पोस्ट ( 424 ) अथ श्री महाभारत कथा - समीक्षा ( २४ ) - महाभारत युद्ध का कारण क्या द्रोपदी के कटु वचन थे ? ** जी बिल्कुल नहीं । फिर क्या कारण थे ? तथा पांडवों और द्रोपदी के पूर्व जन्मों का इतिहास -
🚫 आजकल आम तौर से महाभारत युद्ध के लिए द्रोपदी द्वारा दुर्योधन को कथित कटु हास्य वचन ", अंधे के पुत्र अंधे ही होते है " को दोष देने की भावना प्रचलित हो गयी है । परन्तु यह पूर्णतया असत्य है । पहली बात कि महाभारत ग्रंथ मे द्रोपदी के इन् वचनों का विवरण ही नही है । वास्तव में महाभारत युद्ध की नींव --
१ - राजा शांतनु के वृद्धावस्था में भी किसी भी कीमत पर सत्यवती से विवाह करने की असंयमित कामुक कामना से ही प्रारम्भ हुई ।
२ - अपने पिता शांतनु की प्रसन्नता के लिए भीष्म की भीष्म प्रतिज्ञा ,और दोनो सत्यवती पुत्रो की मृत्यु के बाद , उस प्रतिज्ञा के औचित्य के समाप्त होने के बाद भी , भीष्म द्वारा गुरु परशुराम जी और माता सत्यवती के विवाह करने और सिंहासन पर बैठने के आदेश को मानने से इनकार करते हुए अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहने के बाद उत्पन्न हुई घटनाओं ने महाभारत की राह प्रशस्त की ।
३- ध्रतराष्ट्र की कुंठा , अत्याचारी होते हुए भी अपने पुत्र दुर्योधन को ही राजा बनाने की महत्वाकाँछा , युधिष्ठिर के युवराज बनने के बाद भी पांडवों के साथ अन्याय और उनकी हत्या के बार बार प्रयास , इस सबके बाद महाभारत युद्ध तो होना ही था ।
४ - महा बलवान श्री भीष्म पितामह , हस्तिनापुर राज्य के संरक्षक थे , वे अन्याय और अत्याचार को अपने शक्तिबल से रोक सकते थे । परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया , यद्यपि वे इसके समर्थक नही थे फिर भी उनके मौन ,ने महायुद्ध की राह प्रशस्त की ।
५ - राजा द्रुपद द्वारा अभिमान में मित्र द्रोणाचार्य का अपमान जनित तिरस्कार , फिर द्रोणाचार्य की द्रुपद को पराजित करके बांध के मंगवाने की प्रतिज्ञा ; और फिर द्रोणाचार्य को मारने वाले पुत्र के प्राकट्य के लिए द्रुपद का यज्ञ -- द्रोणाचार्य को मारने वाले पुत्र द्रष्टद्युम्न तथा द्रोणाचार्य को संरक्षण देने वाले अत्याचारी कौरवों के विनाश का कारण बनने वाली द्रोपदी का प्रागट्य - वास्तव में महाभारत की शुरुवात तो यहीं से हो गयी ।
ताऊ जी ( ध्रतराष्ट्र ) और दुर्योधन आदि के भ्रात्य प्रेम में आदर्श ,अजेय वीर ,धर्मात्मा पांडव -स्वयं अपने ही बनाये हुए - प्रतिज्ञाओं , आज्ञा पालन , नियमो के चक्रव्यूह में बारबार फंसे और भगवान कृष्ण ने कैसे पांडवो को इन मुसीबतों से बचाया । यह सब इतिहास समझना और जानना आवश्यक है क्यों कि इसी प्रकार की समस्याएं हर युग मे आती है -
