महाभारत कथा -436, दुबारा हुए जुएं में फिर पांडवों की हार


 पोस्ट -( 436 )- अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( ३६ ) - दुबारा हुए जुएं में फिर पांडवों की हार और उनका मृगचर्म पहन कर द्रोपदी के साथ वन गमन -

        🚫 पांडवों को अपनी धन संपत्ति के साथ इंद्रप्रस्थ वापस जाने की अनुमति से बेहद परेशान दुर्योधन ने दुःशाशन और शकुनि के साथ मन्त्रणा की और वे राजा ध्रतराष्ट्र के पास गये । उन्होंने राजा को समझाया पांडवों की अपार सम्पदा लौटाकर हमने बहुत गलत काम किया है । इसके अलावा क्रोध में भरे सांपों को गले मे लटकाकर कौन बच सकता है ? इस समय पांडव भी #क्रोधित #सर्पों के समान हैं । जिस समय वे रथ में बैठकर सश्त्रास्त्रों से सुसज्जित होकर हम पर धावा बोल देंगे तब हममें से किसी को भी जीता नहीं छोड़ेंगे । हमने द्रोपदी को जो क्लेश पँहुचाया है इसे वे कभी क्षमा नही करेंगे । इसलिए बनवास की शर्त लगाकर फिर जुआं खेलकर हमें उन्हें वश में कर लेना चाहिये। फिर उनके बनवास की अवधि में हम उनके ही धन से सेना एकत्र करके उन्हें आसानी से नष्ट कर सकेंगे ।

      🎈 राजा ध्रतराष्ट्र ने दुर्योधन से सहमत होकर तुरंत श्रीघ्र गामी दूत को भेजकर पांडवों को दुबारा आकर जुआँ खेलने का आदेश भेजा । ध्रतराष्ट्र के इस निर्णय का भीष्म ,द्रोण ,विकर्ण तथा उनकी पत्नी महारानी गांधारी आदि सभी ने विरोध किया और इससे कुल के नाश होने की चिंता जताई । ध्रतराष्ट्र बोले -

      🎈" यदि कुल नाश होना है तो होने दो । अब मैं इसे नहीं रोक सकता । अब वही होगा जो दुर्योधन और दुःशाशन चाहेंगे "

          इन्द्रप्रस्थ पहुँच पाने के पूर्व ही रास्ते मे दूत ने पंहुचकर युधिष्ठिर को ध्रतराष्ट्र का सन्देश सुनाया । शकुनि छली है तथा अभी के अत्यंत कष्टदायी अनुभव के बाद भी युधिष्ठिर ने जुआं खेलने के लिए वापस लौटना तय किया । वे बोले -

       " सभी प्राणी दैव के आधीन है । चलो फिर जुआं खेलना पड़ता है तो ऐसा ही सही । फिर मैं अपने बूढ़े #ताऊ जी की #आज्ञा को कैसे टालूँ "


        🍎🚫 युधिष्ठिर धर्मराज कहे जाते है । क्या धर्म अत्यंत विनाशकारी ,दुखदाई जुआँ जैसे खेल को धर्मसम्मत मानता है ? इतने अपमान और दु:ख झेलने के बाद जब सामान्य सा व्यक्ति भी दुबारा फिर उसी भयँकर अग्नि में कूदने को तैयार नही होता -- धर्मराज जैसे महान ज्ञानी ,#कैसे #तैयार हो गए ? यह #आज्ञाओं वाला #जंजाल कैसा है ? क्या ताऊ की जुआं खेलने की #आज्ञा #पालनीय थी ? किस हद तक और कौन सी आज्ञाओ का पालन करना चाहिए ? -- इन सब प्रश्नों का उत्तर भगवान श्री कृष्ण ने स्वयम् दिया है , जिसे हम आगामी पोस्ट्स में लिखने का प्रयास करेंगे ।🍎

