महाभारत कथा -408


                     अथ श्री महाभारत कथा

पोस्ट ( 408 ) - अथ श्री महाभारत कथा -

 समीक्षा - ( ८ ) - महराजा ययाति तथा उनकी पत्नियां - शुक्राचार्य पुत्री देवयानी और दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री राजकुमारी शर्मिष्ठा की कथा - ( द्वितीय पोस्ट ) 


        🚱 देवयानी की शर्त के अनुसार अपने दैत्यवंश की रक्षा करने के लिए राजकुमारी शर्मिष्ठा अपनी 1000 सहेलियों के साथ देवयानी की दासी बन गयी । एक दिन पुनः सरोवर के पास जब देवयानी शर्मिष्ठा सहित सभी दासियों के साथ बैठी थी , राजा ययाति भी जल पीने वहां फिर आ गए । इतनी दासियों के साथ सम्मानित देवयानी का परिचय पूंछने पर उसने पुराना सारा वृतांत याद दिलाते हुए राजा ययाति से कहा कि उन्होंने उनका हाथ पकड़कर उसे कुएं से बाहर निकाला था ,इसलिए वह अपनी सभी दासियों के साथ अब उनकी दासी बन चुकी है , वे उसे पत्नी रूप में स्वीकार करें ।  
    महर्षि शुक्राचार्य भी अपनी बेटी की इच्छा को देखते हुए , इसे स्वीकार करते हुए राजा ययाति से बोले - 
        🚫" तुम मेरी पुत्री को पत्नी के रूप में स्वीकार करके सुख भोगों । बेटा ! दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा का भी तुम उचित सत्कार करना , परंतु उसे कभी अपनी सेज पर मत सुलाना । फिर शास्त्रोक्त विधि से देवयानी और राजा ययाति का विवाह संपन्न हुआ और देवयानी , भारत की महारानी बन गयी ।
       🍘 अपनी राजधानी में वापस आकर राजा ययाति ने देवयानी को तो महल में अन्तःपुर में रक्खा और शर्मिष्ठा सहित सभी दासियों के निवास की व्यवस्था "अशोक वाटिका " में की । परन्तु एक दिन शर्मिष्ठा की ओर भी आकर्षित होकर उन्होंने उसे भी अपना लिया । राजा ययाति के देवयानी से दो पुत्र हुए यदु और तुर्वसु तथा शर्मिष्ठा से तीन पुत्र हुए - द्रुह -- अनु -- और पुरु । 
       🍎 एक दिन देवयानी राजा के साथ अशोक वाटिका घूमने गयी तब इन 3 राजपुत्रो को देखकर चौंकी । पूछने पर उन बालकों ने राजा ययाति को अपना पिता और शर्मिष्ठा को माँ बताया । तब देवयानी क्रोधित होकर राजा से बोली - " आपने मेरा अप्रिय कर विवाह के समय की गई प्रतिज्ञा तोड़ी है , अब मैं यहां नही रहूँगी " 
      गुस्से में वह अपने पिता शुक्राचार्य के घर - राजा ययाति के साथ - पँहुची । देवयानी की बात सुनकर महर्षि शुक्राचार्य , अत्यंत क्रोधित होकर राजा ययाति से बोले --
      🎃" राजन ! तुमने जान बूझ कर धर्म मर्यादा का उलंघन किया है , इसलिए मैं श्राप देता हूँ कि तुम बूढ़े हो जाओ " 
     🚱 महर्षि के श्राप देते ही राजा तुरन्त बूढ़े और अशक्त हो गए । राजा के छमा मांगने और अब इससे देवयानी को भी बहुत दुखित हुआ देखकर शुक्राचार्य बोले -- " मेरी बात झूठी नही हो सकती ! हाँ तुम्हे इतनी छूट देता हूँ कि तुम मेरा स्मरण करके , अपना यह बुढापा अपने किसी पुत्र से जवानी में बदल सकते हो और जो पुत्र ऐसा करेगा वही राजगद्दी का उत्तराधिकारी होगा वही आयुष्मान ,यशश्वी ,और तुम्हारे कुल का वंशधर होगा "
