पोस्ट --( 449 )-- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( ४९ ) - यक्ष युधिष्ठिर संवाद -
वनवास के समय मे एक बार पेड़ पर लटके , किसी वेदपाठी ब्राह्मण के जप माला व अन्य कपड़े में बंधे हुआ समान , एक हिरन के सींगों में फंस गया और उसको छुड़ाने के चक्कर मे उस हिरन का पीछा करते हुए सभी पांडव काफी दूर निकल गए । तब तीब्र प्यास लगने पर पानी लेने के लिए पांडव एक एक कर एक तालाब पर गए परन्तु वहाँ मौजूद एक यक्ष ने उनसे अपने प्रश्नों का उत्तर देने और फिर पानी लेने को कहा ।
अत्यधिक प्यास और शक्ति के घमंड में सहदेव ,नकुल , भीम और अर्जुन - चारो पांडवो ने यक्ष की उपेक्षा की और वे जल को पीते ही मर गए । आखिर में युधिष्ठिर गए और उन्होंने यक्ष की बात मानकर तमाम प्रश्नों के सही उत्तर दिए और यक्ष जो वास्तव में युधिष्ठिर के पिता धर्मराज थे और पांडवो के धैर्य व् ज्ञान की परीक्षा लेने आये थे युधिष्ठिर के उत्तरों से संतुष्ट हुए और फिर यक्ष की कृपा से सभी चारों पांडव जीवित हो गए कुछ प्रमुख प्रश्नों के उत्तर प्रस्तुत है ---
1- वेदों का स्वाध्याय ब्राम्हणों का बाण विद्या क्षत्रियो का देवत्व है ,तप सत्पुरुषो का धर्म है ,मरना मानुषी स्वभाव है और निंदा करना असत्पुरुषो का आचरण है ।
2- जो देवता, अतिथि , सेवक , माता पिता का पोषण नहीं करता वह जीवित होते हुए भी मृतक सामान है माता प्रथ्वी से भारी (बढकर) है ,पिता आकाश से भी उंचा है ,मन वायु से भी तेज चलने वाला है ,और चिंता तिनको से भी अधिक संख्या में बढकर है।
3- मछली सोने पर पलक नहीं झपकाती ( बन्द करती ) है , अग्नि समस्त प्राणियो का अतिथि है ,गाय का दूध अमृत है , अविनाशी हमारा नित्य धर्म ही सनातन धर्म है , और वायु से ही सारा जगत व्याप्त है, स्त्री घरवाले की मित्र है , वैद्य रोगी का और दान मरने वाले का मित्र है ।
4 - धर्म का मुख्य स्थान दक्षता है, यश का दान , स्वर्ग का सत्य और सुख का मुख्य स्थान शील (सदाचरण )है, पुत्र मनुष्य की आत्मा है ; स्त्री देवकृत मित्र है - ; दान परम आश्रय है ; -धनो में शास्त्र ज्ञान है ; लाभों में आरोग्य है और सुखो में संतोष उत्तम है।
5 - दया श्रेष्ठ धर्म है ,मन को वश में रखने से शोक नहीं होता सत्पुरुषों के साथ की गयी संधि स्थायी होती है और अभिमान को त्यागने से पुरुष प्रिय होता है- ; क्रोध को त्यागने से शोक नहीं होता ; काम को त्यागने से अर्थवान होते है और लोभ को त्यागने से व्यक्ति सुखी होता है।
6 - ब्राम्हण को धर्म के लिए (दान ) , नट और नर्तको को यश के लिए ( इनाम ) और सेवको को उनके भरण पोषण के लिए (वेतन ) और राजा को भय के कारण धन (कर) दिया जाता है ।
7- जगत अज्ञान से ढका हुआ है , लोभ के कारण मनुष्य मित्रो को त्याग देता है , आसक्ति के कारण मनुष्य स्वर्ग में नहीं जा पाता।
8 - अपने धर्म में रहना ही तप है- ; चित्त की शान्ति शम है , क्रोध दुर्जय शत्रु है , लोभ अनंत व्याधि है , समस्त प्राणियो का हित करने वाला साधू है , धर्म न करना आलस्य है , इन्द्रिय निग्रह धैर्य है , मानसिक मलो को छोडना स्नान है -
9 - धर्मज्ञ ही पंडित है , नास्तिक ही मूर्ख है - वासना काम है और ह्रदय का ताप मत्सर है , महान अज्ञान अहंकार है , अपने को विद्वान व् धर्मात्मा प्रसिद्द करना दंभ है ।
10 - तथा -धन होते हुए भी गरीब को सहायता करने से इनकार करने तथा वेद धरम शाश्त्र देवता तथा पित्र धर्म में मिथ्या बुद्धि रखने वाला नरक को प्राप्त होता है , सदाचार का पालन करने वाला अग्निहोत्र में तत्पर और जितेन्द्रिय ही ब्राम्हण कहा जाता है ।
11 - मधुर वचन बोलने वाला सबको प्रिय होता है ; सोच विचार कर काम करने वाला अधिकतर सफल होता है ,बहुत से मित्र बना लेने वाला सुखी होता है तथा धर्मनिष्ठ को सदगति मिलती है ।
जिस पुरुष पर ॠण नहीं है और अपने देशमे है वह गरीब होते हुए भी सुखी है
12 - रोज रोज प्राणी मर कर यमराज के यहाँ जा रहे है फिर भी मनुष्य सोचता है कि हमेशा ज़िंदा रहेगा और इस लिए उचित अनुचित सभी काम करता है इससे ज्यादा क्या आश्चर्य की बात होगी ।
13 - जिस मार्ग पर महापुरुष चलते है धर्म का वही सत्यमार्ग है
14 -- जगत में मोह रुपी कडाह में काल भगवान् समस्त प्राणियो को मास ( महीना ) और ऋतू रुपी कड़छी से उलट पलट कर सूर्य रुपी अग्नि और रात दिन रुपी ईंधन से रांध रहे है यही वार्ता (सत्य ) है ।
15 - जिस पुरुष के पुण्य कर्मो की कीर्ति (यश) की बाते जहाँ तक स्वर्ग व भूमि पर प्रसिद्ध हैं , वहीं तक उस व्यक्ति का अस्तित्व है ,जिसकी द्रष्टि में प्रिय अप्रिय -दुःख सुख -भूत भविष्यत -यह सभी समान है वही सबसे बड़ा धनी है ।
अपने सभी प्रश्नों के उत्तरों से और युधिष्ठिर की बातो से संतुष्ट होकर यक्ष ने किसी एक पांडव को जीवित करने की बात कही । युधिष्ठिर ने भीम और अर्जुन का जीवन न मांगकर , सौतेली माता के पुत्र नकुल का जीवन इस लिए माँगा कि दोनों माताओं कुन्ती और माद्री का एक एक पुत्र जीवित रह सके । युधिष्ठिर की न्यायप्रियता को देखकर यक्ष ने सभी चारो भीम अर्जुन नकुल और सहदेव को जीवित कर दिया ।

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