      🚫 फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि अपनी एकमात्र कमजोरी ~

🎈 " जुआं खेलने का #भयँकर #व्यसन " 🎈, तथा सामान्य #राजनीति की #उपेक्षा को " ताऊ की आज्ञा " के बहाने में धर्मसम्मत बनाने का दुखद प्रयास किया गया । भाइयों के पूर्णतया आज्ञाकारी होने से उनके इस व्यसन को बल मिला ।

       🍊 युधिष्ठिर की यह स्थिति देखकर उनके मित्रों को बहुत कष्ट हुआ । वापस जुआं खेलने पंहुचने पर यह शर्त रक्खी गयी कि एक ओर - सभी पांडव द्रोपदी सहित और दूसरी ओर दुर्योधन अपने भाइयों सहित -- दोनो में जो हारेंगे वे मृगचर्म धारण करके , 12 वर्ष बनवास और 1 वर्ष अज्ञातवास पर जाएंगे । अगर अज्ञातवास में उनका पता चल गया तो उन्हें दुबारा इसी प्रकार बनवास और अज्ञातवास का नियम निभाना होगा । जैसा पूर्व निश्चित था शकुनि के विशेष बने कपट्युक्त पांसे से दुर्योधन की फिर जीत हुई ।

         जुएँ में हारकर पांडवों ने राजसी वस्त्रों को उतारकर मृगचर्म को धारण किया । उनका तिरस्कार करते हुए दुःशाशन कहने लगा -

      🚫 " धन्य है ! धन्य है ! अब महराजा दुर्योधन का शाशन प्रारम्भ हो गया । राजा द्रुपद ने अपनी कन्या द्रोपदी इन् पांडवों को कैसे ब्याह दी । अरे ये #पांडव तो #नपुंसक है। अब पांडव तो नष्ट हो गए है । द्रोपदी तू अब इनके साथ प्रेम कैसे रक्खेगी ? अब तू किसी #मनचाहे #पुरुष को #वर क्यों नही लेती " । 


       🍊 भीमसेन उसके तिरस्कार पूर्वक कहे वचनों को नही सह सके और उन्होंने कौरवों को युद्ध मे इष्ट मित्रों सहित यमराज के पास पंहुचाने की प्रतिज्ञा की । दुःशाशन , भीमसेन को सम्बोधित करके भरी सभा मे " ओ बैल ! ओ बैल " कह कर निर्लज्ज की तरह नाचने कूदने लगा । तब भीमसेन ने उसकी छाती फाड़कर खून पीने की अपनी प्रतिज्ञा फिर दोहराई ।

         🌰 फिर सभी पांडव ' सभी वरिष्ठ जनों, ध्रतराष्ट्र , भीष्म , द्रोणाचार्य आदि को प्रणाम करके वे सब पुरोहित धौम्य को आगे करके नगर के बाहर निकले । सभी पांडवों ने निश्चित अवधि के बाद युद्ध होने पर कौरवों के वध करने की प्रतिज्ञाएं की । विदुर जी ने माता कुंती को वृद्धावस्था के कारण वन जाने से मनाकर ,अपने साथ अपने घर रक्खा तथा विदुर जी ने पांडवों को आशीर्वाद दिया -

        🚫" आप सभी प्रथ्वी से क्षमा ,सूर्यमण्डल से तेज , वायु से बल ,और समस्त प्राणियों से आत्मधन प्राप्त करें । आपका शरीर स्वस्थ और चित्त प्रसन्न रहे । कोई भी काम करना हो तो पहले ठीक सोच विचार कर करना । आप अवश्य कृतार्थ होकर आनन्द से यहां वापस आएंगे " माता कुंती ने भी द्रोपदी को सदुपदेश देते हुए भगवान श्री कृष्ण से इस भयानक कष्ट के अवसर पर पुत्रों व पुत्रवधु की रक्षा करने की प्रार्थना की - **** क्रमशः *********** राम नाथ गुप्त *******

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