     🎈 अब राजा ययाति ने राजधानी पंहुचकर अपने सबसे बड़े देवयानी के पुत्र " यदु " को बुलाया और उससे अपने बुढापे के बदले जवानी देने को कहा । यदु ने बुढापे को अत्यंत कष्टकारी बताते हुए इसे अस्वीकार कर दिया । नाराज होकर ययाति बोले जाओ तुम्हारी संतान को भी राज्य का हक नही होगा ।
     🎈 फिर इसी प्रकार राजा के अन्य पुत्रो , देवयानी के दूसरे पुत्र " तुर्वसु " के इनकार करने पर ययाति ने उसे भी श्राप दिया - " तेरा वंश नही चलेगा । तू मांसभोजी दुराचारी और म्लेच्छों का राजा होगा ।
    🎈 अब शर्मिष्ठा के पुत्र " द्रुह " के भी इंकार करने पर राजा बोले -- " अरे ! तू अपने बाप से इनकार कर रहा है । तुझे अब ऐसे स्थान में रहना पड़ेगा जहां रथ हाथी घोड़े और पालकी की तो बात ही क्या - बैल बकरे और गधे भी नही जा सकेंगे । केवल नाव से जाना पड़ेगा । राज्य तुझे भी नही मिलेगा । लोग तुझे भोज कहेंगें । केवल तू ही नही तेरे वंश की भी यही गति होगी ।"
     🎈 और फिर शर्मिष्ठा के ही दूसरे पुत्र " अनु " द्वारा भी जवानी देकर उनका बुढापे लेने की उनकी बात नही मानने पर ययाति उससे भी कठोर शब्दों में बोले -" तेरी संतान जवान होकर मर जाएगी , तुझे अग्निहोत्र करने का अधिकार नही होगा "।
       इन् चारों पुत्रो से निराश होकर जब ययाति ने सबसे छोटे शर्मिष्ठा के पुत्र " पुरु " को बुलाकर उससे एक हजार वर्षों के लिए जवानी देकर बुढापा लेने की अपनी मांग रक्खी तो वह इसके लिए खुशी खुशी तैयार हो गया ।
     🌋 राजा ययाति ने खूब जवानी का सुख भोगा और फिर अपने पुत्र पुरु को उसकी जवानी वापस कर दी ।
वे बोले ---
      🌰 " मुझे निश्चय हो गया है कि विषय भोग की कामना ,उसके भोग से नहीं शांत होती है ,सच्चे सुख की प्राप्ति उसके त्याग से होती है । अब मैं इसे छोड़कर अपने मन को ब्रम्ह में लगाऊंगा । 
       🎃 फिर ययाति " पुरु " का राज्याभिषेक करके वन में तपस्या करने चले गए । पुरु के राजा बनने के बाद अब तक दासी रही उसकी माँ शर्मिष्ठा का बहुत सम्मान बढ़ गया । अब वह भारत की " राजमाता " बन गयी थी । इन्हीं पुरु से पुरु वंश चला जिसे आगे चलकर " कुरु वंश " या कौरव वंश के नाम से जाना गया । कौरव और पांडव इसी वंश के थे ।
      राजा ययाति के दिए श्राप के अनुसार ही -- बड़े पुत्र " यदु " से यदुवंशियों का ( जिस कुल में भगवान श्री कृष्ण का अवतार हुआ ) वंश चला । 
   " तुर्वसु " से यवनों का वंश चला , वह यवनों का राजा हुए । 
   " द्रुह " से भोजों और " अनु " से मलेच्छों की उत्पत्ति हुयी ।
      🎃🎈 इस प्रकार संसार के सभी देशों के निवासी राजा ययाति के पुत्रों के वंशों के ही है । 🌏
     ******* क्रमशः************* राम नाथ गुप्त ********

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