पोस्ट -( 439 ) - अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( ३९ ) - भगवान श्री कृष्ण का तुरन्त कौरवों पर आक्रमण करने का सुझाव और द्रोपदी को आश्वासन -
कपट द्यूत और पान्डवों की दुखद स्थिति का समाचार पाकर चिंतित होकर , काम्यक वन में पान्डवों से मिलने श्री कृष्ण , बलराम जी ,प्रमुख यादव वीर ,द्रष्टद्युम्न तथा अन्य सम्बन्धीगण पँहुचे । सभी लोग युधिष्ठिर के चारों ओर बैठ गए । तब भगवान श्री कृष्ण बोले -
🚫 " राजाओं ! अब यह निश्चित हो गया है कि पृथ्वी दुरात्मा दुर्योधन , कर्ण ,शकुनि और दू:शाशन का खून पियेगी ।
🚫🍎 यह सनातन धर्म है कि जो मनुष्य किसी को #धोखा देकर #सुख भोग कर रहा हो , उसे #मार #डालना चाहिए । अब हम लोग इकट्ठे होकर कौरवों और उसके सहायकों को युद्ध मे मार डालें ,तथा धर्मराज युधिष्ठिर का राज सिंहासन पर अभिषेक करें ।"🍎🍍
भगवान श्री कृष्ण को बहुत क्रोधित जानकर अर्जुन ने उनकी स्तुति की । तब श्री कृष्ण पुनः बोले --
🎈 " अर्जुन ! तुम एकमात्र मेरे हो और मैं एक मात्र तुम्हारा हूँ । जो तुमसे द्वेष करता है , वह मुझसे द्वेष करता हैं ,और जो तुम्हारा प्रेमी है वह मेरा प्रेमी भी है ,तुम मुझसे अभिन्न हो " । तभी द्रोपदी बोली -
🚫 " मधुसूदन ! आप सबके प्रभु है ,परमात्मा है और अपनी शक्ति से सब कर्म करने में समर्थ है । इसलिए मैं आपके सामने अपना दुख निवेदित करती हूँ । श्री कृष्ण ! मैं पान्डवों की पत्नी , द्रष्टद्युम्न की बहन और आपकी सखी हूँ । मुझ जैसी #गौरवशालिनी स्त्री को , कौरवों की भरी सभा मे #घसीटा जाए , यह कितने दुख की बात है । कौरवों ने बेईमानी से हमारा राज्य छीन लिया , वीर पान्डवों को दास बना लिया और राजाओं से ठसाठस भरी सभा मे मुझ एक वस्त्रा रजस्वला स्त्री को #चोटी पकड़कर #घसीट कर मंगवाया । भीमसेन और अर्जुन मेरी रक्षा नही कर सके । #धिक्कार है इनके बल पौरुष को ! ये पांडव टुकुर टुकुर देखते रहे ।"
यह कहते हुए द्रोपदी की आंखों से आंसुओं की धार बह चली । द्रोपदी फिर बोली -- " श्री कृष्ण ! तुम मेरी रक्षा करने में समर्थ हो । तुम्हे मेरी रक्षा करनी चाहिए "
तब श्री कृष्ण ने वहां भरी सभा मे द्रोपदी को सम्बोधित करते हुए कहा --
🚫 " कल्याणी ! तुम जिन पर क्रोधित हुयी हो , उनकी स्त्रियां भी इसी प्रकार रोयेंगीं । थोड़े ही दिनों में अर्जुन के बाणों से कटकर खून से लथपथ होकर वे जमीन पर सो जायेंगें । मैं वही काम करूंगा जो पान्डवों के अनुकूल होगा । तुम शोक मत करो । मैं तुमसे सत्य #प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम राजरानी बनोगी । चाहे आकाश फट जाए ,हिमालय टुकड़े टुकड़े हो जाये ,पृथ्वी चूर चूर हो जाये ,समुद्र सूख जाए ,परन्तु द्रोपदी ! मेरी बात झूठी नही हो सकती । " तब अर्जुन ,द्रष्टद्युम्न , श्री बलराम जी आदि सभी ने द्रोपदी को आश्वस्त किया ।
