महाभारत कथा -448


 पोस्ट ( 448 ) - अथ श्री महाभारत कथा - ( ४८ ) - पान्डवों की सहायतार्थ आये चित्रसेन गन्धर्व द्वारा दुर्योधन ,कर्ण सहित सभी कौरवों को कैद करके उन्हें मृत्युदंड देने की तैयारी की , परन्तु युधिष्ठिर ने उन्हें छुड़वा दिया -----

      🚫 एक बार द्वैतवन में रह रहे पांडवों को नीचा दिखाने के लिए दुर्योधन के कहने पर शकुनि, कर्ण और दुशासन ने योजना बनाई। उन्होंने बहाना बनाकर राजा धृतराष्ट्र से घोषयात्रा करने की अनुमति ले ली ।

   फिर दुर्योधन कर्ण शकुनि और मंत्री व एवं सेना सहित वहां जाने के लिए चले । दुर्योधन के साथ हजारों स्त्रियां और उनके भाई सहित सैंकड़ों की संख्‍या में बोझा ढोने के लिए लोग चले। इस सब लश्कर के साथ दुर्योधन पड़ाव डालता हुआ सर्वगुणसम्पन्न, रमणीय, सजल और सघन प्रदेश में पहुंच गया। वह सभी लोगों के साथ द्वैतवन के उस सरोवर के निकट पहुंच गया जहां युधिष्ठिर आदि पांडव द्रोपदी के साथ कुटिया बनाकर रह रहे थे। पांडव उस समय " राजर्षि यज्ञ " कर रहे थे।


      🍎 दुर्योधन ने वहां शिविर लगाकर अपने सेवकों को एक क्रीड़ाभवन तैयार करने की आज्ञा दी । कौरवों के वहां जाने की गुप्त सूचना पाकर , पान्डवों के मित्र चित्रसेन गन्धर्व पहले से ही वहां पँहुच गए थे और उसी सरोवर के पास अपना शिविर लगाकर रह रहे थे । दुर्योधन आदि अपने शिविर में अपनी शान शौकत प्रदर्शित करते हुए पान्डवों की हंसी उड़ाने और उन्हें अपमानित करने वाले कार्य मे संलग्न रहते थे । एक दिन चित्रसेन गन्धर्व की पुत्री जो उस सरोवर पर स्नान करने आई थी उससे दुर्योधन ने गलत व्यवहार करने का प्रयास किया ।


     🚫 अपनी पुत्री से हुए गलत व्यवहार का पता लगने पर चित्रसेन गन्धर्व ने उचित मौका देखकर , दुर्योधन के शिविर पर आक्रमण कर दिया । अपनी मायावी युद्ध कला से चित्रसेन ने भयँकर युद्ध करके कौरवों को बुरी तरह हरा दिया तथा दुर्योधन ,उसके सभी भाइयों ,महारथी कर्ण , शकुनि ,आदि सभी को बंदी बना लिया तथा उन्हें मृत्यु दण्ड देने की आज्ञा दे दी ।


       🎈 किसी तरह भागकर करवों के एक सैनिक ने यह समाचार युधिष्ठिर को दिया । यह समाचार सुनकर भीम बहुत प्रसन्न हुए और वे बोले कि जो कार्य हम भी वनवास के बाद हाथी घोड़ों से लैस होकर युद्ध करते हुए करते वह गंधर्वों ने ही कर दिया है चलो अच्छा ही हुआ । 


     🚫 यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा कि यह समय कड़वे वचन कहने का नहीं है। कुटुम्बियों में मतभेद होते हैं लेकिन यदि कोई बाहर का व्यक्ति हमारे कुल के लोगों और स्त्रियों को पकड़कर ले जाए तो यह हमारे लिए धिक्कार की बात है। यह हमारे कुल का तिरस्कार है। आपस मे हम 5 और 100 भाई है परन्तु बाहर वालों के लिए 105 है । अत: शूरवीरों , हमारे ही लोग जब हमारी शरण में आकर दुर्योधन आदि को छुड़ाने की प्रार्थना कर रहे हैं तो हमें शरणागत की रक्षा करना चाहिए।


        🍎 युधिष्ठिर की बात से सभी भाई निराश हो गए । जब वे कौरवों की रक्षा के लिए जाने के लिए उत्सुक नही दिखे तब #युधिष्ठिर स्वयम् धनुष बाण लेकर जाने को तैयार हो गए । आखिर में मजबूरी में भीम और अर्जुन ने गन्धर्व राज चित्रसेन के पास जाकर सभी कौरवों को छोड़ने का युधिष्ठिर का आदेश उन्हें सुनाया और न मानने पर युद्ध करने की बात भी कही ।


