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श्री कृष्ण की महिमा
पोस्ट --( 338 ) -- " श्री कृष्ण वचनामृत " - { ८८ } श्री परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण भगवान की विजय गाथा -
- 🎃भगवान श्री कृष्ण बाल ब्रह्मचारी कैसे हुए ? और 🎃बहुत सा अन्न खा जाने वाले दुर्वासा मुनि , केवल दूर्वा का रस पीकर रहने वाले कैसे हुए ?
( श्री गर्ग संहिता - माधुर्य खण्ड )
🌋♥️ पिछली पोस्ट 337 में वर्णन आया है कि भगवान श्री कृष्ण ने अपने को अखंड ब्रम्हचारी बताया । स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि 16108 पत्नियों वाले श्री कृष्ण आखिर अखंड ब्रम्हचर्य का पालन करने के व्रती कैसे ? ऐसा ही एक विवरण गर्ग संहिता में भी है । प्रस्तुत है गर्ग संहिता की कथा तथा समाधान ~~
🍎 एक बार रात को काफी देर से श्याम सुंदर रासभूमि में पहुँचे ,तब देरी का कारण पूछने पर श्री कृष्ण ने बताया कि उनके गुरु श्री दुर्वासा मुनि भांडीर वन में पधारे है --उन्ही की सेवा में जाने के कारण उन्हें देरी हुई है --गोपियों को यह सुनकर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि परिपूर्णतम परमेश्वर के भी गुरु #दुर्वासा मुनि है और उन्होंने उस रात को दुर्वासा मुनि के दर्शन करने की इच्छा प्रगट की और पूछा कि वे यमुना जी को कैसे पार कर वहां पँहुचे --
🎈श्री कृष्ण ने उपाय बताया कि वे यमुना के पास पँहुच कर इस प्रकार कहे --" यदि श्री #कृष्ण #बाल #ब्रम्हचारी और सब प्रकार के दोषों से रहित है , तो सरिताओं में श्रेष्ठ यमुना जी ! हमारे लिए मार्ग दे दो "-
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🎈उनकी बात सुनकर अलग अलग विशाल पात्रों में छप्पन भोग लेकर गोपियाँ यमुना किनारे गयी और सिर झुकाकर उन्हीने श्री कृष्ण की कही हुई बात दोहरा दी-- आश्चचर्य ! फिर तो तत्काल यमुना जी ने उन गोपियों को मार्ग दे दिया ---उस मार्ग से अत्यंत विस्मित होकर गोपियाँ मण्डीर वट के पास पंहुची -- वहां पँहुच कर उन्होंने दुर्वासा मुनि की परिक्रमा कर , उनके आगे बहुत सी भोजन सामिग्री को रख करके और सभी कहने लगी "पहले मेरा अन्न ग्रहण कीजिये " " पहले मेरा अन्न भोजन कीजिये "--
💞 सभी का मनोरथ पूर्ण करने की इच्छा से दुर्वासा मुनि बोले --" गोपियों ! मैं कृतकृत्य परमहंस हूँ , निष्क्रिय हूँ , इस लिए तुम लोग आपना अपना भोजन अपने हाथों से मेरे मुख में डाल दो "--दुर्वासा जी ने अपना मुख खोला और देखते देखते सभी गोपियों के #विशाल #अन्नभंडार को #चट कर गए --गोपियाँ आश्चर्यचकित होकर मुनि को और अपने खाली हुए बर्तनों को देखने लगी -- फिर उन्होंने वहां तक कैसे ,,यमुना जी से ,श्री कृष्ण की बात कहकर आयी थी बताया और अब वापसी में यमुना कैसे पार करे यह पूछा --
🎈 मुनि बोले -" गोपियों ! वापस जाते समय यमुना से कहना - यदि दुर्वासा मुनि इस भूतल पर केवल दूर्वा का रस पीकर रहते हों -- कभी अन्न और जल न लेने के व्रत का पालन करते हों , तो सरिताओं की शिरोमणि यमुना जी हमे मार्ग दे दो ""
🎃 इस प्रकार मुनि की बात कहकर ,यमुना को आसानी से पार करके अत्यंत विस्मित हुई गोपियों ने श्री कृष्ण के पास जाकर अपने मन मे उठे सन्देह का उत्तर जानना चाहा कि सभी जानते है - मन वचन कर्म से जिसने कभी स्त्री का चिंतन भी न किया हो वही बाल ब्रम्हचारी होता है - आप बचपन से ही रसिक है फिर बाल ब्रम्हचारी कैसे हुए ? तथा हमारे सामने बहुत सा अन्न खा जाने वाले दुर्वासा मुनि , केवल दूर्वा का रस पीकर रहने वाले कैसे हुए ?
🎆🎃 श्री कृष्ण बोले --"" गोपियों ! मैं #ममता और #अहंकार से #रहित ,सबके प्रति समान भाव रखने वाला , सर्वव्यापी ,सबसे उत्कृष्ट ,सदा विषमता शून्य ,तथा प्राकृत गुणों से रहित हूँ -तथापि भक्त मेरा जिस प्रकार भजन करते है , उनका उसी प्रकार मैं भी भजन करता हूँ "" ---
"" इसी प्रकार ज्ञानी साधु महात्मा भी सदा विषम भावना से रहित होते है ---- योगयुक्त विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह कर्मो में आसक्त हुए अज्ञानी जनों में बुद्धि भेद न उत्पन्न करे ,उनसे सदा समस्त कर्मो का सेवन ही कराए ""-
🎃 "" जिस पुरुष के सभी आयोजन ( कार्य ) कामना और संकल्प से शून्य होते है , उनके सारे कर्म ज्ञान रूपी अग्नि में दगध हो जाते है अर्थात उनके सारे किये हुए कर्म बन्घन कारक नही होते है ""
"" जिनके मन मे कोई कामना नही है , जिसने चित्त और बुद्धि को अपने वश में कर रक्खा हैं ,और जो समस्त संग्रह परिग्रह छोड़ चुका है वह केवल शरीर निर्वाह सम्बन्धी कर्म करता हुआ , कर्म जनित शुभाशुभ फल को नही प्राप्त होता है ""
🎃 "" जो समस्त कर्मो को ब्रमहार्पण करके आसक्ति छोड़कर कर्म जड़ता है वह पाप से लिप्त नही होता है ""
🎃 "" इसलिए दुर्वासा मुनि तुम सबके हित साधना में तत्पर होकर बहुत ख़ाने वाले हो गए --स्वत: उन्हें भोजन की #इच्छा नही होती है -वे नियमित केवल दूर्वा के रस का ही आहार लेते है "" --
श्री कृष्ण के वचन सुनकर गोपियों का संशय दूर हो गया --
************** अपनी बात ******
परमब्रम्ह के तो गुण ही है --
बिनु पद चलई सुनइ बिनु काना । कर बिनु करम करइ बिधि नाना ।।
आनन रहित सकल रस भोगी । बिनु बानी बकता बड़ जोगी ।।
इसलिए वे परमेश्वर किसी कार्य मे #लिप्त नही होते है -- इस कथा द्वारा श्री कृष्ण भगवान ने #निष्काम #कर्मयोग की शिक्षा प्रदान की है --
श्री कृष्ण की महिमा
********** क्रमशः *********** राम नाथ गुप्त ******
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