अब फिर श्री कृष्ण युधिष्ठिर को सम्बोधित करते हुए बोले --
🌏 " राजन ! यदि मैं उस समय द्वारिका में होता ,तो आपको इतना दुःख नही उठाना पड़ता । यदि कुरुवंश मुझे जुए में नहीं बुलाते तो भी मैं स्वयम् वहां आता , और बहुत से दोष दिखाकर #जुएँ को #रोक देता । मैं भीष्म पितामह ,द्रोणाचार्य , कृपाचार्य को बुलाकर ध्रतराष्ट्र से तुरन्त जुआ बन्द करने को कहता । जुए से बिना समय के ही धन संपत्ति का नाश हो जाता है । बार बार खेलने की ऐसी ललक सवार होती है कि कड़ी टूटती ही नही है
🍎 स्त्रियों से हेल मेल ,जुआ खेलना , शिकार का शौक ,और शराब पीना - यह चारों बातें प्रत्यक्ष दुःख है ।
इससे मनुष्य श्री भृष्ट हो जाता है । जिनमे भी जुआ सबसे खराब है । यदि मेरे मना करने पर राजा ध्रतराष्ट्र जुआ रुकवा देते तो ठीक , और यदि वे मेरी प्रिय बातों को नही मानते तो मैं बल पूर्वक उन्हें दण्ड देता । यदि उनके जुआरी सभासद या मित्र उनका पक्ष लेते तो मैं उन्हें #मार डालता ।
युधिष्ठिर के पूछने पर कि उस समय श्री कृष्ण द्वारिका में नही ,तो कहाँ थे ? भगवान बोले -
🚫 " राजसूय यज्ञ के समय शिशुपाल के मरने के बाद उसके मित्र शाल्व ने सप्तधातु निर्मित नगराकार विमान "सोम " पर चढ़कर द्वारिका पर आक्रमण कर दिया था । मेरे पंहुचने के पहले ही वह भाग गया था । फिर तलाश करने पर वह समुद्र के एक भयानक द्वीप में विमान सहित मिला । फिर युद्ध में मैने उसे उसके सहायकों सहित मार डाला । जब मैं लौटकर द्वारिका पँहुचा तब कपट द्यूत और आपके वनवास का समाचार पाकर यहां आया ।
🌏🚫 निश्चित रूप से युद्ध नीति के अंर्तगत - श्री कृष्ण को कपट द्यूत के समय द्वारिका से दूर रखने के लिए ही दुर्योधन ने शाल्व से द्वारिका पर आक्रमण कराया होगा ।
भगवान श्री कृष्ण के कौरवों पर तुरंत आक्रमण करने के सुझाव पर धर्मराज युधिष्ठिर के सहमत न होने पर ,वे सभी संबंधियों सहित वापस चले गये । सुभद्रा और अभिमन्यु , श्री कृष्ण के साथ द्वारिका चले गए ।
*************** अपनी बात ************
🚫 भगवान श्री कृष्ण का तुरन्त कौरवों पर आक्रमण करने का सुझाव बहुत ही उपयुक्त था । इस समय ,पान्डवों के प्रति सहानुभूति का माहौल था , इन्द्रप्रस्थ की सेना निश्चित रूप से पाण्ड्वो का साथ देती और यादवों की अत्यंत विशाल सेना के साथ होने के कारण विजय आसान होती । 13 वर्षों बाद युद्ध के समय स्थिति बदल चुकी थी ।
🎈 जब जुआ खेल ही अधर्ममय और कपटपूर्ण था और भविष्य में युद्ध होना निश्चित था ; तब युद्ध को भगवान श्री कृष्ण के सुझाव के अनुसार , अपनी सुविधानुसार तुरन्त करना ज्यादा हितकर होता । 13 वर्षों वाली #प्रतिज्ञा से बंधे रहना क्या #राजनीति की दृष्टि से #उचित था ?
***** क्रमशः ********* राम नाथ गुप्त *********

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