पोस्ट --( 446 )- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( ४६ ) भीमसेन द्वारा दिव्य कमल प्राप्त करने के लिए धनाध्यक्ष कुबेर के राक्षस सैनिकों से युद्ध तथा वेश बदल कर धोखा देने वाले कृतघ्न #जटासुर का वध करके पान्डवों जी जीवन रक्षा ।
-आज्ञाओ, ,प्रतिज्ञाओं, और वचनों के आधार पर समीक्षा-
🚫 पांडवो की दशा से द्रवित श्री हनूमान जी द्वारा तुरंत कौरवों को नष्ट करने या उन्हें बांध लाने की बात को भीम युधीष्ठिर को स्वीकार कर लेना चाहिए था । इससे करोड़ो व्यक्तियो की मौत से बचा जा सकता था -
🎈 युधीष्ठिर की #प्रतिज्ञा कि वे दूसरों के द्वारा जीती गयी पृथ्वी पर शाशन नही करेंगे #गलत और #असंभव थी - क्योंकि युद्ध मे पांडवो की विजय केवल श्री #कृष्ण और #अर्जुन की ध्वजा पर बैठे श्री #हनूमान जी के कारण ही हुई थी -अर्जुन का रथ युद्ध मे दिव्यास्त्रों से जाने कब का dagdh दग्ध हो चुका था जिसकी रक्षा हनूमान जी ने की थी -युद्ध खत्म होने के बाद , श्री कृष्ण के कहने पर पहले अर्जुन उतरे थे फिर श्री हनूमान जी अंतर्ध्यान हुए और श्री कृष्ण के उतरते ही रथ अपने आप धू धू कर जल उठा था ।
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🍎 श्री हनूमान जी के अदृष्य होने के बाद भीम श्री हनूमान जी व श्री राम जी का स्मरण करते हुए ,उनके बताए रास्ते पर चलते हुए कैलाश पर्वत के समीप ,धनाध्यक्ष #कुबेर के राजमहल के पास एक दिव्य #सरोवर पर पंहुचे - जिसमे वे दिव्य कमल पुष्प जिनकी तलाश में भीम गए थे ,वहां मौजूद थे -भीमसेन के स्नान करने व कमल फूलो को लेने के लिए सरोवर में उतरते ही कुबेर के राक्षस सैनिकों ने उन पर आक्रमण कर दिया -भीम ने अनेको राक्षसो को मार डाला -जब कुबेर को सब बात पता चली तब उन्होंने भीम को मनचाही तादाद में पुष्प लेने का आदेश भिजवाया ।
🚫 राक्षसो से भीमसेन के भयंकर युद्ध का समाचार जानकर चिंतित युधिष्ठिर आदि सभी व्यक्ति , घटोत्कच व उसके साथियों की पीठ पर बैठ कर उस सरोवर के पास पंहुचे । फिर अर्जुन के आने की प्रतीक्षा करते हुए सभी ने कुछ दिनों तक वही गन्धमादन पर्वत पर निवास किया । फिर नर नारायण के तपस्यास्थल बद्रिकाश्रम पर वापस आ गए
🚫🌋 नीति है #कृतघ्न और #धोखेबाज व्यक्ति का तुरंत #वध कर देना चाहिए ---भयंकर राक्षस #जटासुर का वध -🍎🍎
🎈 बद्रिकाश्रम में एक दिन दुर्योधन का भेजा हुआ , जटासुर नामक राक्षस , एक वेदपाठी #ब्राह्मण बनकर वहां आया -पांडवो ने उसका बहुत आदर व सत्कार किया -एक दिन जब भीमसेन कही गये हुए थे और ऋषि मुनि स्नान करने गए थे -उसी समय जटासुर -युधिष्ठिर ,नकुल ,सहदेव तथा, पांडवो के सभी अश्त्रो ,धनुष बाणो सहित उन्हें जबरन #उठाकर आकाशमार्ग से ले भागा । उनकी पुकार सुनकर तब तक भीमसेन वहां आ गए और भयंकर युद्ध करके भीमसेन ने उस कृतघ्न और धोखेबाज राक्षस का #वध किया ।
🚫 फिर युधिष्ठिर आदि नर नारायण पर्वत से घटोत्कच आदिके कंधों पर बैठकर चलकर , कैलाश पर्वत , मैनाक पर्वत , श्वेत गिरी तथा अनेक नदियो के ऊपर से होते हुए । हिमालय के पृष्ठ भाग ( शायद आधुनिक चीन की तरफ का भाग )-में राजर्षि #वृषपर्वा के आश्रम पर पंहुचे । श्री वृषपर्वा के यहां अपना सभी अतिरिक्त सामान छोड़कर सभी लोग महर्षि #अष्टिवेण के आश्रम पर गए जहां पूर्णिमा की रात को केवल जल और पवन का सेवन करने वाले तपस्वी #मुनिगण #आकाशमार्ग से #आते थे -वहां भेरी ,प्रणव शंख ,मृदंगों का शब्द सुनाई देता था । सिद्धपुरुषों का दर्शन केवल अत्यंत पुण्यात्माओं को ही मिल पाता था , वहाँ सभी लोग कई महीनों तक रहे व #अद्भुत #घटनाएं देखी ।
🍎 आज के समय मे इन बातों पर आश्चर्य महसूस होता है --परंतु यह बिल्कुल सत्य है कि हिमालय की अनजान गुफाओं में आज भी हजारो साल की आयु वाले सिद्ध महात्मा मौजूद है जिनके दर्शन बहुत ही भाग्यशाली लोगो को कभी कभी मिल जाते है -पिछली सदी में स्वामी राम तीर्थ को दुर्गम गुफाओं में सिद्धो के दर्शन हुए थे --गायत्री परिवार के श्री राम आचार्य जी ने भी सिद्ध संतो के दर्शन किये थे
वहां अर्जुन के स्वर्ग से वापसी के बाद उन्हें साथ लेकर युधीष्ठिर आदि वापस आकर वनों में वनवास का समय पूर्ण करने लगे ।
शेष अगली पोस्ट में ***** राम नाथ गुप्त कन्नौज ***

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