पोस्ट -( 440 )- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( ४० ) - श्री व्यास जी द्वारा युधिष्ठिर को प्रतिस्मृति विद्या का उपदेश - युधिष्ठिर से इस विद्या का ज्ञान प्राप्त कर अर्जुन ने इन्द्रकील पर पँहुच कर इंद्र के दर्शन किये ।
-आज्ञाएं ,प्रतिज्ञाएं ,वचन और वे घटनाएं जो महाविनाशकारी महायुद्ध का कारण बनी -
🚫 एक मित्र ने कमेंट करके पूछा है कि जब दुश्मन ज्यादा ताकतवर हो तब क्या करना चाहिए ?-
आज की पोस्ट इसी विषय से संबंधित है -
🎈 द्वेत वन में जब युधिष्ठिर और भीमसेन की कर्तव्य विषयक बातचीत चल रही थी उसी समय महर्षि वेदव्यास उनके सम्मुख प्रगट हुए और युधिष्ठिर को चिंताग्रस्त देखकर बोले -
🍎 *युधिष्ठिर मैं तुम्हारी समस्या जानता हूँ -13 वर्ष बाद बड़ी समस्या होगी । तुम्हारा विराट खजाना और विश्व विजयी सेना अब कौरवों के पास है । जिन राजाओ को तुमने परास्त किया है वे द्वेष वश अब दुर्योधन का साथ देंगे । कौरव तब तक बराबर निरंतर धन व नए आयुधों का संग्रह करते रहेंगे ,इसके अलावा महान धनुर्धर ,भीष्म पितामह ,द्रोणाचार्य ,अश्वत्थामा , कृपाचार्य और कर्ण को सेवा से दुर्योधन निश्चित रूप से अपने वश में कर लेगा -तब उनसे युद्ध कैसे लड़ा जाएगा **
🚫 वेदव्यास बोले -** युधिष्ठिर तुम मेरे शरणागत शिष्य हो ,इसलिए मैं तुम्हे मूर्तिमान सिद्धि के समान** #प्रतिस्मृति ** नाम की #विद्या देता हूँ -इस विद्या को अर्जुन को सिखा देना- वह नारायण का सहचर , महातपस्वी ऋषि नर है ,वह अच्युत स्वरूप है -उसे दिव्य अस्त्र विद्या की प्राप्ति के लिए भगवान शंकर ,देवराज इंद्र ,वरुण, कुबेर व धर्मराज के पास भेजो । उनसे दिव्यास्त्रों को प्राप्त करके ही तुम महायुद्ध जीत सकोगे **-
🍎 युधिष्ठिर उपदेशानुसार मन्त्र का मनन और जप करने लगे इससे उनके #मन का #भय दूर हो गया , जगत के व्यक्तिओ की सत्यता तथा #देवताओ की #अनुभूति भी उन्हें होने लगी । पांडव द्वेत वन से चलकर सरस्वती तटवर्ती काम्यक वन में पंहुचे फिर युधिष्ठिर ने प्रतिस्मृति मन्त्र की विधिवत दीक्षा अर्जुन को दी तथा इसका ब्रम्हचर्य पूर्वक जाप करके इंद्र की शरण मे जाने को कहा -
🎈अर्जुन जब इंद्र का दर्शन कराने वाली विद्या से युक्त होकर चल रहे थे तब उनके #तेज से #भयभीत होकर सभी प्राणी रास्ते से हट जाते थे -विद्या के प्रभाव से उनकी #चाल इतनी #तेज हो गयी कि वे एक ही दिन में हिमालय फिर गन्धमादन पर्वत और #इन्द्रकील तक पंहुच गए -
🍎 तभी उन्हें तेज आवाज सुनाई दी * रुक जाओ * एक पेड़ की छाया में बैठे हुए ब्रम्ह तेज से चमकते क्रश शरीर के तपस्वी ने अर्जुन को रुकने तथा अपने शस्त्रो को फेंक देने का आदेश दिया । अर्जुन ने हथियारों को त्यागने से मना किया । तभी तपस्वी के रूप में देवराज इंद्र प्रगट हो गये-
-------- अर्जुन ने भाइयो के हित मे स्वर्ग का सुख ठुकराया --
🚫 इंद्र ने अर्जुन को सबकुछ छोड़ कर स्वर्ग चलकर सर्वसुख भोगने को कहा -परंतु अर्जुन ने अपने भाइयों को त्यागना व स्वर्गीय सुखों को भोगने की बात अस्वीकार कर दी तथा उनसे दिव्य अस्त्रों की मांग की
देवराज इंद्र ने अर्जुन को- वही इन्द्रकील नामक स्थान पर ; सभी दिव्यास्त्रों के आविष्कारक ,और ज्ञाता भगवान शिव शंकर की तपस्या करने व उन्हें प्रसन्न करने को कहा और उसके बाद स्वर्ग आकर उनसे सभी दिव्यास्त्रों को प्राप्त करने का आदेश दिया
🎆 🚫 मित्र के प्रश्न का उत्तर -- शत्रु जब बलवान हो तब आलस्य और अन्य कार्यो को छोड़कर प्रतिस्मृति मन्त्र का पाठ और विश्व मे मौजूद हर प्रकार के आयुधों को प्राप्त करने का पूर्ण प्रयास करना चाहिए
आज के युग में प्रतिस्मृति विद्या क्या हो सकती है --आदि शेष कथा अगली पोस्ट में --
क्रमशः ******* राम नाथ गुप्त कन्नौज *************

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