         🍊🍎 चित्रसेन बोला अर्जुन ! मैं तुम्हारा सखा हूँ । फिर उसने कहा "वीर धनंजय, दुरात्मा दुर्योधन और पापी कर्ण का अभिप्रय मुझे मालूम हो गया था। वे लोग यह सोचकर ही वन में आए थे कि आप लोग यहां रहते हैं। वे तुम्हें दुर्दशा में देखकर और द्रौपदी की हंसी उड़ाने की इच्छा से सरोवर तट पर जल‍क्रीड़ा हेतु पड़ाव डाल रहे थे। किसी प्रकार का अनर्थ ना हो इसीलिए देवराज इंद्र अर्थात आपके पिता की आज्ञा से ही मैंने सरोवर पर जलक्रीड़ा की योजना बनाकर , दुर्योधन के छल को असफल कर दिया और दुर्योधन को उसके भाई सहित बंदी बना लिया।


      🍘 पांडवों ने जब यह सुना तो वे सन्न रह गए। तब भी अर्जुन ने कहा कि चित्रसेन यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो धर्मराज के आदेश से तुम हमारे भाई दुर्योधन आदि को छोड़ दो। चित्रसेन ने कहा कि अर्जुन यह पापी है। इसे छोड़ दिया तब भी यह आप सभी को बराबर दुःख देगा । इसने धर्मराज (युधिष्ठिर) और श्रीकृष्ण को धोखा दिया था। चित्रसेन कुछ देर रुकने के बाद बोले कि अच्छा चलो पहले हम युधिष्‍ठिर को इसके छल के बारे में बताते हैं। फिर वे जो निर्णय करें मुझे मंजूर है।


     🚫 चित्रसेन ने युधिष्ठिर से सब बातें कही और उन्होंने बताया कि किस तरह यह पापी दुर्योधन आपका अहित करने आया था। इस पर भी युधिष्ठिर ने चित्रसेन से दुर्योधन, दुशासन कर्ण और अन्य कौरवों सहित सभी स्त्रियों को छोड़ने का आदेश दिया। फिर दुर्योधन शकुनि कर्ण आदि कौरव को गंधर्व लोग युधिष्‍ठिर के पास लेकर आए और उन्होंने उन्हें युधिष्‍ठिर के सुपर्द कर दिया। युधिष्ठिर ने दुर्योधन, दुशासन और सभी राजमहिषियों का स्वागत किया। दुर्योधन ने भरे मन से युधिष्ठिर को प्रमाण किया और लज्जित होकर अपने नगर हस्तिनापुर की ओर चला गया।

*************** अपनी बात ************

      🚫🌏 विचार करने की बात है कि यदि युधिष्ठिर अहित करने आये , दुश्मन को भाई बन्धु बताकर उन्हें नही छुड़ाते तो चित्रसेन गन्धर्व , दुर्योधन कर्ण आदि कौरवों को बंदीगृह में ही मार देते। इससे पांडवों के बीच का सबसे बड़ा कांटा निकल जाता। तब भविष्‍य में किसी भी प्रकार का महायुद्ध नहीं होता , भयंकर रक्तपात भी नहीं होता , करोड़ों व्यक्तियों का जीवन बच जाता । वनवास के बाद स्वत: ही युधिष्‍ठिर को इंद्रप्रस्थ तथा हस्तिनापुर का राज भी मिल जाता। सांप भी मर जाता और लाठी भी नहीं टूटती। 

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      🚫 तो क्या महाभारत के महायुद्ध और महाविनाश की जिम्मेदारी धर्मराज के एकतरफा राजनैतिक दृष्टि से अपरिपक्व एकतरफा भातृप्रेम और स्वयम् को धर्मवान और क्षमावान सिद्ध करने की गलत नीतियों की भी है ??


       🎈🍘🍊 हमारे देश का दुर्भाग्य है कि जब भी दुश्मन हारकर सामने होता है तब भाई बंधुत्व ,सब कुछ हमे दुश्मन में दिखाई देने लगता है । हमारे शाशक पुराने अनुभव भूलकर , उसे क्षमा करने को व्याकुल हो जाते है ।

       ************** क्रमशः ******** राम नाथ गुप्त *********

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