपने गिरफ्त में ले लिया - किन्नर सैरंध्री के रूप में वहां मौजूद अर्जुन ने ढोल को जोरों से बराबर बजाना शुरू कर दिया जिससे दोनो के मल्लयुद्ध की आवाज बाहर न जा पाए ।
कीचक भी अत्यंत बली था काफी देर के मुकाबले के बाद आखिर भीमसेन ने दुरचारी कीचक को मार कर उसे द्रोपदी का अपराध करने की उचित सजा दे ही दी , बचाव में आये उसके भाई भी मारे गए , प्रातः काल जब कीचक और उसके भाइयो को मरा पाया गया तब सबने यही जाना कि द्रोपदी के अदृश्य 5 गंधर्व पतियों ने ही उसे सजा दी है ।
दुर्योधन कर्ण आदि का मत्स्यदेश पर आक्रमण
मत्स्यदेश के अत्यंत बलशाली सेनापति के रहस्यमय रूप में मारे जाने का समाचार जब दुर्योधन तक पंहुचा तब वह मत्स्यदेश में भीम के मौजूद होने की आशंका से बहुत चिंतित हुआ और उसने मत्स्यदेश पर हमला करने का निश्चय किया -राजा विराट से उसकी मैत्री सन्धि थी इसलिए उसने मत्स्यदेश के पड़ोसी देश के राजा सुशर्मा जो पहले कई बार सेनापति कीचक के हाथों परास्त हो चुके थे उनसे सुशर्मा से मत्स्यदेश पर हमला करने को कहा और फिर उसके बाद राजा विराट की सहायता करने का बहाना करके ,अपने सभी महारथी साथियो , कर्ण , भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य ,अश्वत्थामा आदि तथा विशाल सेना के साथ अपने देश से मत्स्यदेश की लगने वाली सीमा पर आ डटा ।
सेनापति कीचक के न होने से अति उत्साहित राजा सुशर्मा ने दुर्योधन की योजनानुसार विशाल सेना को साथ लेकर पूरी ताकत से मत्स्यदेश पर अपनी ओर से आक्रमण कर दिया । राजा विराट भी अपनी पूरी ताकत से सुशर्मा से युद्ध करने देश की सीमा पर पंहुचे । राजा को द्यूत क्रीड़ा से मनोरंजन कराने वाले कंक नामधारी युधीष्ठिर भी विशेष आग्रह करके विराट के साथ युद्ध मैदान में गए ।

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