श्री गर्ग संहिता 241


 पोस्ट --( 241 )-- श्री गर्ग संहिता ~ परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण चन्द्र की विजय गाथा -- श्री गर्ग संहिता - अंतिम समापन पोस्ट --

 द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण की सहायता से द्वारिका के राजा उग्रसेन का राजसूय यज्ञ सम्पन्न हुआ --

      🎃 समस्त धर्मात्माओं में श्रेष्ठ द्वारिका के राजा उग्रसेन ने द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण की सहायता से यदुकुल के आचार्य श्री गर्ग जी की सम्मति से शुभ मूहूर्त में ऋतुराज राजसूय यज्ञ को आरंभ किया - 

    भक्तिभाव से बुलाये जाने पर साक्षात वेदव्यास , शुकदेव ,पाराशर ,दुर्वासा ,वैशम्पायन ,द्रोणाचार्य ,कृपाचार्य आदि ऋषि मुनि वहां अपने शिष्यों सहित पधारे --

     श्री गणेश ,ब्रम्हा , शिव ,इंद्र आदि सभी देवताओ ने भी दर्शन दिए --

     गन्धर्व सुन्दरिया ,अप्सराएं और समस्त विद्याधरियाँ भी आई --श्री हनूमान जी , जामवन्त जी ,राक्षस राज विभीषण ,प्रह्लाद , पक्षीराज गरुड़ , नागराज वासुकी , कामधेनु तथा मानव रूप रखकर नदिया ,सागर , पर्वत, तीर्थ आदि भी पधारे --

      🎃 रानी कीर्तिदा ( राधा जी की माँ ) , और गोपियों के साथ गोपकेश्वरी #यशोदा भी पधारी --अपने सभी सखी समूहों के साथ शिविकारूढ़ श्री #राधा जी का भी #शुभागमन हुआ --राजा धृतराष्ट , दुर्योधन , पितामह भीष्म आदि तमाम राजा महाराजा तथा चतुवर्ण के सभी लोगो का उस यज्ञ में आगमन हुआ 

       🎆 अर्थ सिद्धि के द्वारभूत पिण्डारक छेत्र में जो रैवतक पर्वत और समुद्र के बीच मे स्थित है , विशाल कुंडो को बनवाकर श्रेष्ठ यज्ञ प्रारम्भ हुआ --

       🍎 महान सम्भार का संचय करके ,श्री गर्गाचार्य को गुरु बनाकर ,यदुराज उग्रसेन ने ऋतुश्रेष्ठ राजसूय यज्ञ की दीक्षा लेकर #हजारो #होताओ के साथ #यज्ञ को प्रारम्भ किया --अथाह सामिग्री व घृत से यज्ञ की आहुतियां दी गयीं - विशाल भंडारे चले व अन्न तथा अन्य उपयोगी वस्तुएं दान में याचको , व ब्राह्मणों को दी गयीं --अंत मे अपनी धर्मपत्नी "#रुचिमती " के साथ राजा #उग्रसेन ने पिण्डारक तीर्थ में यज्ञ का अवभृत स्नान किया --देवताओ और मनुष्यों की दन्दुभियाँ बजने लगी - दिव्य फूलों की वर्षा हुई --सभी आगंतुकों को सम्मान सहित भेंट प्रदान की गयी ।

     अंत मे श्री व्यास जी ने उग्रसेन को उपदेश देते हुए कहा --

      🎆🎃 ""जिस प्रकार जल के चंचल होने पर उसमे कई चंद्रमा दिखाई देते है , किंतु वास्तव में है कुछ नही ,केवल प्रतिबिम्ब मात्र है , एक ही चन्द्रमा अनेक जलपात्रो में अलग अलग दिखता है , उसी प्रकार परम प्रभु भगवान अपने द्वारा बनाये हुए जीवो के भीतर व बाहर विराज रहे है ,

      जिस प्रकार सूर्योदय हो जाने पर रात्रि सम्बन्धी अंधकार नष्ट हो जाता है ,और सभी वस्तुएं दिखाई देने लगती है वैसे ही ज्ञान का प्रादुर्भाव होते ही अज्ञान रूपी अंधकार भाग जाता है ,

       *** फिर तो शरीर मे ही मनुष्य को ब्रम्ह की उपलब्धि हो जाती है*""*** 

        इस प्रकार उपदेश देकर व्यास जी ने उग्रसेन से जाने की अनुमति ली और सम्पूर्ण यादवों के देखते देखते वे वही अंतर्ध्यान हो गए ।


       🍎🎆 जहां भगवान श्री कृष्ण स्वयम उपस्थित हो , वहां के सभी कार्यो को अविस्मरणीय रूप से सफल होना ही था --परमेश्वर श्री हरि ने राजसूय यज्ञ के बहाने , दुष्टो और अत्याचारियों का नाश करवाकर ,समस्त भूतल का भार उतार दिया --

       🎆 यदुकुल में चतुर्भुज रूप धारण कर प्रकट हुए , उन अनन्त गुणशाली भुवन पालक परिपूर्णतम ब्रम्ह श्री कृष्ण चन्द्र को बारम्बार प्रणाम है --

    ********* राम नाथ गुप्त ********

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