माता कुंती द्वारा अनजाने में भिक्षा में प्राप्त वस्तु समझ कर, स्वयंवर में अर्जुन द्वारा जीती हुई राजकुमारी द्रोपदी को ,सभी पांडवो में आपस मे बांट लेने की आज्ञा । और पांचो पांडवो ने उसका पालन करते हुए द्रोपदी से विवाह किया -- राजा द्रुपद को यह जानकर कि वे ब्राह्मण रूप धारी पांचों पांडव हैं, बहुत प्रसन्नता हुई, किंतु यह सुनकर विचित्र लगा कि वे पांचों द्रौपदी से विवाह करने के लिए उद्यत हैं।
🚫 तभी वेदव्यास ने अचानक प्रकट होकर एकांत में द्रुपद को उन छहों के पूर्वजन्म की कथा सुनायी कि एक वार रुद्र ने पांच इन्द्रों को उनके दुरभिमान स्वरूप यह शाप दिया था कि वे मानव-रूप धारण करेंगे। उनके पिता क्रमश: धर्म, वायु, इन्द्र तथा अश्विनीकुमार (द्वय) होंगे। भूलोक पर उनका विवाह स्वर्गलोक की लक्ष्मी के मानवी रूप से होगा। वह मानवी द्रौपदी है तथा वे पांचों इन्द्र पांडव हैं।
🚫इसके अलावा उन्होंने द्रोपदी के पूर्व जन्मों की भी कथा सुनाई । पूर्व काल मे श्री लक्ष्मी जी के अंश से वेदवती का जन्म एक राजर्षि के यहां हुआ था । जन्म लेते ही उस कन्या ने वेदों के श्लोकों का पाठ किया और तुरन्त बड़ी होकर श्री हरि को पति रूप में पाने के लिए तपस्या करने वन में चली गयी थी । उस समय रावण ने कामुक भावना से उसके बाल पकड़ लिए थे इसलिए उसने रावण का अगले जन्म में नाश करने की प्रतिज्ञा कर अपने शरीर को योगाग्नि में जला दिया था । दूसरे जन्म में वेदवती " छाया सीता " हुई ; जिनका रावण ने हरण किया था और इसी कारण वह वंश सहित नष्ट हुआ ।
🚫 असली सीता के अग्नि से प्राकट्य के बाद छाया सीता ( वेदवती ) ने जाकर भगवान शिव की तपस्या की और उनके प्रगट होने पर पति शब्द को पांच बार उच्चारण करते हुआ हुए वर मांगा । इसलिए महादेव ने 5 पति होने का वर दे दिया था । अब वही श्री लक्ष्मी के अंश वाली वेदवती , द्रोपदी के रूप में इस युग के अन्यायी राजाओं को नष्ट करने के लिए यज्ञ कूँडी से प्रकट हुई है । शंकर भगवान के वरदान के कारण इस समय इसे 5 पतियों की प्राप्ति होनी ही है ।
व्यास मुनि के व्यवस्था देने पर द्रौपदी का विवाह क्रमश: पांचों पांडवों से कर दिया गया। महर्षि व्यास ने पांडवों और द्रोपदी के पूर्व रूप को देखने के लिए राजा द्रुपद को दिव्य दृष्टि भी प्रदान की । द्रुपद के दिये तथा
भगवान श्री कृष्ण के भेजे विभिन्न उपहारों को ग्रहण कर वे लोग द्रुपद की नगरी में ही विहार करने लगे।
🌏 इस विवाह के समर्थन में अन्य बहुत से तर्क भी है - जैसे द्रोपदी साधारण मानवी स्त्री नही थी ,अग्निकुंड से प्रगट हुई युवती थी -एक मुख्य कारण द्रोपदी का अपूर्व सुंदरी होना भी था , उसके कारण पांचो भाइयो में ईर्षा व वैमनस्य भी हो सकता था इसलिए उनका पांचो से विवाह हुआ --इसलिए यह निर्णय उस समय के अनुसार उचित ही कहा जायेगा --
********क्रमशः ****** राम नाथ गुप्त कन्नौज *************

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