श्री कृष्ण वचनामृत -337


                                  श्री कृष्ण की महिमा


पोस्ट -( 337 ) - " श्री कृष्ण वचनामृत "- 【 ८७ 】 श्री कृष्ण का नित्य अखंडित ब्रम्हचर्य और उसका प्रभाव - परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण की विजय गाथा ~ जैमिनि याश्वमेध महाभारत कथा ~


      अर्जुन के द्रोपदी और सुभद्रा के अलावा दो और विवाह हुए थे । मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा तथा नागलोक की राजकुमारी उलूपी के साथ ।  


      🎃 युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े के साथ विचरण रहे , अर्जुन जब अपने पुत्र बभ्रुवाहन ( पुत्र चित्रांगदा ) के राज्य मणिपुर में पँहुचे तब बभ्रुवाहन अर्जुन का स्वागत करने आया , परन्तु अपनी शक्ति के अहंकार में अर्जुन ने उसे युद्ध करने के लिए ललकारा । तभी वहां अर्जुन की दूसरी पत्नी नागकन्या उलूपी भी आ गयी और उसने बभ्रुवाहन को युद्ध की ही भाषा मे पिता को उत्तर देने को कहा ।  
       🍎 फिर पिता अर्जुन का अपने ही पुत्र से भीषण युद्ध हुआ । युद्ध में पुत्र बभ्रुवाहन द्वारा अर्जुन का मस्तक कट गया । तब उनकी माता चित्रांगदा और दूसरी माता उलूपी दोनों विलाप करने लगीं । बभ्रुवाहन भी शोक से संतप्त हो अग्नि में प्रवेश करने को उद्यत हो गया । तब उलूपी बोली --


       🌰 " नागराज शेष के पास संजीवनी मणि है , उसे लाकर पार्थ के शरीर से स्पर्श कराया जाए ,तो वे अवश्य जीवित हो सकते है । " 


         उलूपी ने उस मणि को लाने के लिए पुण्डरीक को शेषनाग के पास भेजा । शेष तो वह मणि देना चाहते थे परंतु अन्य नागों ने उसे नहीं देने दिया ।


        🌰 तब बभ्रुवाहन ने नागलोक पर आक्रमण कर दिया और नागों को पराजित करके वह मणि प्राप्त कर ली । मणि लेकर बभ्रुवाहन आ ही रहा था कि धृतराष्ट्र नाग के पुत्र दुर्बुद्धि नाग ने अर्जुन का मस्तक चुरा लिया । इतने में श्री कृष्ण , भीमसेन , कुंती ,देवकी एवम् यशोदा वहां आ गईं । बभ्रुवाहन उन सब को देखकर विलाप करने लगा ।


         तदन्तर शेष नाग ने श्री कृष्ण से कहा --" आप क्यों चुप है ? आप तो असंभव को भी सम्भव कर सकते हैं । अर्जुन का मस्तक मंगाइये और मणि के स्पर्श से इन्हें जीवित कीजिये ।"


        यह सुन श्री कृष्ण बोले ~~ ( जैमिनि याश्वमेध अध्याय 40 श्लोक 11 और 12 )


         🍎🌰" यहां जितने लोग उपस्थित हैं , सभी मेरे इस मंत्र युक्त वचन को सुनें ~~ 


        ""यदि इस भूतल पर कभी मेरा ब्रम्हचर्य खंडित न हुआ हो ~ यदि मैं सदा अखंड ब्रम्हचर्य का पालन करता रहा होऊं , तो मेरे उस पुण्य के प्रभाव से अर्जुन का वह मस्तक अभी यहां आ जाये ; और जो लोग उसे चुरा कर ले गए हों , वे इसी क्षण धराशायी हो जाएं । मेरी आज्ञा से उनके सिरों के टुकड़े टुकड़े हो जाएं ।""


        🎃 कहने की आवश्यकता नहीं , कि भगवान के मुख से यह वचन निकलते ही धृतराष्ट्र नाग के दोनों पुत्र दुर्बुद्धि और दुःस्वभाव नष्ट हो गए और अर्जुन का वह मस्तक उसी क्षण मणिपुर में आ गया ।


           मणि के स्पर्श से कर्णपुत्र वृषकेतु और कुंतीपुत्र अर्जुन दोनों को नूतन जीवन प्राप्त हुआ ।

            श्री कृष्ण की महिमा

     **** क्रमशः ************* राम नाथ गुप्त *****

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