महाभारत कथा -443


                         अथ श्री महाभारत कथा


 पोस्ट --( 443 )-- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( ४३ ) - अर्जुन का अमरावती ( स्वर्ग ) मे निवास 


     आज्ञाएं प्रतिज्ञाएं तथा वे घटनाएं जो महाविनाशकारी महायुद्ध का कारण बनी --


   🍎 स्वर्ग में अर्जुन ने देवराज इंद्र से सभी दिव्यास्त्रों और उनके वज्र संबंधी सभी विद्या सीखी व उनका अभ्यास भी किया -उन्होंने अचानक ही घटा छा जाने ,और बिजलियों को चमकाने का भी अभ्यास कर लिया --समस्त युद्ध विषयक ज्ञान प्राप्त प्राप्त कर लेने के बाद अर्जुन अपने भाइयों के पास आ जाना चाहते थे परंतु इंद्र जी की आज्ञा से स्वर्ग में 5 वर्ष तक अमरावती में रहे -


    🎈 समस्त भावी घटनाओ को जानने वाले इंद्र ने एक दिन अर्जुन से चित्रसेन गंधर्व से गाना ,नाचना और पृथ्वी लोक पर उपस्थित सभी वाद्य यंत्रों को बजाना सीखने के लिए कहा -अर्जुन शीघ्र ही इन सभी विद्याओ में प्रवीण हो गए ।


         अपने भाइयों और माता की याद करते हुए , नृत्य गायन के दौरान ,एक दिन अर्जुन -स्वर्ग की सर्वांग सुंदरी अप्सरा उर्वशी को निर्निमेष नेत्रों से देखने लगे --चित्रसेन ने सब कुछ देवराज इंद्र को बताया और इंद्र के कहने पर चित्रसेन ने अप्सरा उर्वशी से अर्जुन के सौंदर्य ,स्वभाव ,रूप, व्रत, विद्या, तेज ,प्रताप और ऐश्वर्य की प्रसंशा करते हुए उसे देवराज का आदेश - अर्जुन को संतुष्ट करने को कहा ।


       🎈 अप्सरा उर्वशी पहले से ही अर्जुन पर आसक्त थी -वह बन ठन कर अर्जुनके पास पंहुची और देवराज के आदेश से अपने आने का कारण बताते हुए , उर्वशी ने अपने को काम के वश में होकर आने तथा प्रणय करने हेतु निवेदन किया -


        उर्वशी की बात सुनकर जितेंद्रिय अर्जुन संकोच के मारे मानो धरती में गड़ गए ,उन्होंने अपने हाथों से अपने कान बन्द कर लिए ,और उर्वशी से बोले कि उसके मन मे कोई बुरा भाव नही था ,वह उनकी गुरु पत्नी तथा पुरुवंश की माता के समान है -उर्वशी ने अर्जुन से बहुत निवेदन किया कि वह काम वेग से जल रही है , उसे अवश्य स्वीकार करे ।


       परंतु अर्जुन सत्य प्रतिज्ञा करते हुए -दिशाओ और विदिशाएं तथा अधिदेवताओ को साक्षी करते हुए उर्वशी से बोले - जैसे कुंती , माद्री व इंद्र पत्नी शची मेरी माताएं है वैसे ही पुरुवंश की जननी होने के कारण तुम भी मेरी माता हो -मैं तुम्हारे चरणों मे सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ -तुम माता के समान मेरी पूजनीय हो और मैं तुम्हारा पुत्र के समान रक्षणीय हूँ

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        🌏 जब बड़े बड़े संसार के त्यागी , तपस्वी संत महात्मा तक सांसारिक युवतियो को देखकर अपना संयम व तपस्या गंवा देते हैं तब स्वर्ग की सर्वांग सुंदरी अप्सरा उर्वशी का प्रणय निवेदन ठुकराना ---इतना महान जितेंद्रिय चरित्र और आचरण -- तो अर्जुन का ही हो सकता था--इसी कारण अर्जुन चार विवाहों के बाद भी ** ब्रम्हचारी ** कहलाये और अश्वत्थामा के विरुद्ध अपने चलाये गए - ब्रम्हास्त्र - को वापस ले सके जिसे वापस लेना ब्रम्हचर्य का पालन करने वाले तथाकथित महान व्यक्तियों के लिए भी असंभव था -


       स्वाभाविक परिणाम -- काम पीड़ित और अपमानित उर्वशी ने ,अर्जुन के व्यवहार से क्रोध से कांपते हुए अर्जुन को श्राप दिया -तुम्हे एक वर्ष तक नपुंसक होकर स्त्रियों के बीच नर्तक होकर सम्मान रहित जीवन जीना होगा **


        🎃 और जब जितेंद्रिय अर्जुन को दिया हुआ श्राप --- वरदान बन गया
 
        देवराज इंद्र ने सब कुछ जानकर , अर्जुन को बुलाकर उसे आश्वासन दिया कि यह श्राप उसके लिए वरदान साबित होगा और 1 वर्ष के अज्ञातवास के समय उसे अज्ञात रहने में मदद करेगा ।


          उन्ही दिनों एक दिन महर्षि लोमश अमरावती पंहुचे और अर्जुन को इंद्र के साथ उनके आधे सिंहासन पर बैठे देखकर आश्चर्य में पड़ गए -इंद्र ने लोमश मुनि को अर्जुन के नर ऋषि का अवतार होने आदि की कथा बतायी -पांच वर्ष बाद अर्जुन अपने भाइयों के पास पृथ्वी पर वापस आ गए


                          अथ श्री महाभारत कथा


** शेष अगली पोस्ट में ***** राम नाथ गुप्त कन्नौज*******

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