पोस्ट -( 444 )-- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( ४४ ) - भीमसेन तथा श्री कृष्ण व सात्यकि द्वारा दुश्मन के शक्तिशाली होने पहले ही तुरन्त दुर्योधन को मार कर अभिमन्यु को राजा बनाने का सुझाव नामंजूर -
प्रतिज्ञाओं ,वचनों और आज्ञाओ पर कथा और समीक्षा--
ध्रतराष्ट्र को अर्जुन के स्वर्ग में निवास करने और भगवान शिव से अमोघ पासुपताश्त्र के साथ ही सभी दिव्य शस्त्रास्त्रों को सफलता से प्राप्त कर लेने का समाचार श्री वेदव्यास से प्राप्त हुआ -उन्होंने संजय से अपनी #व्याकुलता प्रकट की -
राजा जनमेजय जी के पूछने पर श्री वैशम्पायन जी ने बताया कि उस समय काम्यक वन में निवास कर रहे चारो पांडव बड़ी बेसब्री से अर्जुन के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे । तब एक दिन भीमसेन ने युधीष्ठिर से निवेदन किया -
हमारे मन मे कौरवों को पीस डालने के लिए बार बार क्रोध उठता है । जब तक दुर्योधन पृथ्वी को पूर्ण रूप से अपने वश में न कर ले ,उसके पहले ही भगवान कृष्ण की सहायता से , उसे और उसके कुटुंब को मार डालना चाहिए । शास्त्रो में तो यहां तक कहा गया है कि #कपटी पुरुष को कपट करके भी मार डालना चाहिए । अगर आप मुझे आज्ञा दे तो मैं आग की तरह भभक कर जाऊं ,और दुर्योधन का नाश कर डालूं
परंतु सत्यप्रतिज्ञ युधिष्ठिर अपने वचन पर अड़े रहे और भीमसेन को युद्ध की आज्ञा नही दी स्वयम का हित और देशहित तथा राजनीत पर हावी प्रतिज्ञा और वचन - रहा और इसका कुफल - जब 13 वर्षो में दुर्योधन व कर्ण ने अधिकांशतः सारे संसार की शक्तिओ को अपने वश में कर लिया तब अवश्यम्भावी महायुद्ध हुआ -नतीजा महाविनाश -के बाद ही अत्यंत कठिनाई से मिली विजय -
एक दिन महर्षि bhrahdshv ब्रह्दशव युधिष्ठिर के पास आये तब अत्यंत दुखित युधिष्ठिर ने उनसे पूछा कि क्या कभी किसी और राजा को इतना दुखमय जीवन बिताना पड़ा है ? ऋषि ने कहा कि सारे #विनाश की जड़ #जुआ होता है -पिछले समय मे विश्व विजयी अत्यंत रूपवान * #राजा #नल *को जुए की लत के कारण उसके भाई ने कपट से हरा कर उसका राज्य धन संपत्ति सब कुछ जीत लिया था व केवल एक वस्त्र में दमयंती सहित जंगल मे निकाल दिया था तथा उन्हें मदद करने वाले को मृत्यु दंड देने का एलान किया था । जंगल में जब उनकी धोती तेज हवा में उड़ गयी तब दमयंती की आधी धोती फाड़ कर उन्हें पहननी पड़ी और दमयंती को भी छोड़ कर अकेले जाना पड़ा उन्होंने महानतम कष्ट जुए की लत के कारण भोगे । उनके कष्टो के सामने तुम्हारे कष्ट कम है ।
जुआ का खेल महाविनाशकारी होता है
एक दिन स्वर्ग यात्रा करके महान ऋषि लोमश मुनि पांडवो के पास आये और उन्हें अर्जुन का सभी समाचार सुंनाया - बड़े आश्चर्य से ऋषि लोमश जी ने बताया कि अर्जुन को देवराज इंद्र ने अपने साथ आधे सिंहासन पर बैठने की अनुमति दी है और वे सभी दिव्य अश्त्रो को प्राप्त कर चुके है
महर्षि लोमश और पुरोहित ऋषि धौम्य के साथ चारो पांडवो व द्रोपदी ,नैमिषारण्य ,प्रयाग ,गया ,अगस्त आश्रम ,आदि तीर्थ स्थानों की यात्रा की -फिर समूद्र के किनारों के तीर्थो की यात्रा करते हुए प्रभास क्षेत्र में पंहुचे
तब द्वारका से श्री कृष्ण ,श्री बलराम जी तमाम यादवो के साथ , अत्यंत कष्ट भोग रहे पांडवो से मिलने आये -श्री बलराम जी पांडवो की हालत देखकर अत्यंत व्यथित हुए ; तब सात्यिक कहने लगे कि बलराम जी श्री कृष्ण सहित हम सब लोग चलो दुर्योधन सहित सभी कौरवों का वध कर दे और जब तक पांडवो के बनवास के 13 वर्ष पूरे न हो तब तक अभिमन्यु को हस्तिनापुर का राजा बनाये । परंतु युधिष्ठिर इसपर भी तैयार नही हुए --
कपटी व्यक्ति को कपट से न मारकर उसके साथ भी प्रतिज्ञाओं के तथाकथित धर्म बन्धन में बंधे रहना कंहा तक उचित व धर्म के अनूकूल था

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