महाभारत कथा -438, दुर्योधन और कर्ण का वन में जाकर पांडवों को मार डालने की योजना


 पोस्ट ( 438 ) - अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( ३८ ) - दुर्योधन और कर्ण का वन में जाकर पांडवों को मार डालने की योजना - मैत्रेय ऋषि का श्राप तथा श्री कृष्ण और यादवों व सगे सम्बन्धियों का काम्यक बन में जाकर पान्डवों से मिलना ।

         जब दुरात्मा दुर्योधन को पता चला कि काका विदुर फिर हस्तिनापुर वापस आ गए है तब वह बहुत चिंतित हुया कि काका विदुर जी , पुनः पिता जी को पान्डवों के पक्ष में प्रभावित करेंगे । तब कर्ण की सलाह पर उसने तय किया -- कि 

       🚫 जब तक पांडव शोकग्रस्त है ,असहाय है ,तभी तक उनपर विजय सम्भव है , इसलिए सभी कौरव कवच और सश्त्रादि धारण करके रथ पर सवार होकर वन में जाकर वनवासी पाण्डवों को मार डालें । वे सब रथों पर सवार हुए और पान्डवों को मारने के लिए चल पड़े ।


      🍊 त्रिकालदर्शी महर्षि व्यास जी तुरंत वहां प्रकट हुए और राजा ध्रतराष्ट्र को धिक्कारते हुए कहा कि वे अपने लाड़ले बेटे को ऐसा करने से रोकें । अगर उसने ऐसी गलत चेष्टा भी की तो वह जान से हाथ धो बैठेगा । तभी काम्यक वन में पान्डवों से मिलकर महर्षि मैत्रेय वहां आये । उन्होंने ध्रतराष्ट्र की निंदा करते हुए कहा -


      🚫" राजन ! यह किसी प्रकार उचित नही है कि तुम्हारे और भीष्म के जीवित रहते तुम्हारे पुत्र एक दूसरे से विरोध करते हुए मर मिटें । तुम सबको रोकने और सजा देने में समर्थ हो फिर इस अन्याय की क्यों उपेक्षा कर रहे हो । तुम्हारी सभा में तुम्हारे सामने डाकुओं के समान जो अन्याय कार्य हुआ है ,उससे ऋषि मुनियों के समाज में तुम्हारी बहुत निंदा हुई है ,अब सम्भल जाओ और पान्डवों से मेल कर लो ।"


       🍘 मुनि मैत्रेय जी की बात सुनकर दिखावे के लिए ध्रतराष्ट्र ने दुर्योधन को समझाने का प्रयास किया । तब मुनि की हंसी उड़ाते हुए दुर्योधन पैर से जमीन कुरेदने लगा और अपनी जांघ पर ताल ठोकने लगा । अपना तिरस्कार देखकर मुनि ने दुर्योधन को श्राप दिया कि घोर युद्ध मे भीमसेन गदा की चोट से तेरी जाँघे तोड़

 देंगे ।", ,तब ध्रतराष्ट्र मुनि के चरणों पर गिरकर क्षमा याचना करने लगे । परन्तु मैत्रेय मुनि बोले " अगर यह पान्डवों से मेल मिलाप कर लेता है तभी श्राप से बच सकेगा "।


       महर्षि मैत्रेय के जाने के बाद ध्रतराष्ट्र ने विदुर से भीम द्वारा महाबलशाली किर्मीर राक्षस के वध के बारे में जानना चाहा ,तब श्री विदुर जी बोले --

        🍘 " जिस समय पांडवों ने वनयात्रा करते हुए काम्यक वन में प्रवेश करना चाहा तब अत्यंत भयानक रूप में किर्मीर राक्षस मार्ग रोककर खड़ा हो गया । उसने राक्षसी माया फैलाकर सभी को भयभीत कर दिया ,तब धौम्य मुनि ने रक्षोघ्न मन्त्र पढ़ कर उसकी माया नष्ट कर दी । वह राक्षस बोला कि वह भीमसेन द्वारा मारे गए बकासुर का भाई और हिडिम्न का मित्र है और भीम से बदला लेने आया है ।भीमसेन ने कुछ देर के युद्ध के बाद उसे मार डाला । विदुर जी से किर्मीर राक्षस के वध की कथा सुनकर #ध्रतराष्ट्र बहुत #उदास हो गए ।


     🎃 हम प्रारम्भ से यह समीक्षा कर रहे है कि महाभारत महायुद्ध का जिम्मेदार कौन था ? समझ में तो यही आता है कि मुख्य दोषी दुर्योधन के साथ ही राजा #ध्रतराष्ट्र थे जिन्होंने पुत्र प्रेम में विघटनकारी , द्वेषपूर्वक कपट पूर्ण नीतियों का पालन किया --और सर्व समर्थ होते हुए भी #भीष्म पितामह का है जो ध्रतराष्ट्र को मौन या कहे मौन समर्थन देते रहे ।🎃


     🚫 जब भोज , वृष्णि ,अंधक आदि वंशों के यादवों को कपटपूर्ण जुआं और पान्डवों के काम्यक वन में निवास का समाचार मिला तब वे अपने कर्तव्यों का निश्चय करने के लिए , भगवान श्री कृष्ण के साथ ,तथा पांचाल देश के द्रष्टद्युम्न , केकय देश के सगे सम्बन्धियीं के साथ , कौरवों पर बहुत गुस्सा करते हुए , पान्डवों के पास गये ।

सभी सम्बन्धी श्री कृष्ण को अपना नेता बनाकर ,युधिष्ठिर के चारों ओर बैठ गए ।

   **** क्रमशः ********** राम नाथ गुप्त *******

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