पोस्ट ( 437 ) अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा (३७ ) -" वन पर्व " -- पांडवों का वन गमन और भगवान सूर्य से पांडवों को अक्षय पात्र की प्राप्ति ---
द्रोपदी के साथ पांडवों के वनवास के लिए चले जाने पर उद्विग्न राजा ध्रतराष्ट्र ने श्री विदुर जी से यह जानना चाहा कि पांडव किस प्रकार वन में जा रहे हैं ? व उनकी क्या चेष्टा है ? - श्री विदुर जी बोले --
🚫 " धर्मराज की बुद्धि धर्म से विचलित नही हुई है । कपटपूर्वक राज्यच्युत किये जाने के बाद भी वे आपके पुत्रों पर दया का भाव ही रखते है । वे अपने मुख को कपड़े से ढक कर इस लिए चल रहे है कि " कंही उनकी लाल लाल आंखों की दृष्टि पड़ते ही कौरव भस्म न हो जाएं " ।
बाहुबल के अभिमानी भीमसेन शत्रुओं को अपनी बांह फैलाकर दिखाते जा रहे है कि समय आने पर वे युद्ध मे उन्हें अपना पराक्रम दिखाएंगे । अर्जुन , नकुल सहदेव सभी बेहद क्रोध में भरे चले जा रहे है । अयोनिजा ,अग्नि से उत्पन्न रजस्वला द्रोपदी ,एक वस्त्र पहने रोते रोते जा रही है , उसने चलते समय कहा है कि जिनके कारण उसकी यह दुर्दशा हुई है , उनकी स्त्रियां भी आजके चौदहवें वर्ष ,अपने स्वजनों की मृत्यु से दुखित होकर इसी प्रकार हस्तिनापुर में प्रवेश करेंगी ।
🎈उसने पहले ही दुःशाशन के खून से धोकर ही अपने बालों को बांधने की प्रतिज्ञा कर रक्खी है । सबसे आगे चल रहे पुरोहित धौम्य भी नैअर्त्य दिशा की ओर कुशों की नोक करके यम देवता सम्बन्धी साम मंत्रों का गायन कर रहे है जिसका अभिप्राय है कि रणभूमि में कौरवों के मारे जाने पर ,उनके गुरु पुरोहित भी इसी प्रकार के मंत्रों का पाठ करेंगे ।
🚫 दुर्योधन ,कर्ण और शकुनि ने द्रोणाचार्य को अपना प्रधान आश्रय मानकर पांडवों का सारा इंद्रप्रस्थ का राज्य गुरु द्रोणाचार्य को सौंप दिया और द्रोणाचार्य ने उन्हें रक्षा का भरोसा दिया । 🚫
हस्तिनापुर की जनता भी स्नेहवश अपने प्रिय पांडवों के साथ हो ली । बहुत अनुरोध करने पर वे वापस लौटे परंतु बहुत से अग्निहोत्री ब्राह्मणों ने पान्डवों साथ नही छोड़ा । तब युधिष्ठिर ने अपने पास धन न होने और इस कारण अतिथियों का स्वागत करने में असमर्थ होने की बात कह कर सभी को वापस जाने को कहा । फिर युधिष्ठिर ने अपने पुरोहित धौम्य के पास जाकर समस्या बताई तब धौम्य मुनि ने योगदृष्ट्रि से कुछ समय विचार करके कहा -
🎃" राजन ! सूर्य की कृपा से अन्न उत्पन्न होता है । सूर्य ही समस्त प्राणियों की रक्षा करते है ,इसलिए तुम भगवान सूर्य की शरण ग्रहण करो " ---
🍒 धौम्य मुनि के बताए विधि के अनुसार शास्त्रोक्त सामिग्रियों से युधिष्ठिर ने भुवन भास्कर के 108 नामो वाले स्त्रोत का जाप करके उनसे अतिथियों को अन्न देने योग्य बनाने की कामना के साथ स्तुति की । तब भगवान मार्तंड ने कृपा करके अपने अग्नि के समान देदीप्यमान श्री विग्रह से उनको दर्शन देकर एक तांबे का बर्तन उन्हें प्रदान किया और कहा कि इसमें तुम्हारे रसोईघर में जो कुछ भी सामिग्री तैयार होगी ,वह तब तक अक्षय रहेगी जबतक द्रोपदी परोसती रहेंगी । आज के चौदह वर्ष बाद तुम्हे अपना राज्य वापस मिल जाएगा । इससे युधिष्ठिर की सारी अभिलाषाएं पूर्ण हो गईं ।
🎈 इस स्त्रोत के पाठ से संग्राम में विजय और धन की प्राप्ति होती है । अब अक्षय पात्र की मदद से युधिष्ठिर ब्राह्मणों की अभिलाषा पूर्ण करते हुए यज्ञादि भी करने लगे । उन्होंने कामिक वन की यात्रा की ।
🍊 मानसिक रूप से परेशान ध्रतराष्ट्र ने विदुर जी से अपने कर्तव्य के बारे में उनकी राय मांगी । नितिज्ञ विदुर जी ने परिवार और राज्य के हित के लिए दुर्बुद्धि दुर्योधन को कैद कर लेने और पांडवों को वापस बुलाने की बात कही , तब नाराज ध्रतराष्ट्र ने विदुर को राज्य से निकल जाने का आदेश दिया । विदुर पांडवों के पास वन में चले गए तभी फिर ध्रतराष्ट्र को चिंता हुई कि नीतिज्ञ विदुर के पांडवों के पास रहने से पांडवों का ही हित होगा ,तब उन्होंने संजय को भेजकर विदुर को पुनः बुला लिया ।
************* क्रमशः ******* राम नाथ गुप्त ********

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