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श्री कृष्ण की महिमा
पोस्ट - ( 340 ) - " श्री कृष्ण वचनामृत "-【 ९० 】 श्री वृंदावन - मथुरा महत्व - श्री कृष्ण की महिमा का वर्णन - दिव्य वृंदावन धाम का वर्णन -( पद्म पुराण ) ****** समापन पोस्ट *******
🍎 एक बार जगतजननी पार्वती जी ने भगवान भोलेनाथ से दिव्य वृंदावन का महात्म्य और उसके अदभुत रहस्य के बारे में जानना चाहा । भगवान महादेव बोले --
🌍 " देवि ! वृंदावन ही भगवान का सबसे प्रियतम धाम है । ब्रम्हा आदि भी वहां रहने की इच्छा करते हैं , वहां देवता और सिद्धों का निवास है । वहां की भूमि चिन्तामणि है और जल - रस से भरा हुआ अमृत है । वहां के पेड़ कल्पवृक्ष हैं और प्रत्येक स्त्री लक्ष्मी और हर एक पुरुष विष्णु के समान है क्योंकि वे उनके दशांश से प्रकट हुए है । इस वृंदावन में सदा श्याम - तेज विराजमान रहता है ,जिसकी नित्य निरन्तर किशोरावस्था बनी रहती है
~ वह आंनद का मूर्तिमान विग्रह है । जिनका अंतःकरण शुद्ध है ,जो प्रेम से परिपूर्ण है ,ऐसे वैष्णवजन ही वहां का आश्रय लेते हैं ।"
♀ " भगवान श्री कृष्ण की चरण रज का स्पर्श होने के कारण वृंदावन इस भूतल पर नित्य धाम के नाम से प्रसिद्ध है । इसे भगवान के स्वरूप से भिन्न नहीं समझना चाहिए । वहां की धूलि का स्पर्श मात्र होने के कारण मोक्ष प्राप्त हो जाता है। वृंदावन सहस्त्रदल कमल का केंद्र स्थान है और कलिंद - कन्या यमुना उस कमल कर्णिका की प्रदक्षिणा किया करती है । इसलिए हे देवि ! तुम सम्पूर्ण चित्त से अपने हृदय के भीतर उस वृंदावन का चिंतन करो तथा उसकी विहार स्थलियों में किशोर विग्रह श्री कृष्ण चंद्र का ध्यान करती रहो ।"
💞 तदुपरांत भगवती पार्वती ने शंकर जी से पुनः पूछा - " भगवान श्री कृष्ण का आश्चर्यमय सौंदर्य और
श्रीविग्रह कैसा है ? , कृपया बताइए "। तब महादेव जी बोले ~
🍅 भगवान श्री कृष्ण का अनिवर्चनीय अनन्त सौंदर्यमय मंगल - विग्रह 🍅
🍎 " देवि ! उस परम सुंदर वृंदावन के मध्य भाग में एक मनोहर भवन के भीतर अत्यंत उज्जवल योग पीठ है । उसके ऊपर माणिक्य का बना हुआ सुंदर सिंहासन है । सिंहासन के ऊपर अष्टदल कमल है जिसकी कर्णिका ( मध्यभाग ) में सुखदायी आसान लगा हुआ है ; वही भगवान श्री कृष्ण का उत्तम स्थान है । वहीं गोविंद विराजमान होते है । वैष्णव वृन्द उनकी सेवा में लगे रहते है । भगवान का ब्रज ,उनकी अवस्था और उनका रूप - ये सभी दिव्य है । उनमें सदा षड्विध ऐश्वर्य विद्यमान रहते है । वे ब्रज की बालक बालिकाओं के एकमात्र प्राणवल्लभ हैँ और किशोरावस्था को पारकर यौवन में पदार्पण कर रहे है । वे , दो भजाओं से सुशोभित , नन्दगोप के प्रियपुत्र है परंतु वास्तव में अजन्मा और नित्य ब्रम्ह हैं , जिन्हें वेद की श्रुतियाँ सदा ही खोजती रहती
हैं ।"
🍘 " उनकी कांति अत्यंत सुंदर , अवस्था नूतन ,शरीर की श्याम रंग की आभा , बड़ी मनोहर झांकी है और कानों में मनोहर कुंडल धारण किये हैं । उनका स्पर्श सुखद ,केश बहुत ही चिकने काले घुंघराले है और नाना रंग के आभूषण धारण किये है , सुंदर मोरपंख उनकी शोभा बढ़ा रहा है उनका मनोहर मुख करोड़ों चंद्रमाओं की भांति कांतिमय है । उनके वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि और श्री वत्स चिन्ह शोभा पा रहे है । वे तिरछी चितवन और मंद मुस्कान से सुशोभित होने वाले करोड़ों कामदेवों से भी अधिक सुंदर हैं । सिकोड़े हुए ओंठों पर बंशी रखकर बजाते हुए , उसकी मीठी तान से त्रिभुवन को मोहित करते हुए ,सबको प्रेम सुधा के समुद्र में निमग्न कर रहे हैं " भगवान महादेव बोले - देवि ! ऐसे गोपीनन्दन श्री कृष्ण का इस प्रकार ही ध्यान करना चाहिए ।
💞 दिव्य वृंदावन धाम का संक्षिप्त वर्णन ~भगवान शिव पार्वती जी से बोले ~
🍘 देवि ! भगवान श्री कृष्ण राधा जी के साथ उस स्वर्णमय सिंहासन पर विराजमान होते है । उपर्युक्त सिंहासन से पृथक एक योगपीठ और है ,उस पर ललिता आदि प्रधान सखियां विराजमान होती हैं । ये ललिता आदि सखियां प्रकृति की अंशभूता है । श्री राधिका ही इनकी मूल प्रकृति हैं । आठ प्रमुख सखियां भी सभी दिशाओं में विराजमान रहती है । वृंदावन की अधीश्वरी श्री राधा तथा चन्द्रावली दोनों ही भगवान की प्रियतमा हैं । जिनके दक्षिण भाग में वेद की श्रुतियाँ ही श्रुति कन्या के रूप में निवास करती हैं । मन्दिर के बाहर हजारों गोपगण रहते हैं । अपने थनों से दूध बहाने वाली असंख्य गौएँ उन्हें घेरे रहती है । वहां के बाहर के भाग में एक सोने की चहारदिवारी है ,जो करोड़ों सूर्यों के समान देदीप्यमान दिखाई देती है । उसके चारों ओर बड़े बड़े उद्यान हैं , जिनकी मनोहर सुगंध सब ओर फैली रहती है । "
***** जय जय श्री कृष्ण **** राम नाथ गुप्त *******
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