महाभारत कथा - 450


 पोस्ट --( 450 )-- अथ श्री महाभारत कथा-- समीक्षा ( ५० ) --पांडवों का अज्ञातवास -रसोइया वल्लभ ( भीमसेन ) द्वारा जीमूतवाहन का वध -- सेनापति कीचक द्वारा द्रोपदी का अपमान -

      वनवास के समय एक बार महर्षि ब्रहदश्व जी पान्डवों के पास आये । युधिष्ठिर ने उन्हें अपने भयानक कष्टों को बताते हुए पूछा कि क्या इसके पहले किसी और राजा ने भी इतना कष्ट भोगा है ? मुनि बोले कि जुआं अत्यंत विनाशकारी और दुखदायक है । पहले चक्रवर्ती राजा नल ने अपने भाई के हाथों जुएँ में हारकर पान्डवों से भी कहीं अधिक अष्ट भोगा था । मुनि ने राजा नल और दमयंती की कथा उन्हें सुनाई ।

     फिर तीर्थ यात्रा में महर्षि लोमश जी ने महर्षि अगस्त्य और लोपामुद्रा की कथा सुनाई । दीप्तोपद नामक तीर्थ पर पंहुचकर , श्री परशुराम जी का जीवन चरित्र सुनाते हुए श्री लोमश जी ने बताया कि श्री सीता स्वयंवर में भगवान राम का अपमान करने के कारण तेजहीन होने के बाद अपने पितरों के आदेश पर श्री परशुराम जी ने दीप्तोपद नामक तीर्थ पर नदी में स्नान करके अपने तेज को पुनः वापस पाया था । श्री लोमश मुनि के आदेश पर युधिष्ठिर सहित सभी पान्डवों ने वहां स्नान करके अपने खोए तेज को पुनः प्राप्त किया ।

    जब वनवास के 12 वर्ष बीत गए थे और अब एक वर्ष के अज्ञातवास में रहने का समय आगया था । युधिष्ठिर आदि ने अपने साथ रह रहे सभी संतो मुनियो व विद्वानों से अब जाने की अनुमति मांगी । पांडवो के पुरोहित श्री धौम्य मुनि ने पांडवो को किसी राजा की सेवा में सेवक बन कर रहने का परामर्श दिया ।

   बड़ा विकट प्रश्न था एक वर्ष तक " महाबली पांडवों " और " द्रोपदी " का अज्ञात रहना ,जुएं की शर्त के अनुसार इस दौरान पहचान लिए जाने पर फिर दुबारा इसी प्रकार 12 वर्ष वनवास और अज्ञातवास में रहना होगा , कितनी विडंबना की बात थी । दुर्योधन ने तमाम जासूसों को लगा रक्खा था और पांडवो को शरण देने वाले को मृत्यु दण्ड देने का एलान कर दिया था ।

      पांडवो ने गुप्त विचारविमर्श करके इस दौरान महाबलशाली मित्र राजा - मत्स्य राज श्री " विराट " के यहां अति गुप्त रूप से रहना तय किया । फिर अर्जुन ने अपनी अस्त्र विद्या से धूल का ऐसा विशाल बबंडर तूफान पैदा किया कि दुर्योधन के जासूस भ्रम में पड़ गए और पांडव भेष बदल कर निकल गए ।

      अपनी योजनानुसार पांडवो ने राजा विराट के नगर के बाहर जंगल मे एक विशाल शमी के वृक्ष पर ऊंचाई पर अपने सभी धनुष बाण और आयुधों को बांध कर लटका दिया और उसके नीचे एक शव को भी लटका दिया जिसने आम जन वहां न पंहुचे ।

      फिर वेश बदल कर युधिष्ठिर राजा विराट की सभा मे पंहुचे और अपना नाम कंक बताते हुए राजा के मनोरंजन के लिए पांसे खेलने वाले की नौकरी उनसे पा ली । महाबलशाली विशाल शरीर वाले भीमसेन , राजा के प्रधान रसोइया वलभ्भ बन गए और नकुल ने राजा की घुड़साल में घोड़ो की देखभाल करने वाले की तथा सहदेव ने बैलों की देखभाल करने की वहां नौकरी पा ली ।

 श्राप जो वरदान बन गया --

         उर्वशी अप्सरा द्वारा अर्जुन को एक वर्ष के लिए नपुंसक होने का श्राप अब अर्जुन के छिपने के लिए वरदान बन गया -अर्जुन नपुंसक बृहन्नला बन कर राजा विराट की बेटियों को नृत्य गायन आदि सिखाने का काम करने लगे ।


      जो कभी विश्व की प्रथम महिला , महारानी थी उस यज्ञ से उत्पन्न, अत्यंत सुंदरी द्रोपदी ने रानी सुदेषणा की सेवा करने का काम दासी सैरन्ध्री के नाम से स्वीकार किया । सभी अत्यंत गुप्त रूप से वहां समय काटने लगे ।

        जब पांडवो को वहां रहते 3 माह हो गए तब मत्स्य देश मे ब्रम्ह महोत्सव का बहुत बड़ा आयोजन हुआ - उसमें बहुत से देशों से बहुत बलशाली पहलवान आये थे और जीमूतवाहन नाम के विशाल शरीर वाले पहलवान ने सभी को चैलेंज किया -जब उससे लड़ने को कोई भी तैयार नही हुआ तब राज्य की प्रतिष्ठा के लिए " वल्लभ " रसोइया यानी भीमसेन ने उससे मल्ल युद्ध किया व उसे मार डाला ।


    राजा विराट का सेनापति उनका साला , अत्यंत बलशाली  कीचक था , जिसके युद्ध कौशल के कारण अन्य राजाओ को मत्स्यदेश पर हमला करने की हिम्मत नही होती थी । जब अज्ञातवास का अंतिम समय था एक दिन कीचक की नजर , उसकी बहन महारानी की सेवा में लगी हुयी सैरंध्री यानि द्रोपदी पर पड़ गयी । काम विवश होकर कीचक ने रानी से द्रोपदी को अपने कमरे में भेजने को कहा और फिर रानी के भेजने पर जब पानी लेकर गयी द्रोपदी से कीचक ने जबरदस्ती करनी चाही और उसके न मानने पर जब पीड़ित द्रोपदी भागती हुई राजा से शिकायत करने दरबार मे गयी , तब पीछे आते हुए राजा से साले , सेनापति कीचक ने भरी सभा मे द्रोपदी को #लात मारी -- गुप्तवास में होने के कारण वहां उपस्थित युधिष्ठिर और पांडव कुछ भी नही बोल सके ।


           कितना सर्वनाश और भयंकर अपमान सहने वाला खेल जुआँ होता है - पांडवो ने तो दुख झेला ही , महारानी द्रोपदी को बार बार भयंकर अपमान सहना पड़ा --

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